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________________ २६४ पद्मपुराणे यथापराजिताजस्य वर्ततेऽनर्थकास्त्रता । तथा लक्ष्मीधरस्यापि मदनाङकुशगोचरे ॥१५॥ विज्ञातजातिसम्बन्धी सापेक्षी लवणाङ्कुशौ । युयुधातेऽनपेक्षौ तु नितिौ रामल चमणौ ॥१६॥ तथाप्यलं सदिव्यास्त्रो विषादपरिवर्जितः । प्रासचक्रशरासारं मुमुचे लक्ष्मणोऽङ्कुशे ॥१७॥ वज्रदण्डैः शरैर्वृष्टिं तामपाकिरदकुशः । पद्मनाभविनिर्मुक्तामनङ्गलवणो यथा ॥१८॥ उपवक्षस्ततः पद्म प्रासेन लवणोऽक्षिणोत् । मदनाङ्कुशवीरश्च लचमणं नैपुणान्वितः ॥१६॥ लक्ष्मणं घूर्णमानातिहृदयं वीच्य सम्भ्रमी । विराधितो रथं चके प्रतीपं कोशलां प्रति ॥२०॥ ततः संज्ञां परिप्राप्य रथं दृष्ट्वाऽन्यतः स्थितम् । जगाद लचमणः कोपकपिलीकृतलोचनः ॥२१॥ भो विराथित सद्बुद्धे किमिदं भवता कृतम् । रथं निवर्त्तय तिनं रणे पृष्टं न दीयते ॥२२॥ पुतिपूरितदेहस्य स्थितस्याभिमुखं रिपोः । शूरस्य मरणं श्लाघ्यं नेदं कर्म जुगुप्सितम् ॥२३॥ सुरमानुपमध्येऽस्मिन् परामप्यापदं श्रिताः । कथं भजन्ति कातयं स्थिताः पुरुषमूर्द्धनि ॥२४॥ पुत्रो दशरथस्याहं भ्राता लाङ्गललचमणः । नारायणः क्षितो ख्यातस्तस्येदं सदृशं कथम् ॥२५॥ त्वरित गदितेनैवं रथस्तेन निवर्तितः । पुनर्युद्धमभूद्घोरं प्रतीपागतसैनिकम् ॥२६॥ लक्ष्मणेन ततः कोपासनामान्तचिकीर्षया । अमोघमुद्धतं चक्रं देवासुरभयक्करम् ॥२७॥ ॥१४॥ इधर लवणाङ्कुशके विषयमें जिस प्रकार रामके शस्त्र निरर्थक हो रहे थे उधर उसी प्रकार मदनाङ्कशके विषयमें लक्ष्मणके शस्त्र भी निरर्थक हो रहे थे ॥१५॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि इधर लवणाङ्कशको तो राम लक्ष्मणके साथ अपने जाति सम्बन्धका ज्ञान था अतः वे उनको अपेक्षा रखते हुए युद्ध करते थे-अर्थात् उन्हें घातक चोट न लग जावे इसलिए बचा बचा कर युद्ध करते थे पर उधर राम लक्ष्मणको कुछ ज्ञान नहीं था इसलिए वे निरपेक्ष हो कर युद्ध कर रहे थे ॥१६॥ यद्यपि इस तरह लक्ष्मणके शस्त्र निरर्थक हो रहे थे तथापि वे दिव्यास्त्रसे सहित होनेके कारण विषादसे रहित थे। अबकी बार उन्होंने अङ्कुशके ऊपर भाले सामान्य चक्र तथा वाणोंकी जोरदार वर्षा की सो उसने वन दण्ड तथा वाणोंके द्वारा उस वर्षाको दूर कर दिया। इसी तरह अनंगलवणने भी रामके द्वारा छोड़ा अस्त्र-वृष्टिको दूर कर दिया था ॥१७-१८॥ तदनन्तर इधर लवणने वक्षःस्थलके समीप रामको प्रास नामा शस्त्रसे घायल किया और उधर चातुर्यसे युक्त वीर मदनांकुशने भी लक्ष्मणके ऊपर प्रहार किया ॥१६॥ उसकी चोटसे जिसके नेत्र और हृदय घूमने लगे थे ऐसे लक्ष्मणको देख विराधि तने घबड़ा कर रथ उलटा अयोध्याकी ओर फेर दिया ।।२०।। तदनन्तर चेतना प्राप्त होने पर जब लक्ष्मणने रथको दूसरी ओर देखा तब लक्ष्मणने क्रोधसे लाल लाल नेत्र करते हुए कहा कि हे बुद्धिमन् ! विराधित ! तुमने यह क्या किया ? शीघ्र हो रथ लौटाओ। क्या तुम नहीं जानते कि युद्धमें पीठ नहीं दी जाती है ? ॥२१-२२॥ वाणोंसे जिसका शरीर व्याप्त है ऐसे शूर वीरका शत्रुके सन्मुख खड़े खड़े मर जाना अच्छा है पर यह घृणित कार्य अच्छा नहीं है ।।२३।। जो मनुष्य, पुरुषोंके मस्तक पर स्थित हैं अर्थात् उनमें प्रधान हैं वे देवों और मनुष्यों के वीच परम आपत्तिको प्राप्त हो कर भी कातरताको कैसे प्राप्त हो सकते हैं ? ॥२४॥ मैं दशरथका पुत्र, रामका भाई और पृथिवी पर नारायण नामसे प्रसिद्ध हूँ उसके लिए यह काम कैसे योग्य हो सकता है ? ॥२५।। इस प्रकार कह कर लक्ष्मणने शीघ्र ही पुनः रथ लौटा दिया और पुनः जिसमें सैनिक लौट कर आये थे ऐसा भयंकर युद्ध हुआ ॥२६॥ तदनन्तर कोप वश लक्ष्मणने संग्रामका अन्त करनेको इच्छासे देवों और असुरोंको भी १. अपराजिताजस्य कौशल्यापुत्रस्य । यथा पराजिता यस्य ज० । २. तामपाकरदंशुकः म० । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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