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________________ चतुरुत्तरशतं पर्व विजया:त्तरे वास्ये सर्वपूर्वत्र शोभिते । गुजाभिधाननगरे राजाऽभूत् सिंहविक्रमः ॥१०३॥ तस्य श्रीरित्यभूभार्या पुत्रः सकलभूषणः । अष्टौ शतानि तत्कान्ता अग्रा किरणमण्डला ॥१०॥ कदाचित्सा सपत्नीभिरुच्यमाना सुमानसा । चित्रे मैथुनिकं चक्रे देवा हेमशिखाभिधम् ॥१०५॥ तं राजा सहसा वीच्य परमं कोपमागतः । परनीभिश्चोच्यमानश्च प्रसादं पुनरागमत् ॥१०६॥ सम्मदेनान्यदा सुप्ता साध्वी किरणमण्डला । मुहहेंमशिखाभिख्यां प्रमादात्समुपाददे ॥१०७॥ श्रुत्वा तां सुतरां क्रुद्धो राजा वैराग्यमागतः । प्राबाजीत्साऽपि मृत्वाऽभूद्विद्युदास्येति राक्षसी ॥१०॥ तस्य सा भ्रमतो भिक्षां कृत्वा त्रुटितबन्धनम् । मतङ्ग परिक्रुद्धा प्रत्यूहनिरताऽभवत् ॥१०॥ गृहदाह रजोवर्षमश्वोक्षाभिमुखागमम् । कण्टकावृतमार्गवं तथा चक्रे दुरीहिता ।।११०॥ छित्त्वाऽन्यदा गृहे सन्धिये प्रतिमया स्थितम् । स्थापयत्यानने तस्य स चौर इति गृह्यते ॥११॥ मुच्यते च पराभूय परमार्थपराङ्मुखैः । महता जनवृन्देन स्वनता बद्धमण्डलः ॥११२॥ कृतभिक्षस्य नियोतः कदाचिशिक्षदा स्त्रियः । हारं गलेऽस्य बध्नाति स चौर इति कथ्यते ।। ११३॥ अतिकरमनाः पापा एवमादीनुपद्रवान् । चक्रे सा सस्य निर्वेदरहिता सततं परान् ॥११॥ ततोऽस्य प्रतिमास्थस्य महेन्द्रोद्यानगोचरे । उपसर्ग परं चक्रे पूर्ववैरानुबन्धतः ॥११५॥ वेतालैः करिभिः सिंहैयाङ्ग्रहप्रेमहोरगैः । नानारूपैर्गुणैर्दिव्यनारीदर्शनलोननैः ॥११६॥ इनके पूर्व वैरका सम्बन्ध पूछा सो गणधर भगवान् बोले कि हे नरेन्द्र ! सुनो ॥१०२।। विजयाधपर्वतकी उत्तर श्रेणीमें सर्वत्र सुशोभित गुंजा नामक नगरमें एक सिंहविक्रमनामक राजा रहता था। उसकी रानीका नाम श्री था और उन दोनोंका सकलभूषण नामका पुत्र था । सकलभूषणकी आठ सौ स्त्रियाँ थीं उनमें किरणमण्डला प्रधान स्त्री थी ॥१०३-१०४॥ शुद्धहृदयको धारण करनबाली किरणमण्डलाने किसी समय सपत्नियोंके कहनेपर चित्रपट में अपने मामाके पुत्र हमशिख का रूप लिखा उसे देख राजा सहसा परम कोपको प्राप्त हुआ परन्तु अन्य पत्नियोंके कहने पर वह पुनः प्रसन्नताको प्राप्त हो गया ।।१०५-१०६॥ पतिव्रता किरणमण्डला किसी समय हप सहित अपने पतिके साथ सोई हुई थी सो सोते समय प्रमादके कारण उसने बार-बार हेमरथका नाम उच्चारण किया जिसे सुनकर राजा अत्यन्त कुपित हुआ और कुपित होकर उसने वैराग्य धारण कर लिया। उधर किरणमण्डला भी साध्वी हो गई और मरकर विद्यद्वक्त्रा नामकी राक्षसी हुई ॥१७-१०८।। जव सकलभूपणमुनि भिक्षाके लिए भ्रमण करते थे तब वह दुष्ट राक्षसी कुपित हो अन्तगय करनेमें तत्पर हो जाती थी। कभी वह मत्त हाथीका बन्धन तोड़ देती थी, कभी घरमें आग लगा देतो थी, कभी रजकी वर्षा करने लगती थी, कभी घोड़ा अथवा बैल बनकर उनके सामने आ जाती थी और कभी मार्गको कण्टकांसे आवृत कर देती थी ॥१०६-११०।। कभी प्रतिमायोगसे विराजमान मुनिराजको, घरमें सन्धि फोड़कर उसके आगे लाकर रख देती थी और यह कहकर पकड़ लेती थी कि यही चोर है तब हल्ला करते हुए लोगोंको भीड़ उन्हें धेर लेनी थी, कुछ परमाथसे विमुख लोग उनका अनादर कर उसके बाद उन्हें छोड़ ।।१११-११२।। कभी आहार कर जब बाहर निकलने लगते तब आहार देनेवाली स्त्रीका हार इनके गले में बाँध देती और कहने लगती कि यह चोर है ॥११३।। इस प्रकार अत्यन्त क्रूर हृदयको धारण करनेवाली वह पापिनी राक्षसी निर्वेदसे रोहित हो सदा एकसे बढ़कर उपसर्ग करती रहती थी ॥११४।। तदनन्तर यही मुनिराज महेन्द्रोदयनामा उद्यानमें प्रतिमा योगसे विराजमान थे सो उस राक्षसीने पूर्व वैरके संस्कारसे उनपर परम उपसर्ग किया ॥११५।। वह कभी वेताल बनकर कभी हाथी सिंह व्याव तथा भयङ्कर सर्प होकर और कभी नानाप्रकारके गुणोंसे १. सर्वत्र भी० टि०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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