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________________ त्रयोविंशोत्तरशतं पर्व ४१५ ध्यानमारुतयुक्रेन तपःसंधुचितात्मना । स्वया जन्माटवी दग्धा दीप्तेन ज्ञानवहिना ॥६॥ शुद्धलेश्यात्रिशूलेन मोहनीयरिपुहंतः । 'रडवैराग्यवज्रेण चूर्णितं स्नेहपजरम् ॥६६॥ संशये वर्तमानस्य भवारण्यविवर्तिनः । शरणं भव मे नाथ मुनीन्द्र भवसूदन ॥७॥ लब्धलग्धव्य ! सर्वश! कृतकृत्य ! जगदगुरो। परित्रायस्व पदमाम मामस्याकुलमानसम् ॥७॥ मुनिसुव्रतनाथस्य सम्यगासेव्य शासनम् । संसारसागरस्य स्वं गतोऽन्तं तपसोरुणा ।।७२।। राम युक्तं किमेतत्ते यदत्यन्तं विहाय माम् । एकेन गम्यते तुङ्गममलं पदमच्युतम् ॥७३।। ततो मुनीश्वरोऽवोचन्मुश्च रागं सुराधिप । मुक्तिर्वैराग्यनिष्ठस्य रागिणो भवमजनम् ॥७४।। भवसम्म्य शिला कण्ठे दोभ्यां तत्तु न शक्यते । नदी तद्वन्न रागायेस्तरितुं संसृतिः क्षमा ॥७५॥ ज्ञानशीलगुणासङ्गस्तीर्यते भवसागरः । ज्ञानानुगतचित्तेन गुरुवाक्यानुवर्तिना ॥७॥ आदिमध्यावसानेषु वेदितव्यमिदं बुधः । सर्वेषां यन्महातेजाः केवली असते गुणान् ।।७७॥ अतः परं प्रवच्यामि यच्चान्यस्कारणं नृप । सीतादेवो यदप्रामोद् षभाषे यच्च केवली ॥७॥ कैते नाथ समस्तज्ञ भव्या दशरथादयः । लवणाङ्कुशयोः का वा रष्टा नाथ त्वया गतिः ॥७॥ सोऽवोचदानते कल्पे देवो दशरथोऽभवत् । केकया केकयी चैव सुप्रजाश्चापराजिता ॥८॥ केवलीकी इस तरह स्तुति करना प्रारम्भ किया ॥६७|| वह कहने लगा कि हे भगवन् ! आपने.. ध्यानरूपी वायुसे युक्त तथा तपके द्वारा की हुई देदीप्यमान ज्ञानरूपी अग्निसे संसाररूपी अटवीको दग्ध कर दिया है ॥६८॥ आपने शुद्ध लेश्यारूपी त्रिशूलके द्वारा मोहनीय कर्मरूपी शत्रुका घात किया है, और दृढ़ वैराग्यरूपी वनके द्वारा स्नेहरूपी पिंजड़ा चूर-चूर कर दिया है ।।६।। हे नाथ! मैं सँसाररूपी अटवीके बीच पड़ा जीवन-मरणके संशयमें मूल रहा हूँ अतः हे मुनीन्द्र ! हे भवसूदन ! मेरे लिए शरण हूजिए ॥७०॥ हे राम ! आप प्राप्त करने योग्य सब पदार्थ प्राप्त कर चुके हैं, सब पदार्थों के ज्ञाता हैं, कृतकृत्य हैं, और जगत्के गुरु हैं अतः मेरी रक्षा कीजिए, मेरा मन अत्यन्त व्याकुल हो रहा है ।।७१॥ श्री मुनिसुव्रतनाथके शासनकी अच्छी तरह सेवाकर आप विशाल तपके द्वारा संसार-सागरके अन्तको प्राप्त हुए हैं ॥७२॥ हे राम! क्या यह तुम्हें उचित है जो तुम मुझे बिलकुल छोड़ अकेले ही उन्नत निर्मल और अविनाशी पदको जा .. रहे हो ॥७३॥ तदनन्तर मुनिराजने कहा कि हे सुरेन्द्र ! राग छोड़ो क्योंकि वैराग्यमें आरूढ मनुष्यकी मुक्ति होती है और रागी मनुष्यका संसारमें डूबना होता है ।।७४॥ जिस प्रकार कण्ठमें शिला बाँधकर भुजाओंसे नदी नहीं तैरी जा सकती उसी प्रकार रागादिसे संसार नहीं तिरा जा सकता ॥७५।। जिसका चित्त निरन्तर ज्ञानमें लीन रहता है तथा जो गुरुजनोंके कहे अनुसार प्रवृत्ति करता है ऐसा मनुष्य ही ज्ञानशील आदि गुणोंकी आसक्तिसे संसार-सागरको तैर सकता है ।।७६॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! विद्वानोंको यह समझ लेना चाहिए कि महाप्रतापी केवली आदि मध्य और अवसानमें अर्थात् प्रत्येक समय सब पदार्थोंके गुणोंको ग्रस्त करते हैंजानते हैं ॥७७॥ हे राजन् ! अब इसके आगे सीतेन्द्रने जो पूछा और केवलीने जो उत्तर दिया वह सब कहूँगा ॥७॥ सीतेन्द्रने केवलीसे पूछा कि हे नाथ ! हे सर्वज्ञ ! ये दशरथ आदि भव्य जीव कहाँ हैं ? तथा लवण और अंकुशकी आपने कौन-सी गति देखी है ? अर्थात् ये कहाँ उत्पन्न होंगे ? ॥६॥ तब केवलीने कहा कि राजा दशरथ आनत स्वर्गमें देव हुए हैं। इनके सिवाय सुमित्रा, कैकयी, १. दृढं वैराग्य म० । २. भवाख्य म० । ३. मवने म० । ४. यान्महातेजाः म० । ५. कैकसी म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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