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________________ नवोत्तरशतं पर्व पतिपुत्रान् परित्यज्य विष्टपण्यातचेष्टिता । निष्क्रान्ता कुरुते सीता यत्तद्वच्यामि ते शृणु ॥१॥ तस्मिन् विहरते काले श्रीमान् सकलभूषणः । दिव्यज्ञानेन यो लोकमलोकं चावबुध्यते ॥२॥ अयोध्या सकला येन गृहाश्रमविधौ कृता । सुधृत्या सुस्थितिं प्राप्ता सद्धर्मप्रतिलम्भिता ॥३॥ प्रजा च सकला तस्य वाक्ये भगवतः स्थिता । रेजे साम्राज्ययुक्तेन राज्ञेव कृतपालना ॥४॥ सद्धर्मोत्सवसन्तानस्तत्र काले महोदयः । सुप्रबोधतमो लोकः साधुपूजनतत्परः ॥५॥ मुनिसुव्रतनाथस्य तत्तीर्थ भवनाशनम् । विराजतेतरां यद्वदरमल्लिजिनान्तरम् ॥६॥ अपि या त्रिदशस्त्रीणामतिशेते मनोज्ञताम् । तपसा शोषिता साऽभूत्सीता दग्धेव माधवी ॥७॥ महासंवेगसम्पन्ना दुर्भावपरिवर्जिता । अत्यन्त निन्दितं स्त्रीत्वं चिन्तयन्ती सती सदा ॥८॥ संसक्तभूरजोवस्त्रबद्धोरस्कशिरोरुहा । अस्नानस्वेदसञ्जातमलकम्चुकधारिणी ॥६॥ अष्टमार्द्धत्तु कालादिकृतशास्त्रोक्तपारणा । शीलवतगुणासक्ता रत्यरत्यपवर्जिता ॥१०॥ अध्यात्मनियतात्यन्तं शान्ता स्वान्तवशामिका । तपोऽधिकुरुतेऽत्युग्रं जनान्तरसुदुःसहम् ॥११॥ मांसवर्जितसर्वाङ्गा ब्यक्तास्थिस्नायुपञ्जरा । पार्थिवव्यनिर्मुक्ता पौस्तीव प्रतियातना ॥१२॥ अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जिसकी चेष्टाएँ समस्त संसार में प्रसिद्धि पा चुकी थीं ऐसी सीता पति तथा पुत्रका परित्याग कर तथा दीक्षित हो जो कुछ करती थी वह तेरे लिए कहता हूँ सो सुन ।। १॥ उस समय यहाँ उन श्रीमान् सकलभूषण केवलीका विहार हो रहा था जो कि दिव्यज्ञानके द्वारा लोक अलोकको जानते थे ॥२॥ जिन्होंने समस्त अयोध्याको गृहाश्रमका पालन करने में निपुण, संतोषसे उत्तम अवस्थाको प्राप्त एवं समीचीन धर्मसे सुशोभित किया था ॥३॥ उन भगवानके वचनमें स्थित समस्त प्रजा ऐसी सुशोभित होती थी मानो साम्राज्यसे युक्त राजा ही उसका पालन कर रहा हो ॥४॥ उस समयके मनुष्य समीचीन धर्मके उत्सव करनेवाले, महाभ्युदयसे सम्पन्न, सम्यग् ज्ञानसे युक्त एवं साधुओंकी पूजा करनेमें तत्पर रहते थे ॥५॥ मुनिसुव्रत भगवान्का वह संसारापहारी तीर्थ उस तरह अत्यधिक सुशोभित हो रहा था जिस तरह कि अरनाथ और मल्लिनाथ जिनेन्द्रका अन्तर काल सुशोभित होता था ॥६॥ तदनन्तर जो सीता देवाङ्गनाओंकी भी सुन्दरताको जीतती थी वह तपसे सूखकर ऐसी हो गई जैसी जली हुई माधवी लता हो ॥७॥ वह सदा महासंवेगसे सहित तथा खोटे भावोंसे दूर रहती थी तथा स्त्री पर्यायको सदा अत्यन्त निन्दनीय समझती रहती थी ॥८॥ पृथिवीकी धूलिसे मलिन वस्त्रसे जिसका वक्षःस्थल तथा शिरके बाल सदा आच्छादित रहते थे, जो स्नानके अभावमें पसीनासे उत्पन्न मैल रूपी कञ्चकको धारण कर रही थी, जो चार दिन, एक पक्ष तथा ऋतुकाल आदिके बाद शास्त्रोक्त विधिसे पारणा करती थी, शीलव्रत और मूलगुणोंके पालन करने में तत्पर रहती थी, राग-द्वेषसे रहित थी, अध्यात्मक चिन्तनमें तत्पर रहती थी, अत्यन्त शान्त थी, जिसने अपने आपको अपने मनके अधीन कर रक्खा था, जो अन्य मनुष्योंके लिए दुःसह, अत्यन्त कठिन तप करती थी, जिसका समस्त शरीर मांससे रहित था, जिसकी हड्डी और आँतोका पञ्जर प्रकट दिख रहा था, जो पार्थिव तत्त्वसे रहित लकड़ी आदिसे बनी प्रतिमा १. पुस्तनिर्मिता । २. प्रतिमेव । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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