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________________ विंशोत्तरशतं पर्व एवमादीन् गुणान् राजन् बलदेवस्य योगिनः । धरणोऽप्यक्षमो वक्तु जिह्वाकोटिविकारगः ॥ १ ॥ उपोष्य द्वादशं सोऽथ धीरो विधिसमन्वितः । नन्दस्थलीं पुरीं भेजे पारणार्थं महातपाः ॥ २ ॥ तरुणं 'तरणिं दीक्षया द्वितीयमिव भूधरम् । अन्यं दाक्षायणीनाथमगम्यमित्र भास्वतः ॥३॥ वीस्फटिकसंशुद्धहृदयं पुरुषोत्तमम् । मूर्खेव सङ्गतं धर्ममनुरागं त्रिलोकगम् ||४|| आनन्दमिव सर्वेषां गयेकस्वमिव स्थितम् । महाकान्तिप्रवाहेण प्लावयन्तमिव क्षितिम् ||५|| धवलाम्भोजखण्डानां पूरयन्तमिवाम्बरम् । तं वीचय नगरीलोकः समस्तः चोभमागतः || ६ || अहो चित्रमहो चित्रं भो भो पश्यत पश्यत । अदृष्टवरमीदृचमाकारं भुवनातिगम् ||७| अयं कोऽपि महोक्षेति आयातीह सुसुन्दरः । प्रलम्बदोर्युगः श्रीमानपूर्व नरमन्दरः ||८|| अहो धैर्यमहो महो रूपमहो चुतिः । अहो कान्तिरहो शान्तिरहो मुक्तिरहो गतिः ॥ १ ॥ कोsयमीक्कुतः कस्मिन् समभ्येति मनोहरः । युगान्तर स्थिरन्यस्तशान्तदृष्टिः समाहितः ॥१०॥ उदार पुण्यमेतेन कतरन्मण्डितं कुलम् । कुर्यादनुग्रहं कस्य गृहानोऽन्नं सुकर्मणः ॥ ११ ॥ सुरेन्द्रसदृशं रूपं कुतोऽत्र भुवने परम् । अक्षोभ्यसत्वशैलोऽयं रामः पुरुषसत्तमः ।। १२ ।। एवैत चेतसो इष्टेर्जन्मनः कर्मणो मतेः । कुरुध्वं चरितार्थत्वं देहस्य चरितस्य च ॥ १३ ॥ अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! इस तरह योगी बलदेवके गुणोंका वर्णन करनेके लिए एक करोड़ जिह्वाओंकी विक्रिया करनेवाला धरणेन्द्र भी समर्थ नहीं है ॥ १ ॥ तदनन्तर पाँच दिनका उपवासकर धीर वीर महातपस्वी योगी राम पारणा करनेके लिए विधिपूर्वक- ईर्यासमिति से चार हाथ पृथिवी देखते हुए नन्दस्थली नगरी में गये ||२|| वे राम अपनी दीप्ति से ऐसे जान पड़ते थे मानो तरुण सूर्य ही हों, स्थिरतासे ऐसे लगते थे मानो दूसरा पर्वत ही हो, शान्त स्वभावके कारण ऐसे जान पढ़ते थे मानो सूर्यके अगम्य दूसरा चन्द्रमा ही हों, उनका हृदय धवल स्फटिकके समान शुद्ध था, वे पुरुषों में श्रेष्ठ थे, ऐसे जान पड़ते थे मानो मूर्तिधारी धर्म ही हों, अथवा तीन लोकके जीवोंका अनुराग ही हों, अथवा सब जीवोंका आनन्द एकरूपताको प्राप्त होकर स्थिति हुआ हो, वे महाकान्तिके प्रवाहसे पृथिवीको तर कर रहे थे, और आकाशको सफेद कमलोंके समूहसे पूर्ण कर रहे थे। ऐसे श्रीरामको देख नगरीके समस्त लोग क्षोभको प्राप्त हो गये || ३-६ || लोग परस्पर कहने लगे कि अहो ! आश्चर्य देखो, अहो आश्चर्य देखो जो पहले कभी देखनेमें नहीं आया ऐसा यह लोकोत्तर आकार देखो ||७|| यह कोई अत्यन्त सुन्दर महावृषभ यहाँ आ रहा है, अथवा जिसकी दोनों लम्बी भुजाएँ नीचे लटक रही हैं ऐसा यह कोई अद्भुत मनुष्य रूपी मंदराचल है ॥८॥ अहो, इनका धैर्य धन्य है, सत्व-पराक्रम धन्य है, रूप धन्य है, कान्ति धन्य है, शान्ति धन्य है, मुक्ति धन्य है और गति धन्य है ॥६॥ जो एक युग प्रमाण भन्तरपर बड़ी सावधानीसे अपनी शान्तदृष्टि रखता है ऐसा यह कौन मनोहर पुरुष यहाँ कहाँ से आ रहा है ||१०|| उदार पुण्यको प्राप्त हुए इसके द्वारा कौनसा कुल मण्डित हुआ है - यह किस कुलका अलंकार है ? और आहार ग्रहणकर किसपर अनुग्रह करता है ? ॥ ११॥ इस संसार में इन्द्रके समान ऐसा दूसरा रूप कहाँ हो सकता है ? अरे ! जिनका पराक्रम रूपी पर्वत क्षोभ रहित है ऐसे ये पुरुषोत्तम राम हैं ॥ १२ ॥ भभो आभो १. तरणिदप्त्या म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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