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________________ एकोनविंशोत्तरशतं पर्व तत्तस्य वचनं श्रुत्वा हितमत्यन्तनिश्चितम् । मनसा क्षणमालोच्य सर्वकर्तव्यदक्षिणम् ॥१॥ विलोक्याऽसीनमाससमनङ्गलवणात्मजम् । क्षितीश्वरपदं तस्मै ददौ स परमर्द्धिकम् ॥२॥ भनन्तलवणः सोऽपि पितृतुल्यगुणक्रियः । प्रणताऽखिलसामन्तो जातः कुलधुरावहः ॥३॥ परं प्रतिष्ठितः सोऽयमनुरागप्रतापवान् । धरणीमङ्गलं सर्वमापच्च विजयो यथा ॥४॥ सुभूषणाय पुत्राय लकाराज्यं विभीषणः । सुग्रीवोऽपि निजं राज्यमङ्गदाणभुवे ददौ ॥५॥ ततो दाशरथी रामः सविषानमिवेशिवम् । कलत्रमिव चागस्वि राज्यं भरतवजहौ ॥६॥ एक निःश्रेयसस्थान देवासुरनमस्कृतम् । साधकैमुनिभिर्जुष्टं सममानगुणोदितम् ॥७॥ जन्ममृत्युपरित्रस्तः श्लयकर्मकलभृत् । विधिमार्ग वृणोति स्म मुनिसुव्रतदेशितम् । ८॥ बोधिं सम्प्राप्य काकुत्स्थः क्लेशभावविनिर्गतः । अदीपिष्टाधिक मेघवजनिःसृतभानुवत् ॥६॥ अथाईहासनामानं श्रेष्ठिनं द्रष्टुमागतम् । कुशलं सर्वसङ्घस्य पप्रच्छेह सदःस्थितः ॥१०॥ उवाच स महाराज व्यसनेन तवाऽमुना । व्यथनं परमं प्राप्ता यतयोऽपि महीतले ॥११॥ अवबुध्य विबन्धात्मा किल व्योमचरो मुनिः । सुबतो भगवान् प्राप मुनिसुव्रतवंशभृत् ॥१२॥ अथानन्तर शत्रुध्नके हितकारी और दृढ़ निश्चयपूर्ण वचन सुनकर राम क्षणभरके लिए विचारमें पड़ गये । तदनन्तर मनसे विचार कर अनङ्गलवणके पुत्रको समीपमें बैठा देख उन्होंने उसीके लिए परम ऋद्धिसे युक्त राज्यपद प्रदान किया ॥१-२॥ जो पिताके समान गुण और. क्रियाओंसे युक्त था, तथा जिसे समस्त सामन्त प्रणाम करते थे ऐसा वह अनन्तलवण भी कुलका: भार उठानेवाला हुआ ॥३॥ परम प्रतिष्ठाको प्राप्त एवं उत्कट अनुराग और प्रतापको धारण करनेवाले अनन्तलवणने विजय बलभद्रके समान पृथिवीतलके समस्त मङ्गल प्राप्त किये ॥४॥ विभीषणने लंकाका राज्य अपने पुत्र सुभूषणके लिए दिया और सुग्रीवने भी अपना राज्य अङ्गारके पुत्रके लिए प्रदान किया ॥५॥ तदनन्तर जिस प्रकार पहले भरतने राज्य छोड़ दिया था उसी प्रकार रामने राज्यको विष मिले अन्न के समान अथवा अपराधी स्त्रीके समान देखकर छोड़ दिया ॥६॥ जो जन्म-मरणसे भयभीत थे तथा जो शिथिलीभूत कर्म कलङ्कको धारणकर रहे थे ऐसे श्रीरामने भगवान् मुनिसुव्रतनाथके द्वारा प्रदर्शित आत्म-कल्याणका एक वही मागे चुना जो कि मोक्षका कारण था, सुर-असुरोंके द्वारा नमस्कृत था, साधक मुनियों के द्वारा सेवित था तथा जिसमें माध्यस्थ्य भाव रूप गुणका उदय होता था ॥७-८।। बोधिको पाकर क्लेश भावसे निकले राम, मेघ-मण्डलसे निर्गत सूर्य के समान अत्यधिक देदीप्यमान हो रहे थे ।।६।। अथानन्तर राम सभामें विराजमान थे उसी समय अर्हदास नामका एक सेठ उनके दर्शन करनेके लिए आया था, सो रामने उससे समस्त मुनिसंघकी कुशल पूछी ॥१०॥ सेठने उत्तर दिया कि हे महाराज! आपके इस कष्टसे प्रथिवीतलपर मनि भी परम व्यथाको प्रा हुए हैं ॥११॥ उसी समय मुनिसुव्रत भगवान्की वंश-परम्पराको धारण करनेवाले निबन्ध आत्माके धारक, आकाशगामी भगवान् सुत्रत नामक मुनि रामकी दशा जान वहाँ आये ॥१२॥ १. अनंगलवणः म० । २. अनुरागं प्रतापवान् म०, क० । ३. धरणीमण्डले सर्वे सावथं विजयो यथा म०, क० । धरणीमण्डले सर्वे स्युर+विजया यथा ज०। ४. सापराधं । ५. सदःस्थितम् म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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