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________________ ३५४ पद्मपुराणे सरितो विशदद्वीपा नितान्तविमलाम्भसः । वापीः प्रवरसोपानास्तको पादपाः ॥२८॥ नाना जलज किञ्जल्क किर्मीरसलिलानि च । सरांसि मधुरस्वानैः सेवितानि पतत्रिभिः ॥ २३॥ महातरङ्गसङ्गोत्थफेनमालागृहासिनीः । महाया दोगणाकीर्णा बहुचित्रा महानदीः ॥३०॥ विलसद्वनमालाभिर्युक्तान्युपवनैर्वरैः । मनोहरणदक्षाणि चित्राण्यायतनानि च ||३१|| 'जिनेन्द्र वरकूटानि नानारत्नमयानि च । कश्मपचोददक्षाणि युक्तमानान्यनेकशः ॥ ३२ ॥ एवमादीनि वस्तूनि वीक्षमाणः शनैः शनैः । सेव्यमानश्च कान्ताभिर्यात्यसौ परमोदयः ॥ ३३ ॥ नभः शिरः समारूढो विमान शिखर स्थितः । दर्शयन् याति तद्वस्तु कान्तां हृष्टतनूरुहः ||३४|| पश्य पश्य प्रिये धामान्यतिरम्याणि मन्दरे । स्नपनानि जिनेन्द्राणाममूनि शिखरान्तिके ॥३५॥ नानारत्नशरीराणि भास्करप्रतिमानि च । शिखराणि मनोज्ञानि तुङ्गानि विपुलानि च ||३६|| गुहा मनोहरद्वारा गम्भीरा रत्नदीपिताः । परस्परसमाकीर्णा दीधितीरतिदूरगाः ॥ ३७ ॥ इदं महीतले रम्यं भद्रशालाह्वयं वनम् । मेखलायामिदं तच्च नन्दनं प्रथितं भुवि ||३८|| इदं वचः प्रदेशस्य कल्पद्रुमलतात्मकम् । नानारत्नशिलाशोभि वनं सौमनसं स्थितम् ||३३|| 'जिनागारसहस्राढ्यं त्रिदशक्रीडनोचितम् । पाण्डुकाख्यं वनं भाति शिखरे सुमनोहरम् ||४०|| अच्छिन्नोत्सव सन्तान महमिन्द्रजगत्समम् । यक्ष किन र गन्धर्व सङ्गीतपरिनादितम् ॥ ४१ ॥ सुरकन्यासमाकीर्णमप्सरोगणसङ्कुलम् । विचित्रगणसम्पूर्ण दिव्यपुष्पसमन्वितम् ॥ ४२ ॥ सुमेरोः शिखरे रम्ये स्वभावसमवस्थिते । इदमालोक्यते जैनं भवनं परमाद्भुतम् ॥ ४३ ॥ सेवनीय थे ऐसे विचित्र वन, रत्नोंसे जगमगाते हुए पर्वत, जिनमें निर्मल टापू थे तथा अत्यन्त स्वच्छ पानी भरा था ऐसी नदियाँ, जिनमें उत्तम सीढ़ियाँ लगी थीं तथा जिनके सोंपर ऊँचेऊँचे वृक्ष खड़े थे ऐसी वापिकाएँ, नानाप्रकारके कमलोंकी केशरसे जिनका पानी चित्र-विचित्र हो रहा था तथा जो मधुर शब्द करनेवाले पक्षियोंसे सेवित थे ऐसे सरोवर, जो बड़ी-बड़ी तरङ्गों के साथ उठी हुई नपक्तिसे मानो अट्टहास कर रही थीं तथा जो बड़े-बड़े जल-जन्तुओंसे व्याप्त थीं ऐसी अनेक आश्चर्यों से भरी महानदियाँ, सुशोभित वन-पंक्तियों एवं उत्तमोत्तम उपवनोंसे युक्त तथा मनको हरण करनेमें निपुण नाना प्रकारके भवन, और नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित, पाप नष्ट करनेमें समर्थ तथा योग्य प्रमाणसे युक्त अनेकों जिनकूट इत्यादि वस्तुओं को देखता तथा स्त्रियों के द्वारा सेवित होता हुआ परम अभ्युदयका धारक हनूमान् धीरे-धीरे चला जा रहा था ।। २६-३३ ।। जो आकाशमें बहुत ऊँचे चढ़कर विमानके शिखरपर स्थित था तथा जिसके रोमाश्च निकल रहे थे ऐसा वह हनूमान् स्त्रीके लिए तत् तत् वस्तुएँ दिखाता हुआ जा रहा था ||३४|| वह कहता जाता था कि हे प्रिये ! देखो देखो, सुमेरु पर्वत पर शिखर के समीप वे कितने सुन्दर स्थान हैं वहीं जिनेन्द्र भगवान् के अभिषेक हुआ करते हैं ||३५|| ये नाना रत्नोंसे निर्मित; सूर्य तुल्य, मनोहर, ऊँची और बड़े-बड़े शिखर देखो || ३६ || इन मनोहर द्वारोंसे युक्त तथा रत्नों आलोकित गम्भीर गुफाओं और परस्पर एक दूसरे से मिलीं, दूर-दूर तक फैलनेवाली किरणों को देखो ||३७|| यह पृथिवीतलपर मनोहर भद्रशाल वन है, यह मेखलापर स्थित जगत्प्रसिद्ध नन्दन वन है, यह उपरितन प्रदेशके वक्षःस्थलस्वरूप, कल्पवृक्ष और कल्पवेलोंसे तन्मय एवं नाना रत्नमयी शिलाओंसे सुशोभित सौमनस वन है, और यह उसके शिखरपर हजारों जिनमन्दिरोंसे युक्त देवोंकी क्रीड़ाके योग्य पाण्डुक नामका अत्यन्त मनोहर वन हैं ॥ ३८-४०॥ यह सुमेरु स्वाभाविक सुरम्य शिखरपर परम आश्चर्योंसे भरा हुआ वह जिनमन्दिर दिखाई देता है कि जिसमें उत्सवों की परम्परा कभी टूटती ही नहीं है, जो अहमिन्द्र लोकके समान है, यक्ष १. जिनेन्द्र नर-म० । २. समुद्धृततनूरुहः म० । ३. लतान्तकम् म० । ४. जिनागारं सहस्राढ्यौं । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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