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________________ २६१ द्वयु त्तरशतं पर्व स चापि जानकीसूनुरुद्धत्य सशरं धनुः । रणप्राघूर्णकं दातुं पद्मनाभमुपागमत् ॥१८॥ ततः परमभूयुद्धं पद्मस्य लवणस्य च । परस्परं समुत्कृत्तशस्त्रसङ्घातकर्कशम् ॥१८२॥ महाहवो यथा जातः पद्मस्य लवणस्य च । अनुक्रमेण तेनैव लचमणस्याङ्कुशस्य च ॥१३॥ एवं द्वन्द्वमभूद्यद्धं स्वामिरागमुपेयुपाम् । सामन्तानामपि स्वस्ववीरशोभाभिलाषिणाम् ॥१८॥ अश्ववृन्दं क्वचित्तङ्गं तरङ्गकृतरङ्गणम् । निरुद्धं परचक्रेण धनं चक्रे रणाङ्गणम् ॥१५॥ कचिद्विच्छिन्नसन्नाहं प्रतिपक्षं पुरःस्थितम् । निरीच्य रणकण्डूलो निदधे मुखमन्यतः ॥१६॥ केचिन्नाथं समुत्सृज्य प्रविष्टाः परवाहिनीम् । स्वामिनाम समुच्चार्य निजघ्नुरभिलक्षितम् ॥१७॥ अनादृतनराः केचिद्गर्वशोण्डा महाभटाः । प्रक्षरद्दानधाराणां करिणामरितामिताः ॥१८८।। दन्तशय्यां समाश्रित्य कश्चित्समददन्तिनः । 'रणनिद्रासुखं लेभे परम भटसत्तमः ॥१८६॥ कश्चिदभ्यायतोऽश्वस्य भग्नशस्त्रो महाभटः । अदत्त्वा पदवीं प्राणान् ददौ स करताडनम् ॥१६॥ प्रच्युतं प्रथमाघाताद्भट कश्चित्रपान्वितः । भणन्तमपि नो भूयः प्रजहार महामनाः ॥११॥ च्युतशस्त्रं क्वचिद्वीच्य भटमच्युतमानसः । शस्त्रं दूरं परित्यज्य बाहुभ्यां यो मुद्यतः ॥१६२॥ दातारोऽपि प्रविख्याताः सदा समरवर्तिनः । प्राणानपि ददुर्वीरा न पुनः पृष्ठदर्शनम् ॥ १६३॥ असृक्कर्दमनिमग्नचक्रकृच्छ्चलद्रथम् । तोत्रप्रतोदनोद्युक्तः त्वरितश्च न सारथिः ॥१६॥ कणदश्वसमुद्यढस्यन्दनोन्मुक्तचीत्कृतम् । तुरङ्गजवविक्षिप्तभटसीमन्तिताविलम् ॥१५॥ पहुँचता है ॥१८०। इधर सीतासुत अनङ्गलवण भी वाण सहित धनुष उठाकर रणकी भेट देनेके लिए रामके समीप गये ॥१८१॥ तदनन्तर राम और लवणके बीच परस्पर कटे हुए शस्त्रोंके समूहसे कठिन परम युद्ध हुआ ॥१८२॥ इधर जिस प्रकार राम और लवणका महायुद्ध हो रहा था उधर उसी प्रकार लक्ष्मण और अङ्कशका भी महायुद्ध हो रहा था ॥१८३॥ इसी प्रकार स्वामी के रागको प्राप्त तथा अपने अपने वीरों की शोभा चाहने वाले सामन्तोंमें भी द्वन्द्व-युद्ध हो रहा था ॥१८४॥ कहीं परचक्रसे रुका और तरङ्गोंके समान चञ्चल ऊँचे घोड़ोंका समूह रणाङ्गणको सघन कर रहा था-वहाँकी भीड़ बढ़ा रहा था ॥१८॥ कवच टूट गया था ऐसे सामने खड़े शत्रुको देख रणकी खाजसे युक्त योद्धा दूसरी ओर मुख कर रहा था ॥१८६।। कितने ही योद्धा स्वामीको छोड़ शत्रुकी सेनामें घुस पड़े और अपने स्वामीका नाम ले कर जो भी दिखे उसे मारने लगे ॥१८७॥ तीव्र अहंकारसे भरे कितने ही महायोद्धा, मनुष्योंकी उपेक्षा कर मदस्रावी हाथियोंको शत्रुताको प्राप्त हुए ।।१८८|| कोई एक उत्तम योद्धा मदोन्मत्त ह का आश्रय ले रणनिद्राके उत्तम सुखको प्राप्त हुआ अर्थात् हाथीके दांतोंसे घायल हो कर कोई योद्धा मरणको प्राप्त हुआ ॥१८६॥ जिसका शस्त्र टूट गया था ऐसे किसी योद्धाने सामने आते हुए घोड़ेके लिए मार्ग तो नहीं दिया किन्तु हाथ ठोक कर प्राण दे दिये ।।१६०|कोई एक योधा प्रथम प्रहारमें ही गिर गया था इसलिए उसके बकने पर भी उदारचेता किसी महायोद्धाने लजित हो उस पर पुनः प्रहार नहीं किया ॥१६॥ जिसका हृदय नहीं टूटा था ऐसा कोई योद्धा, सामनेके वीरको शस्त्र रहित देख, अपना भी शस्त्र फेंककर मात्र भुजाओंसे ही युद्ध करनेके लिए उद्यत हुआ था ॥१६२॥ कितने ही वीरोंने सदाके सुप्रसिद्ध दानो हो कर भी युद्ध क्षेत्रमें आकर अपने प्राण तो दे दिये थे पर पीठके दर्शन किसीको नहीं दिये ॥१६३।। किसी सारथिका रथ रुधिरकी कीचड़ में फंस जानेके कारण बड़ी कठिनाईसे चल रहा था इसलिए वह चाबुकसे ताड़ना देनेमें तत्पर होने पर भी शीघ्रताको प्राप्त नहीं हो रहा था ॥१६४॥ इस प्रकार उन दोनों सेनाओं में वह महायुद्ध हुआ जिसमें कि शब्द करने वाले घोड़ोंके द्वारा खींचे गये रथ ची ची शब्द कर १. रणनिद्रां सुखं म०, ज०, फ० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org'
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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