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________________ व्युत्तरशतं पर्व ३६५ ज्वालावलीपरीतं तदुःप्रेक्ष्यं 'पूषसन्निभम् । नारायणेन दीप्तेन प्रहितं हन्तुमङ्कुशम् ॥२८॥ अनुशस्यान्तिकं गत्वा चक्रं विगलितप्रभम् ।। निवृत्त्य लक्ष्मणस्यैव पुनः पाणितलं गतम् ॥२६॥ क्षिप्त क्षिप्तं सुकोपेन लक्ष्मणेन स्वरावता । चक्रमन्तिकमस्यैव प्रवियाति पुनः पुनः ॥३०॥ अथाङ्कुशकुमारेण विभ्रता विभ्रमं परम् । धनुर्दण्डः सुधीरेण भ्रामितो रणशालिना ॥३१॥ तथाभूतं समालोक्य सर्वेषां रणमीयुषाम् । विस्मयव्याप्तचित्तानां शेमुपीयमजायत ॥३२॥ अयं परमसत्त्वोऽसौ जातश्चक्रधरोऽधुना । भ्रमता यस्य चक्रेण संशये सर्वमाहितम् ॥३३॥ किमिदं स्थिरमाहोस्विद् भ्रमणं समुपाश्रितम् । ननु न स्थिरमेतद्धि श्रूयतेऽस्यातिगर्जितम् ॥३४॥ अलीक लक्षणः ख्यातं नूनं कोटिशिलादिभिः । यतस्तदिहमुत्पन्नं चक्रमन्यस्य साम्प्रतम् ।।३५।। कथं वा मुनिवाक्यानामन्यथात्वं प्रजायते । किं भवन्ति वृथोक्तानि जिनेन्द्रस्यापि शासने ॥३६॥ भ्रमितश्चापदण्डोऽयं चक्रमेतदिति स्वनः । समाकुलः समुत्तस्थौ वक्त्रेभ्योऽस्तमनीषिणाम् ।।३७।। तावल्लचमणवीरोऽपि परमं सत्त्वमुद्वहन् । जगाद नूनमेतो तावुदिती बलचक्रिणौ ॥३८॥ इति व्रीडापरिष्वक्तं निष्क्रियं वीचय लक्ष्मणम् । समीपं तस्य सिद्धार्थो गत्वा नारदसम्मतः ॥३६॥ जगी नारायणो देव त्वमेवात्र कुतोऽन्यथा । जिनेन्द्रशासनोक्तं हि निष्कम्पं मन्दरादपि ।।४।। जानक्यास्तनयावेतौ कुमारी लवणाङ्कुशौ । ययोगर्भस्थयोरासीदसौ विरहिता वने ॥४॥ परिज्ञातमितः पश्चादापप्तद् दुःखसागरे । भवानिति न रत्नानामत्र जाता कृतार्थता ॥४२॥ भय उत्पन्न करने वाला अमोघ चक्ररत्न उठाया ॥२७॥ और ज्वालावलीसे व्याप्त, दुष्प्रेक्ष्य एवं सूर्यके सदृश वह चक्ररत्न क्रोधसे देदीप्यमान लक्ष्मणने अंकुशको मारनेके लिए चला दिया ॥२८॥ परन्तु वह चक्र अंकुशके समीप जा कर निष्प्रभ हो गया और लौट कर पुनः लक्ष्मणके ही हस्ततलमें आ गया ॥२६।। तीव्र क्रोधके कारण वेगसे युक्त लक्ष्मणने कई बार वह चक्र अंकुशके समीप फेका परन्तु वह बार बार लक्ष्मणके ही समीप लौट जाता था ॥३०॥ अथानन्तर परम विभ्रमको धारण करने वाले रणशाली, सुधीर अंकुश कुमारने अपने धनुष दण्डको उस तरह घुमाया कि उसे वैसा देख रणमें जितने लोग उपस्थित थे उन सबका चित्त आश्वयसे व्याप्त हो गया तथा सबके यह बुद्धि उत्पन्न हुई कि अब यह परम शक्तिशाली दूसरा चक्रधर नारायण उत्पन्न हुआ है जिसके कि घूमते हुए चक्रने सबको संशयमें डाल दिया है ।।३१-३३।। क्या यह चक्र स्थिर है अथवा भ्रमणको प्राप्त है ? अत्यधिक गर्जना सुनाई पड़ रही है ॥३४॥ चक्ररत्न कोटिशिला आदि लक्षणोंसे प्रसिद्ध है सो यह मिथ्या जान पड़ता है क्योंकि इस समय यह चक्र यहाँ दूसरेको ही उत्पन्न हो गया है ॥३५।। अथवा मुनियोंके वचनोंमें अन्यथापन कैसे हो सकता है ? क्या जिनेन्द्र भगवान्के भी शासनमें कही हुई बातें व्यर्थ होती हैं ? ॥३६॥ यद्यपि वह धनुष दण्ड घुमाया गया था तथापि जिनकी बुद्धि मारी गई थी ऐसे लोगों के सुखसे व्याकुलतासे भरा हुआ यही शब्द निकल रहा था कि यह चक्ररत्न है ।।३७। उसी समय परम शक्तिको धारण करनेवाले लक्ष्मणने भी कहा कि जान पड़ता है ये दोनों बलभद्र और नारायण उत्पन्न हुए ॥३८॥ अथानन्तर लक्ष्मणको लजित और निश्चेष्ट देख नारदकी संमतिसे सिद्धार्थ लक्ष्मणके पास जा कर बोला कि हे देव ! नारायण तो तुम्ही हो, जिन शासनमें कही बात अन्यथा कैसे हो सकती है ? वह तो मेरु पर्वतसे भी कहीं अधिक निष्कम्प है ॥३६-४०।। ये दोनों कुमार जानकीके लवणाङ्कश नामक वे पुत्र हैं जिनके कि गर्भमें रहते हुए वह वनमें छोड़ दी गई थी ॥४१॥ मुझे यह ज्ञात है कि आप सीता-परित्यागके पश्चात् दुःख रूपी सागरमें गिर गये थे अर्थात् अपने १. सूर्यसदृशम् । २. जानकी। JainEducation internation३४-३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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