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________________ पश्चदशोत्तरशतं पर्व तानि सप्तदश स्त्रीणां सहस्राणि हरेर्दधुः । मन्दमारुतनिधूतचित्राम्बुजवन श्रियम् ॥२६॥ तस्मिंस्तथाविधे नाथे स्थिते कृच्छूसमागतः । ब्याकुले मनसि स्त्रीणां निदधे संशयः पदम् ॥३०॥ सुदुश्चित्तं च दुर्भाष्यं भावं दुःश्रवमेव च । कृत्वा मनसि मुग्धाच्यः पस्पृशुर्मोहसङ्गताः ॥३॥ सुरेन्द्रवनिताचक्रसमचेष्टिततेजसाम् । तदा शोकाभितप्तानां नैतासां चारुताऽभवत् ॥३२॥ श्रुत्वाऽन्तश्चरवक्त्रेभ्यस्तं वृत्तान्तं तथाविधम् । ससम्भ्रमं परिप्राप्तः पभाभः सचिवैर्वृतः ॥३३॥ अन्तःपुरं प्रविष्टश्च परमाप्तजनावृतः । ससम्भ्रमैजनदृष्टो विलितविरलक्रमः ॥३४॥ ततोऽपश्यदतिक्रान्तकान्तयतिसमुद्भवम् । वदनं धरणीन्द्रस्य प्रभातशशिपाण्डरम् ॥३५॥ न सुश्लिष्टमिवात्यन्तं परिभ्रष्टं स्वभावतः । तत्कालभग्नमूलाम्बुरुहसाम्यमुपागतम् ॥३६॥ अचिन्तयच्च किं नाम कारणं येन मे स्वयम् । आस्ते र ष्टो विषादी च किञ्चिद्विनतमस्तकः ॥३७॥ उपसृत्य च सस्नेहं मुहुराघ्राय मूर्द्धनि । हिमाऽऽहतनगाकारं पमस्तं परिषस्वजे ॥३८॥ चिह्नानि जीवमुक्तस्य पश्यापि समन्ततः । अमृतं लचमणं मेने काकुत्स्थः स्नेहनिर्भरः ॥३६॥ नताजयष्टिरावका ग्रीवा दो परिधौ श्लथौ। प्राणनाकुचनोन्मेषप्रभृतीहोडिझता तनुः ॥१०॥ लक्ष्मणके विषयमें निरर्थकपनेको प्राप्त हो गया ।।२८।। गौतम स्वामी कहते हैं कि उस समय लक्ष्मणकी सत्रह हजार स्त्रियाँ मन्द-मन्द वायुसे कम्पित नाना प्रकारके कमल वनकी शोभा धारण कर रही थीं ॥२॥ तदनन्तर जब लक्ष्मण उसी प्रकार स्थित रहे आये तब बड़ी कठिनाईसे प्राप्त हुए संशयने उन स्त्रियोंके व्यग्र मनमें अपना पैर रक्खा ॥३०॥ मोहमें पड़ी हुई वे भोली-भाली स्त्रियाँ मनमें ऐसा विचार करती हुई उनका स्पर्श कर रही थी कि सम्भव है हमलोगोंने इनके प्रति मनमें कुछ खोटा विचार किया हो, कोई न कहने योग्य शब्द कहा हो, अथवा जिसका सुनना भी दुःखदायी है, ऐसा कोई भाव किया हो ॥३१॥ इन्द्राणियोंके समूहके समान चेष्टा और तेजको धारण करनेवाली वे स्त्रियाँ उस समय शोकसे ऐसी संतप्त हो गई कि उनकी सब सुन्दरता समाप्त हो गई ॥३२॥ अथानन्तर अन्तःपुरचारी प्रतिहारोंके मुखसे यह समाचार सुन मन्त्रियोंसे घिरे राम घबड़ाहटके साथ वहाँ आये ॥३३॥ उस समय घबड़ाये हुए लोगोंने देखा कि परम प्रामाणिक जनोंसे घिरे राम जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए अन्तःपुरमें प्रवेश कर रहे हैं ॥३४॥ तदनन्तर उन्होंने जिसको सुन्दर कान्ति निकल चुकी थी और जो प्रातःकालीन चन्द्रमाके समान पाण्डुर वर्ण था ऐसा लक्ष्मणका मुख देखा ॥३५॥ वह मुख पहलेके समान व्यवस्थित नहीं था, स्वभावसे बिलकुल भ्रष्ट हो चका था, और तत्काल उखाडे हए कमलकी सदृशताको प्राप्त हो रहा वे विचार करने लगे कि ऐसा कौन-सा कारण आ पड़ा कि जिससे आज लक्ष्मण मुझसे रूखा तथा विषादयुक्त हो शिरको कुछ नीचा झुकाकर बैठा है ॥३७॥ रामने पास जाकर बड़े स्नेहसे बार-बार उनके मस्तकपर सूंघा और तुषारसे पीड़ित वृक्षके समान आकारवाले उनका बार-बार आलिङ्गन किया ॥३८॥ यद्यपि राम सब ओरसे मृतकके चिह्न देख रहे थे तथापि स्नेहसे परिपूर्ण होनेके कारण वे उन्हें अमृत अर्थात् जीवित ही समझ रहे थे ॥३६॥ उनकी शरीर-यष्टि मुक गई थी, गरदन टेढ़ी हो गई थी, भुजा रूपी अर्गल ढीले पड़ गये थे और शरीर, साँस लेना, हस्त-पादादिक अवयवोंको सिकोड़ना तथा नेत्रोंका टिमकार पड़ना आदि . १.-श्रियाम् म० । २. समागताः म०। ३. तत्कालतरु-म० । ४. वक्रग्रीवा म०। ५. प्राणाना-म० । प्राणानां ज०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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