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________________ द्वयु त्तरशतं पर्व २५.. प्रवृत्तवेगमात्रेण नगरी ग्रहणेपिणोः । जाताऽसावन्तरे तृष्णा सिद्धिप्रस्थितयोरिव ॥१२॥ सैन्यमावासितं तत्र परिश्रमसमागतम् । सुरसैन्यमिवोदारमुपनन्दननिम्नगाम् ॥१२२॥ अथ श्रुत्वा परानीकं स्थितमासन्नगोचरे । किञ्चिद्विस्मयमापनाचतुः पम्मलक्ष्मणौ ॥१२॥ त्वरितं कः पुनमत मयं वाञ्छति मानवः । युद्धापदेशमाश्रित्य यदेत्यन्तिकमाषयोः॥१२४ ददौ नारायणश्चाज्ञां विराधितमहीभृते । क्रियतां साधनं सज युद्धाय क्षेपवर्जितम् ॥१२५॥ वृपनागप्लवङ्गादिकेतनाः खेचराधिपाः । क्रियन्तामुदितज्ञाना सम्प्राप्ते रणकर्मणि ॥१२६॥ यथाऽऽज्ञापयसीयुक्त्वा विराधितखगेश्वरः । नृपान् किष्किन्धनाथाद्यान् समाह्वाय समुद्यतः॥१२७॥ दतदर्शनमात्रेण सर्वे ते खेचरेश्वराः । अयोध्यानगरी प्राप्ता महासाधनसङ्गताः ॥१२॥ अथात्यन्ताकुलारमानौ तदा सिद्धार्थनारदौ । प्रभामण्डलराजाय गत्वा ज्ञापयतां द्रुतम् ॥१२६॥ श्रुषा स्वसुर्यथा वृत्तं वात्सल्यगुणयोगतः । बभूव परमं दुःखी प्रभामण्डलमण्डितः ॥१३०॥ विषादं विस्मयं हर्प विभ्राणश्च त्वरान्वितः । आरुह्य मनसा तुल्यं विमानं पितृसङ्गतः ॥५३१॥ समेतः सर्वसैन्येन किर्तव्यत्वविह्वलः । पौण्डरीकपुरं चैव प्रस्थितः स्नेहनिर्भरः ॥१३२॥ प्रभामण्डलमायातं जनकं मातरं तथा । दृष्ट्वा सीता नवीभूतशोकोत्थाय स्वरान्विता ॥१३॥ विप्रलापं परिष्वज्य चक्रेत्रकृतदुर्दिना । निर्वासनादिकं दुःखं वेदयन्ती सुविह्वला ॥१३॥ सान्वयित्वाऽतिकृच्छेण तां प्रभामण्डलो जगौ। देवि संशयमापनौ पुत्रौ ते साधु नो कृतम् ॥१३५॥ और गौरवसे सहित कथाओंसे जो अत्यन्त प्रसन्न थे ऐसे सुखसे जाते हुए उन दोनोंके बीच नदी आ पड़ी ॥१२०॥ जो अपने चालू वेगसे ही उस नगरीको ग्रहण करनेकी इच्छा रखते थे ऐसे उन दोनों वीरोंके बीच वह नदी उस प्रकार आ पड़ी जिसप्रकार कि मोक्षके लिए प्रस्थान करने वालेके बीच तृष्णा आ पड़ती है ।।१२१।। जिस प्रकार नन्दन,वनकी नदीके समीप देवोंकी विशाल सेना ठहराई जाती है उसी प्रकार उस नदीके समीप थकी मांदी सेना ठहरा दी गई ॥१२२॥ अथानन्तर शत्रकी सेनाको निकटवर्ती स्थानमें स्थित सुन परम आश्चर्यको प्राप्त होते हए राम लक्ष्मणने कहा कि ॥१२३।। यह कौन मनुष्य शीघ्र ही मरना चाहता है जो युद्धका बहाना लेकर हम दोनों के पास चला आ रहा है ।।१२४।। लक्ष्मणने उसी समय राजा विराधितको आज्ञा दो कि बिना किसी विलम्बके युद्ध के लिए सेना तैयार की जाय ।।१२५॥ रणका कार्य उपस्थित हुआ है इसलिए वृप, नाग तथा वानर आदिकी पताकाओंको धारण करने वाले विद्याधर राजाओं को सब समाचारका ज्ञान कराओ अर्थात् उनके पास सब समाचार भेजे जाँय ।।१२६।। 'जैसी आप आज्ञा करते हैं वैसा ही होगा' इस प्रकार कह कर राजा विराधित सुग्रीव आदि राजाओं को बुला कर युद्धके लिए उद्यत हो गया ।।१२७।। दूतके देखते ही वे सब विद्याधर राजा बड़ी-बड़ी सेनाएं लेकर अयोध्या आ पहुँचे ॥१२८।। ____ अथानन्तर जिनकी आत्मा अत्यन्त आकुल हो रही थी ऐसे सिद्धार्थ और नारदने शीघ्र हो जा कर भामण्डलके लिए सब खबर दी ॥१२६॥ बहिन सीताका जो हाल हुआ था उसे सुन कर वात्सल्प गुणके कारण भामण्डल बहुत दुखी हुआ ॥१३०॥ तदनन्तर विषाद विस्मय और हर्षको धारण करने वाला, शीघ्रतासे सहित एवं स्नेहसे भरा भामण्डल, किंकतेव्यविमूढ हों पिता सहित मनके समान शीघ्रगामी विमान पर आरूढ़ हो सब सेनाके साथ पौण्डरीकपुरकी ओर चला ॥१३१-१३२॥ भामण्डल, पिता और माताको आया देख जिसका शोक नया हो गया था ऐसी सीता शीघ्रतासे उठ सबका आलिङ्गन कर आसुंओंकी लगातार वर्षा करती हुई विलाप करने लगी। वह उस समय अपने परित्याग आदिके दुःखको बतलाती हुई विह्वल हो उठती थी ॥१३३-१३४॥ भामण्डलने उसे बड़ी कठिनाईसे सान्त्वना देकर कहा कि हे देवि ! तेरे पुत्र १. प्रवृत्ते ज०। __Jain Education Internat३३-३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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