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________________ २६२ पद्मपुराणे निःक्रामधिरोद्गारसहितोरुभटस्वनम् । वेगवच्छत्रसम्पातजातवह्निकणोत्करम् ।।१६६॥ करिशूस्कृतसम्भूतसीकरासारजालकम् । करिदारितवक्षस्कभटसङ्कटभूतलम् ।।११७॥ पर्यस्तकरिसरुद्वरणमार्गाकुलायतम् । नाममेघपरिश्योतन्मुक्ताफलमहोपलम् ।।१६।। मुक्तासारसमाघातविकटं कर्मरङ्गकम् । नागोच्छालितपुन्नागकृतखेचरसङ्गमम् ॥१६६।। शिर क्रीतयशोरवं मूर्खाजनितविश्रमम् । मरणप्राप्तनिर्वाणं बभूव रणमाकुलम् ॥२०॥ आर्याच्छन्दः जीविततृष्णारहितं साधुस्वनजलधिलुब्धयौधेयम् । समरं समरसमासीन्महति लघिष्ठे च वीराणाम् ।।२०१॥ भक्तिः स्वामिन परमा निष्क्रयदानं प्रचण्डरणकण्डूः । रवितेजसा भटानां जग्मुः समामहेतुत्वम् ।।२०२।। इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते श्रीपद्मपुराणे लवणाङ कुशसमेतयुद्धाभिधान द्वयुत्तरशतं पर्व ॥१०२॥ रहे थे, जो घोड़ोंके वेगसे उड़े हुए सामन्त भटोंसे व्याप्त था ॥१५॥ जिसमें महायोद्धाओंके शब्द निकलते हुए खूनके उद्गारसे सहित थे, जहाँ वेगशाली शस्त्रोंके पड़नेसे अग्निकणोंका समूह उत्पन्न हो रहा था ॥१६६॥ जहाँ हाथियोंके सूसू शब्दके साथ जलके छींटोंका समूह निकल रहा था, जहाँ हाथियोंके द्वारा विदीर्ण वक्षःस्थल वाले योद्धाओंसे भूतल व्याप्त था ॥१६७॥ जहाँ इधर-उधर पड़े हुए हाथियोंसे युद्धका मार्ग रुक जानेके कारण यातायातमें गड़बड़ी हो रही थी। जहाँ हाथी रूपी मेघोंसे मुक्ताफल रूषी महोपलों-बड़े बड़े ओलोंकी वर्षा हो रही थी, ।।१६८॥ जो मोतियोंकी वर्षाके समाघातसे विकट था, नाना प्रकार के कर्मोकी रङ्गभूमि था, जहाँ हाथियों के द्वारा उखाड़ कर ऊपर उछाले हुए पुनागके वृक्ष, विद्याधरोंका संगम कर रहे थे ॥१६६॥ जहाँ शिरोंके द्वारा यशरूपी रत्न खरीदा गया था, जहाँ मूर्छासे विश्राम प्राप्त होता था, और मरणसे जहाँ निर्वाण मिलता था ।।२००।। इस प्रकार वीरों की चाहे बड़ी टुकड़ी हो चाहे छोटी, सबमें वह युद्ध हुआ कि जो जीवनकी तृष्णासे रहित था, जिसमें योधाओंके समूह धन्य धन्य शब्दरूपी समुद्रके लोभी थे तथा जो समरससे सहित था-किसी भी पक्षकी जय पराजयसे रहित था ॥२०१।। स्वामीमें अटूट भक्ति, जीविका प्राप्तिका बदला चुकाना और रणकी तेज खाज यही सव सूर्यके समान तेजस्वी योद्धाओंके संग्रामके कारणपनेको प्राप्त हुए थे ॥२०२।। इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें लवणांकुश के युद्धका वर्णन करने वाला एक सौ दोवां पर्व समाप्त हुआ ॥१०२॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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