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________________ सप्तोत्तरशतं पर्व ३३१ अथ स्वाभाविकी दृष्टिं बिभ्राणः सहसम्भ्रमः । अधिगम्य सती सीतां भक्तिसंहान्वितोऽनमत् ॥४॥ नारायणोऽपि सौम्यात्मा प्रणम्य रचिताञ्जलिः । अभ्यनन्दयदायाँ तो पद्मनाभमनुवन् ॥४२॥ धन्या भगवति त्वं नो वन्द्या जाता सुचेष्टिता । शीलाचलेश्वरं या त्वं क्षितिवदहसेऽधना ॥४३॥ जिनवागमृतं लब्धं परमं प्रथमं त्वया । 'निरुक्तं येन संसारसमुद्रं प्रतरिष्यसि ॥४॥ अपरासामपि स्त्रीणां सतीनां चारुचेतसाम् । इयमेव गतिभूयालोकद्वितयशंसिता ॥४५॥ आत्मा कुलद्वयं लोकस्त्वया सर्व प्रसाधितम् । एवंविधं क्रियायोगं भजन्त्या साधुचित्तया ॥४६॥ क्षन्तव्यं यत्कृतं किञ्चित्सुनये साध्वसाधु वा । संसारभावसक्तानां स्खलितं च पदे पदे ॥४॥ त्वयैवंविधया शान्ते जिनशासनसक्तया। परमानन्दितं चित्तं विषाद्यपि मनस्विनि ॥४८॥ भभिनन्छेति वैदेही प्रहृष्टमनसाविव । प्रयातौ नगरौं कृत्वा पुरस्तालवणाङ्कुशौ ॥४॥ विद्याधरमहीपालाः प्रमोदं परमं गताः । विस्मयाकम्पिता भूत्या परया ययुरप्रतः ॥५०॥ मध्ये राजसहस्राणां वर्तमानी मनोहरौ । पुरं विविशतुर्वीराविन्द्राविव सुरावृतौ ॥५१॥ देव्यस्तदग्रतो नानायानारूढा विचेतसः। प्रययुः परिवारेण यथाविधि समाश्रिता ॥५२॥ प्रविशन्तं बलं वीचय नार्यः प्रासादम गाः। विचित्ररससम्पन्नमभाषन्त परस्परम् ॥५३॥ अयं श्रीबलदेवोऽसौ मानी शुद्धिपरायणः । अनुकूला प्रिया येन हारिता सुविपश्चिता ॥५॥ जगौ काचित्प्रवीराणां विशुद्धकुलजन्मनाम् । नराणां स्थितिरेषेव कृतमेतेन सुन्दरम् ॥५५।। को रोक सके थे ऐसे श्रीराम किसी तरह पीड़ा रहित हुए ॥४०॥ अथानन्तर स्वाभाविक दृष्टिको धारण करते हुए रामने सम्भ्रमके साथ सती सीताके पास जाकर भक्ति और स्नेहके साथ उसे नमस्कार किया ॥४१॥ रामके साथ ही साथ सौम्यहृदय लक्ष्मणने भी हाथ जोड़ प्रणामकर आर्या सीताका अभिनन्दन किया ॥४२॥ और कहा कि हे भगवति ! तुम धन्य हो, उत्तम चेष्टा की धारक हो और यतश्च इस समय पृथिवीके समान शीलरूपी सुमेरुको धारण कर रही हो अतः हम सबकी वन्दनीय हो ॥४३॥ जिसके द्वारा तुम संसार-समुद्रको चुपचाप पार करोगी वह श्रेष्ठ जिनवचन रूपी अमृत सर्व प्रथम तुमने ही प्राप्त किया है ।। ४४॥ हम चाहते हैं कि सुन्दर चित्तकी धारक अन्य पतिव्रता स्त्रियोंकी भी दोनों लोकोंमें प्रशंसनीय यही गति हो ॥४॥ इस प्रकारके क्रियायोगको प्राप्त करनेवाली एवं उत्तम चित्तकी धारक तुमने अपनी आत्मा दोनों कुल तथा लोक सब कुछ वशमें किया है ।।४६।। हे सुनये ! हमने जो कुछ साधु अथवा असाधु-अच्छा या बुरा कर्म किया है वह क्षमा करने योग्य है क्योंकि संसार दशामें आसक्त मनुष्योंसे भल पदपदपर होती है ॥४ा हे शान्ते ! हे मनस्विनि ! इस तरह जिन-शासनमें आसक्त रहनेवाली तुमने मेरे विषाद युक्त चित्तको भी अत्यन्त आनन्दित कर दिया है।।४८इस प्रकार सीताकी प्रशंसा कर प्रसन्न चित्तकी तरह राम तथा लक्ष्मण, लवण और अंकुशको आगे कर नगरीकी ओर चले ॥४॥ परम हर्षको प्राप्त हुए विद्याधर राजा विस्मयाकम्पित होते हुए बड़े वैभवसे आगे-आगे जा रहे थे ॥५०॥ हजारों राजाओंके मध्यमें वर्तमान दोनों मनोहर वीरोंने, देवोंसे घिरे हुए इन्द्रोंके समान नगरमें प्रवेश किया ॥५१॥ उनके आगे नाना प्रकारके वाहनोंपर आरूढ़, बेचैन एवं अपने-अपने परिकरसे विधिपूर्वक सेवित रानियाँ जा रही थीं ॥५२॥ रामको प्रवेश करते देख महलके शिखरों पर आरूढ़ स्त्रियाँ, विचित्र रससे युक्त परस्पर वार्तालाप कर रही थीं ॥५३।। कोई कह रही थी कि ये राम बड़े मानी तथा शुद्धिमें तत्पर हैं कि जिन्होंने विद्वान् होकर भी अपनी अनुकूल प्रिया हरा दी है-छोड़ दी है ॥५४॥ कोई कह रही थी कि विशुद्ध कुलमें जन्म लेनेवाले वीर मनुष्यों १. निसक्तं -म०। २. प्रकृष्टमनसाविव म.१३. रामम् । ४१-३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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