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________________ पद्मपुराणे उपद्रवैर्यदाऽमीभिः स्खलितं नास्य मानसम् । तदा तस्य मुनीन्द्रस्य ज्ञानं केवलमुद्गतम् ॥ ११७ ॥ ततः केवलसम्भूतिमहिमाहितमानसाः । सुरासुराः समायाताः सुनाशीरपुरःसराः ॥११८॥ स्तम्बेरमैर्मृगाधीशैः स्थूरीष्पृष्ठः क्रमेलकैः । बालेयैरुरुभिर्व्याघ्रैः शरभैः सृमरैः खगैः ॥ ११६॥ विमानैः स्यन्दनैर्युग्यैर्यानैरन्यैश्च चारुभिः । ज्योतिःपथं समासाद्य महासम्पत्समन्विताः ॥१२०॥ पवनोद्द्दतसत्केशवस्त्र केतनपंक्तयः । मौलिकुण्डलहारांशुसमुद्योतितपुष्करा ॥१२१॥ अप्सरोगणसङ्कीर्णाः साकेताभिमुखाः सुराः । अवतेरुरलं हृष्टाः पश्यन्तो धरणीतलम् ॥ १२२ ॥ अवलोक्य ततः सीतावृत्तान्तं मेषकेतनः । शक्रं जगाद देवेन्द्र पश्येदमपि दुष्करम् ॥ १२३ ॥ सुराणामपि दुःस्पर्शो महाभयसमुद्भवः । सीताया उपसर्गोऽयं कथं नाथ प्रवर्त्तते ॥ १२४ ॥ श्राविकायाः सुशीलायाः परमस्वच्छ देतसः । दुरीयः कथमेतस्या जायतेऽयमुपप्लवः ॥ १२५ ॥ आखण्डलस्ततोऽवोचदहं सकलभूषणम् । स्वरितं बन्दितु यामि कर्त्तव्यं वमिहाश्रय ॥ १२६ ॥ अभिधायेति देवेन्द्रो महेन्द्रोदयसम्मुखम् । ययावेषोऽपि मेपाङ्कः सीतास्थानमुपागमत् ॥१२७॥ तत्र व्योमतलस्थोऽसौ विमानशिखरे स्थितः । सुमेरुशिखरच्छाये समुद्योतयते दिशाम् ॥ १२८ ॥ आर्यागीतिच्छन्दः २७८ रविवि विराजमानः सर्वजनमनोहरं स पश्यति रामम् ॥ १२६ ॥ इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे सकलभूषणदेवागमनाभिधानं नाम चतुरुत्तरशतं पर्व ॥ १०४ ॥ दिव्य स्त्रियों का रूप दिखाकर उपसर्ग किया ||११६ ।। परन्तु जब इन उपसर्गों से इनका मन विचलित नहीं हुआ तब इन मुनिराजको केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ॥ ११७ ॥ तदनन्तर केवलज्ञान उत्पन्न होनेकी महिमामें जिनका मन लग रहा था ऐसे इन्द्रष्ट आदि समस्त सुर असुर वहाँ आये ॥ ११८ ॥ हाथी, सिंह, घोड़े, ऊँट, गधे, बड़े-बड़े व्याघ्र, अष्टापद, सामर, पक्षी, विमान, रथ, बैल, तथा अन्य अन्य सुन्दर वाहनोंसे आकाशको आच्छादित कर सब लोग अयोध्या की ओर आये। जिनके केश, वस्त्र तथा पताकाओंकी पङ्क्तियाँ वायुसे हिल रही थीं तथा जिनके मुकुट, कुण्डल और हारकी किरणोंसे आकाश प्रकाशमान हो रहा था ॥११८-१२१।। जो अप्सराओंके समूहसे व्याप्त थे तथा जो अत्यन्त हर्षित हो पृथिवीतलको अच्छी तरह देख रहे थे ऐसे देव लोग नीचे उतरे || १२२|| तदनन्तर सीताका वृत्तान्त देख के नामक देवने अपने इन्द्रसे कहा कि हे देवेन्द्र ! जरा इस अत्यन्त कठिन कार्यको भी देखो || १२३॥ हे नाथ ! देशों को भी जिसका स्पर्श करना कठिन है तथा जो महाभयका कारण है ऐसा यह सीताका उपसर्ग क्यों हो रहा है ? सुशील एवं अत्यन्त स्वच्छ हृदयको धारण करनेवाली इस श्राविका के ऊपर यह दुरीक्ष्य उपद्रव क्यों हो रहा है ? ॥१२४ - १४५॥ तदनन्तर इन्द्र ने कहा कि मैं सकलभूषण केवलीकी वन्दना करने के लिए शीघ्रता से जा रहा हूँ इसलिए यहाँ जो कुछ करना योग्य हो वह तुम करो || १२६|| इतना कहकर इन्द्र महेन्द्रोदय उद्यानके सन्मुख चला और यह मेषकेतु देव सीताके स्थान पर पहुँचा ॥१२७॥ वहाँ यह आकाशतलमें सुमेरु के शिखर के समान कान्तिसे युक्त दिशाओं को प्रकाशित करने लगा ! विमानके शिखरपर स्थित हुआ ॥ १२८ ॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि उस विमानकी शिखर पर सूर्य के समान सुशोभित होनेवाले उस मेषकेतु देवने वहीं से सर्वजन मनोहारी रामको देखा || १२६ ॥ इस प्रकार आ नामसे प्रसिद्ध श्रीरविषेणाचार्य द्वारा कथित श्री पद्मपुराण में सकलभूषण के केवलज्ञानोत्सवमें देवोंके श्रागमनका वर्णन करनेवाला एकसौचौथा पर्व समाप्त हुआ || १०४ || १. ' समुद्यतयते दिशाम्' इति पाठः न पुस्तके एव विद्यते । अन्येषु पुस्तकेषु पाठो नास्त्येव । २.१२६ तमश्लोकस्य पूर्वाः पुस्तकचतुष्टयेऽपि नास्ति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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