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________________ त्रयोविंशोत्तरशतं पर्व विजिततरुणार्क ते जसमधरीकृतपूर्णचन्द्रमण्डलं कान्तम् । सर्वोपमानभावव्यतिगमरूपाति रूढमूर्जितचरितम् ॥ १४६ ॥ पूर्व स्नेहेन तथा सीतादेवाधिपेन धर्मस्थतया । परमहितं परमर्द्धिप्राप्तं पद्मं यतिप्रधानं नमत ॥ १५० ॥ Disit बलदेवानामष्टमसङ्ख्यो नितान्तशुद्धशरीरः । श्रीमाननन्तबलभृन्नियमशतसहस्रभूषितो गतविकृतिः ॥ १५१ ॥ तमनेकशीलगुणशतसहस्रधरमतिशुद्ध कीर्तिमुदारम् । ज्ञानप्रदीपममलं प्रणमत रामं त्रिलोकनिर्गतयशसम् ॥ १५२ ॥ निर्दग्धकर्म पटलं गम्भीरगुणार्णवं विमुक्तक्षोभम् । मन्दरमिव निष्कम्पं प्रणमत रामं यथोक्तचरितश्रमणम् ॥ १५३ ॥ विनिहत्य कषायरिपून् येन त्यक्तान्यशेषतो द्वन्द्वानि । त्रिभुवनपरमेश्वरतां यश्च प्राप्तो जिनेन्द्रशासनसक्तः ॥ १५४॥ निर्धूतकलुषरजसं सम्यग्दर्शनज्ञानचरित्रमयम् । तं प्रणमत भवमथनं श्रमणवरं सर्वदुःखसंक्षयसक्तम् ॥१५५॥ चेष्टितमनघं चरितं करणं चारित्रमित्यमी यच्छब्दाः । पर्याया रामायणमित्युक्तं तेन चेष्टितं रामस्य ॥१५६॥ बलदेवस्य सुचरितं दिव्यं यो भावितेन मनसा नित्यम् । विस्मयहर्षाविष्टस्वान्तः प्रतिदिन मपेतशक्तिकरणः ॥ १५७ ॥ वाचयति शृणोति जनस्तस्यायुर्वृद्धिमीयते पुण्यं च । भाकृष्टखड्गहस्तो रिपुरपि न करोति वैरमुपशममेति ॥१५८ || ४२१ प्रणाम करो || १४८ || जिन्होंने तरुण सूर्यके तेजको जीत लिया था, जिन्होंने पूर्ण चन्द्रमा के मण्डलको नीचा कर दिया था, जो अत्यन्त सुदृढ था, पूर्व स्नेहके वश अथवा धर्ममें स्थित होने के कारण सीताके जीव प्रतीन्द्रने जिनकी अत्यधिक पूजा की थी, तथा जो परम ऋद्धिको प्राप्त थे ऐसे मुनिप्रधान श्रीरामचन्द्रको नमस्कार करो ॥ १४६-१५०॥ जो बलदेवों में आठवें बलदेव थे, जिनका शरीर अत्यन्त शुद्ध था, जो श्रीमान् थे, अनन्त बलके धारक थे, हजारों नियमोंसे भूषित थे और जिनके सब विकार नष्ट हो गये थे ॥ १५१ ॥ जो अनेक शील तथा लाखों उत्तरगुणों के धारक थे, जिनकी कीर्ति अत्यन्त शुद्ध थी, जो उदार थे, ज्ञानरूपी प्रदीपसे सहित थे, निर्मल थे और जिनका उज्ज्वल यश तीन लोकमें फैला हुआ था उन श्रीरामको प्रणाम करो || १५२|| जिन्होंने कर्मपटलको जला दिया था, जो गंभीर गुणोंके सागर थे, जिनका क्षोभ छूट गया था, जो मन्दरगिरिके समान अकम्प थे तथा जो मुनियोंका यथोक्त चारित्र पालन करते थे उन श्रीरामको नमस्कार करो ।।१५३ ॥ जिन्होंने कषायरूपी शत्रुओंको नष्टकर सुख-दुःखादि समस्त द्वन्द्वों त्याग कर दिया था, जो तीन लोककी परमेश्वरताको प्राप्त थे, जो जिनेन्द्र देवके शासन में लीन थे, जिन्होंने पापरूपी रज उड़ा दी थी, जो सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रसे तन्मय हैं, संसारको नष्ट करनेवाले हैं, तथा समस्त दुःखों का क्षय करनेमें तत्पर हैं ऐसे मुनिवर श्रीरामको प्रणाम करो ॥१५४-१५५।। Jain Education International चेष्टित, अनघ, चरित, करण और चारित्र ये सभी शब्द यतश्च पर्यायवाचक शब्द हैं अतः रामकी जो चेष्टा है वही रामायण कही गई है || १५६ ॥ जिसका हृदय आश्चर्य और हर्पसे आक्रान्त है तथा जिसके अन्तःकरणसे सब शङ्काएँ निकल चुकी हैं ऐसा जो मनुष्य प्रतिदिन भावपूर्ण मनसे बलदेवके चरित्रको बाँचता अथवा सुनता है उसकी आयु वृद्धिको प्राप्त होती है, For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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