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________________ पपुराणे अयं पुमानियं स्त्रीति विकल्पोऽयममेधसाम् । सर्वतो वचनं साधु समीहन्ते सुमेधसः ॥११॥ स्वल्पोऽपि यदि कश्चित्ते प्रसादो मयि विद्यते । ततो वदामि ते मुञ्च परस्त्रीरतमार्गणम् ॥१२॥ गृहीत्वा जानकी कृत्वा स्वामेव च समाश्रयम् । प्रत्यापयामि गत्वाऽहं रामं भवदनुज्ञया ॥३॥ उपगृह्य सुतौ तेऽहं शत्रुजिन्मेघवाहनौ । भ्रातरं चोपनेष्यामि किं भूरिजनहिंसया ||६|| एवमुक्तो भृशं क्रूद्धो रक्षसामधिपोऽवदत् । गच्छ गच्छ दुतं यत्र न पश्यामि मुखं तव ॥१५॥ अहो त्वं पण्डितम्मन्या यद्विहायोन्नति निजाम् । परपक्षप्रशंसायां प्रवृत्ता दीनचेष्टिता ।।१६॥ त्वं वीरजननी भूत्वा ममाप्रमहिपी सती । या वति क्लीबमेवं तत्कातरास्ति न ते परा ॥१७॥ एवमुक्ता जगौ देवी शृणु यद्गदितं बधः । हलिनां चक्रिणां जन्म तथा च प्रतिचक्रिणाम् ॥१८॥ विजयोऽथ त्रिपृष्ठश्च द्विपृष्टोऽचल एव च । स्वयम्भूरिति च ख्यातस्तथा च पुरुषोत्तमः ॥१६॥ नरसिंह प्रतीतिश्च पुण्डरीकश्च विश्रुतः । दत्तश्चेति जगद्धीरा हरयोऽस्मिन् युगे स्मृताः ॥१०॥ समये तु महावीयौं पद्मनारायणी स्मृतौ । यौ तौ ध्रवमिमौ जातौ दशानन समागतौ ॥१०॥ प्रत्यनीका ययुग्रीवतारकाद्या यथा गताः । नाशमेभ्यस्तथा नूनं त्वमस्माद्गन्तुमिच्छसि ॥१०२।। उपदेश द्वारा प्रबोधको प्राप्त नहीं कराया गया था ॥६०॥ 'यह पुरुष है और यह स्त्री है' इस प्रकारका विकल्प निर्बुद्धि पुरुषोंको ही होता है यथार्थमें जो बुद्धिमान हैं वे स्त्री-पुरुष सभीसे हितकारी वचनोंकी अपेक्षा रखते हैं ।।६।। हे नाथ ! यदि आपकी मेरे ऊपर कुछ थोड़ी भी प्रसन्नता है तो मैं कहती हूँ कि परस्त्रींसे रतिकी याचना छोड़ो अथवा परस्त्रीमें रत पुरुषका मार्ग तजो ॥१२॥ यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं जानकीको ले जाकर रामको आपकी शरणमें ले आती हूँ तथा तुम्हारे इन्द्रजित् और मेघवाहन नामक दोनों पुत्रों तथा भाई कुम्भकर्णको वापिस लिये आती हूँ । अधिक जनांकी हिंसासे क्या प्रयोजन है ? ॥६३-६४॥ ____मन्दोदरीके इस प्रकार कहने पर रावण अत्यधिक कुपित होता हुआ बोला कि जा जा जल्दी जा, वहाँ जा जहाँ कि मैं तेरा मुख नहीं देखू ॥६५।। अहो ! तू अपने आपको बड़ी पण्डिता मानती है जो अपनी उन्नतिको छोड़ दीन चेष्टा को धारक हो शत्रु पक्षकी प्रशंसा करनेमें तत्पर हुई है ॥६६।। तू वीरको माता और मेरी पट्टरानी होकर भी जो इस प्रकार दीन वचन कह रही है तो जान पड़ता है कि तुझसे बढ़ कर कोई दूसरी कायर स्त्री नहीं है ।।६७॥ इस प्रकार रावणके कहने पर मन्दोदरीने कहा कि हे नाथ ! विद्वानोंने बलभद्रों, नारायणों तथा प्रतिनारायणोंका जन्म जिस प्रकार कहा है उसे सुनिये ।।९८॥ हे देव ! इस युगमें अबतक विजय तथा अचल आदि सात बलभद्र और त्रिपृष्ठ, द्विपृष्ठ, स्वयम्भू , पुरुषोत्तम, नृसिंह, पुण्डरीक और दत्त ये सात नारायण हो चुके हैं। ये सभी जगत्में अत्यन्त धोरवीर तथा प्रसिद्ध पुरुष हुए हैं। इस समय पद्म और लक्ष्मण नामक बलभद्र तथा नारायण होंगे। सो हे दशानन जान पड़ता है कि ये दोनों ही यहाँ आ पहुँचे हैं। जिसप्रकार अश्वग्रीव और तारक आदि प्रतिनारायण इनसे नाशको प्राप्त हुए हैं उसी प्रकार जान पड़ता है कि तुम भी इनसे नाशको प्राप्त होना चाहते १. विनयोऽथ म। सनौ बलभद्र-१ विजय २ अचल ३ भद्र ४ सुप्रभ ५ सुदर्शन ६ अानन्द ७ नन्दन नन्द, ८ पद्मराम और ६ बलराम । - नौ नारायण-१ त्रिपृष्ठ २ द्विपृष्ठ ३ स्वयम्भू, ४ पुरुषोत्तम ५ नृसिंह ६ पुण्डरीक ७ दत्त ८ लक्ष्मण और कृष्ण । नौ प्रतिनारायण-१ अश्वग्रीव २ तारक ३ मेरुक ४ द्विशम्भु ५ मधु ६ बलि ७ प्रहाद ८ रावण और जरासंध । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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