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________________ पञ्चपुराणे नूनमस्येडशो मृत्युर्विधिनेति कृताशयौ । विषादविस्मयाऽऽपूर्णौ सौधर्ममरुची गतौ ॥१५॥ पश्चात्तापाऽनलज्वालाकात्स्न्यौपालीढमानसौ'। न तत्र तो तिं जातु सम्प्राप्तौ निन्दितारमकौ ॥१६॥ अप्रेचयकारिणां पापमानसानां हतात्मनाम् । अनुष्ठितं स्वयं कर्म जायते तापकारणम् ॥१७॥ दिव्यमायाकृतं कर्म तदा ज्ञात्वा तथाविधम् । प्रसादयितुमुयुक्ताः सौमित्रिं प्रवराः स्त्रियः ॥१८॥ कयाऽकृतज्ञया नाथ मूढयाऽस्यपमानितः । सौभाग्यगर्ववाहिन्या परमं दुर्विदग्धया ॥१६॥ प्रसीद मुच्यता कोपो देव दुःखासिकापि वा । ननु यत्र जने कोपः क्रियतां तत्र यन्मतम् ॥२०॥ इत्युक्त्वा काश्विदालिङ्ग्य परमप्रेमभूमिकाः । निपेतुः पादयो नाचाटुजल्पिततत्पराः ॥२१॥ काश्चिद्वीणां विधायाके तद्गुणग्रामसङ्गतम् । जगुमधुरमत्यन्तं प्रसादनकृताशयाः ॥२२॥ काश्चिदाननमालोक्य कृतप्रियशतोद्यताः । समाभाषयितुं यत्नं सर्वसन्दोहतोऽभवन् ॥२३॥ स्तनोपपीडमाश्लिष्य काश्चिद् विमलविभ्रमाः । कान्तस्य कान्तमाजिघ्नन् गण्डं कुण्डलमण्डितम् ॥२४॥ ईवरपादं समुद्धृत्य काश्चिन्मधुरभाषिताः । चक्रुः शिरसि संफुल्लकमलोदरसन्निभम् ॥२५॥ काश्चिदर्भकसारङ्गीलोचनाः कत्तु मुद्यताः । सोन्मादविभ्रभक्षिप्तकटायोत्पलशेखरम् ॥२६॥ जम्भउजम्मायताः काश्चित्तदाननकृतेक्षणाः । मन्दं बभक्षुरङ्गानि स्वनन्स्यखिलसन्धिषु ॥२७॥ एवं विचेष्टमानानां तासामुत्तमयोषिताम् । यत्नोऽनर्थकता प्राप तत्र चैतन्यवर्जिते ॥२८॥ हुए परन्तु वे जीवन देने में समर्थ नहीं हो सके ॥१४॥ निश्चय ही इसकी इसी विधिसे मृत्यु होनी होगी' ऐसा विचारकर विषाद और आश्चर्यसे भरे हुए दोनों देव निष्प्रभ हो सौधर्म स्वर्ग चले गये ॥१५॥ पश्चात्ताप रूपी अग्निकी ज्वालासे जिनका मन समस्तरूपसे व्याप्त हो रहा था तथा जिनकी आत्मा अत्यन्त निन्दित थी ऐसे वे दोनों देव स्वर्गमें कभी धैर्यको प्राप्त नहीं होते थे अर्थात् रात-दिन पश्चात्तापकी ज्वालामें झुलसते रहते थे॥१६॥ सो ठीक ही है क्योंकि विना विचारे काम करनेवाले नीच, पापी मनुष्योंका किया कार्य उन्हें स्वयं सन्तापका कारण होता है ॥१७॥ तदनन्तर 'यह कार्य लक्ष्मणने अपनी दिव्य मायासे किया है। ऐसा जानकर उस समय उनकी उत्तमोत्तम स्त्रियाँ उन्हें प्रसन्न करनेके लिए उद्यत हुई ॥१८॥ कोई स्त्री कहने लगी कि हे नाथ ! सौभाग्यके गर्वको धारण करनेवाली किस अकृतज्ञ, मूर्ख और कुचतुर स्त्रीने आपका अपमान किया है ? ॥१॥ हे देव ! प्रसन्न हूजिए, क्रोध छोडिए तथा यह दुःखदायी आसन भी दूर कीजिए | यथार्थमें जिसपर आपका क्रोध हो उसका जो चाहें सो कीजिए ॥२०॥ यह कहकर परम प्रमको भूमि तथा नाना प्रकारके मधुर वचन कहने में तत्पर कितनी ही स्त्रियों आलिगान कर उनके चरणों में लोट गई ।।२१।। प्रसन्न करनेकी भावना रखनेवाली कितनी ही स्त्रियाँ गोदमें वीणा रख उनके गुण-समूहसे सम्बन्ध रखनेवाला अत्यन्त मधुर गान गाने लगीं ॥२२॥ सैकड़ों प्रिय वचन कहनेमें तत्पर कितनी ही स्त्रियाँ उनका मुख देख वार्तालाप करानेके लिए सामहिक यत्न कर रही थीं ॥२३॥ उज्ज्वल शोभाको धारण करनेवाली कितनी ही स्त्रियों स्तनों को पीड़ित करनेवाला आलिङ्गन कर पतिके कुण्डलमण्डित सुन्दर कपोलको सूंघ रही थीं ॥२४॥ मधुर भाषण करनेवाली कितनी ही स्त्रियाँ, विकसित कमलके भीतरी भागके समान सुन्दर उनके पैरको कुछ ऊपर उठाकर शिरपर रख रही थीं ॥२५॥ बालमृगीके समान चश्चल नेत्रोंको धारण करनेवाली कितनी ही स्त्रियाँ उन्माद तथा विभ्रमके साथ छोडे हए कटाक्ष रूपी नील कमलोंका सेहरा बनानेके लिए ही मानो उद्यत थीं ॥२६॥ लम्बी जमुहाई लेनेवाली कितनी ही स्त्रियाँ उनके मुखकी ओर दृष्टि डालकर धीरे-धीरे अँगड़ाई ले रही थी और अँगुलियोंकी संधिया चटका रही थीं ॥२७॥ इस प्रकार चेष्टा करने वाली उन उत्तम स्त्रियोंका सब यत्न चेतनारहित १. कर्मापालीट म० । २. जातौ म० । ३. यन्मनः म० । ४. नर्थकतःमः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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