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________________ २८० पद्मपुराणे ततोऽन्धकारितं व्योम धूमेन घनमुद्यता । अभूदकालसम्प्राप्तप्रावृटमेधैरिवावृतम् ॥१४॥ नृङ्गात्मकमिवोद्भुतं जगदन्यदिदं तदा । कोकिलात्मकमाहोस्विदाहो पारावतात्मकम् ।।१५।। अशक्नुवन्निव द्रष्टुमुपसर्ग तथाविधम् । दयाहृदयः शीघ्रं भानुः क्वापि तिरोदधे ।।१६।। 'जज्वालज्वलनश्चोग्रः सर्वाशासु महाजयः । गव्यतिपरिमाणाभिर्वालाभिर्विकरालितः ।।१७।। किं निरन्तरतीब्रांशुसहस्रपछादित नभः । २पातालकिंशुकागौघाः सहसा कि समुत्थिताः ॥१८॥ आहोस्द्गिगनं प्राप्तमुत्पातमयसन्ध्यया । हाटकात्मकमेकं तु प्रारब्धं भवितुं जगत् ।।१६॥ सौदामिनीमपं किन्नु सम्जातं भुवनं तदा । जिगीषया परो जातः किमु जङ्गममन्दरः ॥२०॥ ततः सीता समुत्थाय नितान्तस्थिरमानसा। कायोत्सर्ग क्षणं कृत्वा स्तुत्वा भावाप्तिान जिनान् ॥२१॥ ऋपभादीनमस्कृत्य धर्मतीर्थस्य देकान् । सिद्धान् समस्तसाधूंश्च सुवतं च जिनेश्वरम् ।।२२।। यस्य संसेव्यते तीर्थ तदा सम्मदधारिभिः । परमैश्वर्यसंयुक्तस्त्रिदशासुरमानवैः ॥२३॥ सर्वप्राणिहिताऽऽचार्यचरणौ च मनःस्थितौ । प्रणम्योदारगम्भीरा विनीता जानकी जगौ ॥२४॥ कर्मणा मनसा वाचा राम मुक्त्वा परं नरम् । समुद्बहामि न स्वप्नेप्यन्यं सत्यमिदं मम ॥२५|| यद्येतदनृतं वरिम तदा मामेष पावकः । भस्मसाद्भावमप्राप्तामपि प्रापयतु सणात् ॥२६॥ अथ पद्मानरं नान्यं मनसाऽपि वहाम्यहम् ! ततोऽयं ज्वलनो धातीन्मा मां शुद्धिसमन्विताम् ॥२७॥ तदनन्तर अत्यधिक उठते हुए धूमसे आकाश अन्धकारयुक्त हो गया और ऐसा जान पड़ने लगा मानो असमयमें प्राप्त हुए वर्षाकालीन मेघोंसे ही व्याप्त हो गया हो ।।१४।। उस समय जगत् ऐसा जान पड़ने लगा मानो भ्रमरोंसे युक्त, कोकिलाओंसे युक्त अथवा कबूतरोंसे युक्त दूसग ही जगत् उत्पन्न हुआ है ॥१५॥ सूर्य आच्छादित हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो दयासे आहृदय होनेके कारण उस प्रकारके उपसर्गको देखनेके लिए असमर्थ होता हुआ शीघ्र ही कहीं जा छिपा हो ॥१६।। उस वापीमें ऐसी भयङ्कर अग्नि प्रज्वलित हुई कि समस्त दिशाओं में जिसका महावेग फैल रहा था और जो कोशों प्रमाण लम्बी-लम्बी ज्वालाआंसे विकराल थी ॥१७॥ उस समय उस अग्निको देख इस प्रकार संशय उत्पन्न होता था कि क्या एक साथ उदित हुए हजारों सूर्योसे आकाश आच्छादित हो रहा है ? अथवा पाताललोकके पलाश वृक्षोंका समूह क्या सहसा ऊपर उठ आया है ? अथवा आकाशको क्या प्रलयकालीन सन्ध्याने घेर लिया है ? अथवा यह समस्त जगत् एक सुवर्णरूप होनेकी तैयारी कर रहा है अथवा समस्त संसार बिजलीमय हो रहा है अथवा जीतनेकी इच्छासे क्या दूसरा चलता-फिरता मेरु ही उत्पन्न हुआ है ? ॥१८-२०॥ तदनन्तर जिसका मन अत्यन्त दृढ़ था ऐसी सीताने उठकर क्षणभरके लिए कायोत्सर्ग किया, भावनासे प्राप्त जिनेन्द्र भगवान् की स्तुति की, ऋषभादि तीर्थंकरीको नमस्कार किया, सिद्ध परमेष्ठी, समस्त साधु और मुनिसुव्रत जिनेन्द्र, जिनके कि तीर्थकी उस समय हर्षके धारक एवं परम ऐश्वर्यसे युक्त देव असुर और मनुष्य सदा सेवा करते हैं और मनमें स्थित सर्वप्राणि हितैपी आचार्यके चरणयुगल इन सबको नमस्कार कर उदात्त गाम्भीर्य और जत्यधिक विनयसे युक्त ताने कहा ।।२१-२४॥ कि मैंने रामको छोड़कर किसी अन्य मनुष्यको स्वप्नमें भी मन-वचन और कार्यसे धारण नहीं किया है यह मेरा सत्य है ।।२५।। यदि मैं यह मिथ्या कह रही हूँ तो यह अग्नि दूर रहने पर भी मुझे क्षण भरमें भस्मभावको प्राप्त करादे-राखका ढेर बना दे ॥२६॥ और यदि मैंने रामके सिवाय किसी अन्य मनुष्यको मनसे भी धारण नहीं किया है तो विशुद्धिसे १.प्रज्वाल-म० । २. पातालं किंशुकां गौघाः म । ३. किन्तु म०१ ४. कार्यात्सर्ग मः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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