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________________ पद्मपुराणे एवमुक्ती जगौ राजा पृच्छथः किं शिवं मम । तेषां सर्वसुखान्येव ये श्रामण्यमुपागताः ॥११॥ भवन्तावस्मि पृच्छामि कौ युवां सौम्यदर्शनौ । केन वा कारणेनेदं कृतमीदग्विचेष्टितम् ॥११॥ ततो जटायुर्देवोगादिति जानासि भूपते । गृधोरण्ये यदाशिष्ये शमिष्यामि मुनीक्षणात् ॥११२॥ लालयिष्ये च यत्तत्र भ्रात्रा देव्या सह त्वया । सीता हुता हनिष्ये च रावगेनाऽभियोगकृत् ॥११३।। यच कर्णेजपः शोकविह्वलेन स्वया प्रभो । दापिष्यते नमस्कारः पञ्चसत्पूरुषाश्रितः ॥११॥ सोऽहं भवत्प्रसादेन समारोहं त्रिविष्टपम् । तथाविधं परित्यज्य दुःखं तिर्यग्भवोद्भवम् ।।११५॥ सुरसौख्यमहोदारै र्मोहितेन मया गुरो। अविज्ञेन हि न ज्ञाता तवासाता गतेयती ॥११६॥ अवसानेऽधुना देव त्वत्कर्मकृतचेतनः । किश्चिस्किल प्रतीकारं समनुष्ठातुमागतः ॥१७॥ ऊचे कृतान्तदेवोऽपि गत्वा किञ्चित् सुवेगताम् । सोऽहं नाथ कृतान्ताख्यः सेनानीरभवं तव ॥११८।। स्मर्त्तव्योऽसि स्वया कृच्छे इति बुध्वोदितं त्वया । विधातुं तदहं स्वामिन भवदन्तिकमागतः ॥११॥ विलोक्य वैबुधीमृद्धिं भूतभोगचरा जनाः । परमं विस्मयं प्राप्ता बभूवुर्विमलाशयाः ॥१२०॥ रामो जगाद सेनान्यमप्रमेयं गुरेशिनाम् । उदसीसरता भदौ प्रत्यनीकस्थितात्मनाम् ॥१२१॥ तौ युवामागतौ नाकान्मां प्रबोधयितु सुरौ । महाप्रभावसम्पावत्यन्तशुद्धमानसौ ॥१२२॥ इति सम्भाष्य तौ रामो निष्क्रान्तः शोकसङ्कटात् । सरयूरोधसंवृत्या लक्ष्मणं समिधीकरत् ॥१२३॥ मिलकर श्री रामसे पूछा कि हे नाथ ! क्या ये दिन सुखसे व्यतीत हुए ? देवोंके ऐमा पूछनेपर राजा रामचन्द्रने उत्तर दिया कि मेरा सुख क्या पूछते हो ? समस्त सुख तो उन्हींको प्राप्त है जो मुनि पदको प्राप्त हो चुके हैं ॥१०६-११०।। मैं आपसे पूछता हूँ कि सौम्य दर्शन वाले आप दोनों कौन हैं ? और किस कारण आप लोगोंने ऐसी चेष्टा की ? ॥१११।। तदनन्तर जटायुके जीव देवने कहा कि हे राजन् ! जानते हैं आप, जब मैं वनमें गीध था और मुनिराजके दर्शनसे शान्तिको प्राप्त हुआ था ।।११२॥ वहाँ आपने भाई लक्ष्मण और देवी-सीताके साथ मेरा लालन-पालन किया था। सीता हरी गई थी और उसमें मैं रुकावट डालनेवाला था अतः रावणके द्वारा मारा गया था ॥११३॥ हे प्रभो ! उस समय शोकसे विह्वल होकर आपने मेरे कानमें पञ्च परमेष्ठियोंसे सम्बन्ध रखने वाला पञ्च नमस्कार मन्त्रका जाप दिलाया था॥११४॥ मैं वही जटायु, आपके प्रसादसे उस प्रकारके तिर्यश्च गति सम्बन्धी दुःखका परित्याग कर स्वर्गमें उत्पन्न हुआ था ॥११५॥ हे गुरो! देवोंके अत्यन्त उदार महासुखोंसे मोहित होकर मुझ अज्ञानीने नहीं जाना कि आपपर इतनी विपत्ति आई है॥११६॥ हे देव ! जब आपकी विपत्तिका अन्त आया तब आपके कर्मोदयने मुझे इस ओर ध्यान दिलाया और कुछ प्रतीकार करनेके लिए आया हूँ ॥११७॥ तदनन्तर कृतान्तवक्त्रका जीव भी कुछ अच्छा-सा वेष धारणकर बोला कि हे नाथ ! मैं आपका कृतान्तवक्त्र सेनापति था ।।११८।। आपने कहा था कि 'कष्टके समय मेरा स्मरण रखना' सो हे स्वामिन् ! आपका वही आदेश बुद्धिगतकर आपके समीप आया हूँ ॥११॥ उस समय देवोंकी उस ऋद्धिको देख भोगी मनुष्य परम आश्चर्यको प्राप्त होते हुए निर्मलचित्त हो गये ॥१२०॥ तदनन्तर रामने कृतान्तवक्त्र सेनापति तथा देवोंके अधिपति जटायुके जीवोंसे कहा कि अहो भद्र पुरुषो! तुम दोनों विपत्तिग्रस्त जीवोंका उद्धार करनेवाले हो ॥१२१॥ देखो, महाप्रभावसे सम्पन्न एवं अत्यन्त शुद्ध हृदयके धारक तुम दोनों देव मुझे प्रबुद्ध करनेके लिए स्वर्गसे यहाँ आये ॥१२२॥ इस प्रकार उन दोनोंसे वार्तालाप कर शोकरूपी संकटसे पार हुए रामने सरयू नदीके तटपर लक्ष्मणका दाह संस्कार किया ॥१२३॥ १. मदोदारै-म० । २. ज्ञानेनावधिना ज्ञात्वाऽसाताऽऽगतेदृशी म० । ३. देवसम्बन्धिनीं । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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