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________________ एकाधिकशतं पर्व भतित्वरापरीतौ तौ पराभूत्युभवासहौ । अपि नासहतां यानमभिव्यक्तमहायुती ॥२६॥ तौ वारयितुमुथुक्का वनजङ्घस्य सूनवः । सर्वमन्तःपुरं चैव परिवर्गश्च यत्नतः ॥३०॥ अपकर्णिततद्वाक्यौ जानकी वीच्य पुत्रको । जगाद तनयस्नेहपरिद्रवितमानसा ॥३१॥ बालकौ नैष युद्धस्य भवतः समयः समः । न हि वत्सौ नियुज्येते महारथधुरामुखे ॥३२॥ ऊचतुस्तौ त्वया मातः किमेतदिति भाषितम् । किमत्र वृद्धकै कार्य वीरभोग्या वसुन्धरा ॥३३॥ कियता देहभारेण ज्वलनस्य प्रयोजनम् । दिधक्षतो महाकक्षं स्वभावेनेह कारणम् ॥३४॥ एवमुदतवाक्यौ तौ तनयो वीचय जानकी । बाष्पं मिश्ररसोत्पन्नं नेत्रयोः किञ्चिदाश्रयत् ॥३५॥ सुस्नातौ तौ कृताहारी ततोऽलङ्गकृतविग्रहौ । प्रणम्य प्रयतौ सिद्धान वपुषा मनसा गिरा ॥३६॥ प्रणिपत्य सवित्री च समस्तविधिपण्डितौ । उपयातावगारस्य बहिः सत्तममङ्गलैः ॥३७॥ रथौ ततः समारुह्य परमौ जविवाजिनौ । सम्पणी विविधैरस्त्ररुपरि प्रस्थिती पृथोः ॥३॥ तौ महासैन्यसम्पन्नौ चापन्यस्तसहायकौ । मूत्यैव सङ्गति प्राप्ती समुद्योगपराक्रमौ ॥३६॥ परमोदारचेतस्कौ पुरुसमामकौतुकौ । पञ्चभिर्दिवसैः प्राप्तौ वज्रजच महोदयौ ॥४०॥ ततः शत्रुबलं श्रुत्वा परमोद्योगमन्तिकम् । निरैन्महाबलान्तस्थः पृथिवीनगरात्पृथुः ॥४१॥ भ्रातरः सुहृदः पुत्रा मातुला मातुलाङ्गजाः । एकपात्रभुजोऽन्ये च परमप्रीतिसङ्गताः ॥४२॥ उद्यत हो गये ॥२८॥ जो अत्यन्त उतावलीसे सहित थे, जो पराभवकी उत्पत्तिको रंचमात्र भी सहन नहीं कर सकते थे और जिनका विशाल तेज प्रकट हो रहा था ऐसे उन दोनों वीरोंने वाहनका विलम्ब भी सहन नहीं किया था ॥२६॥ वनजङ्घके पुत्र, समस्त अन्तःपुर तथा परिकर के समस्त लोग उन्हें यत्नपूर्वक रोकनेके लिए उद्य हुए परन्तु उन्होंने उनके वचन अनसुने कर दिये। तदनन्तर पुत्रस्नेहसे जिसका हृदय द्रवीभूत हो रहा था ऐसी सीताने उन्हें युद्ध के लिए उद्यत देख कहा कि हे बालको! यह तुम्हारा युद्धके योग्य समय नहीं है क्योंकि महारथकी धुराके आगे बछड़े नहीं जाते जाते ॥३०-३२।। इसके उत्तरमें दोनों पुत्रोंने कहा कि हे मातः! तुमने ऐसा क्यों कहा ? इसमें वृद्धजनोंकी क्या आवश्यकता है ? पृथिवी तो वीरभोग्या है ॥३३।। महावनको जलानेवाली अग्निके लिए कितने बड़े शरीरसे प्रयोजन है ? अर्थात् अग्निका बड़ा शरीर होना अपेक्षित नहीं है, इस विषयमें तो उसे स्वभावसे ही प्रयोजन है ॥३४॥ इस प्रकारके वचनोंका उच्चारण करनेवाले पुत्रों को देखकर सीताके नेत्रोंमें मिश्ररससे उत्पन्न आँसुओंने कुछ आश्रय लिया अर्थात् उसके नेत्रोंसे हर्ष और शोकके कारण कुछ-कुछ आँसू निकल आये ॥३५॥ ___ तदनन्तर जिन्होंने अच्छी तरह स्नानकर आहार किया शरीरको अलंकारोंसे अलंकृत किया और मन, वचन, कायसे सिद्ध परमेष्ठीको बड़ी सावधानीसे नमस्कार किया, ऐसे समस्त विधि-विधानके जानने में निपुण दोनों कुमार माताको नमस्कार कर उत्तम मङ्गलाचार पूर्वक घरसे बाहर निकले ॥३६-३७॥ तदनन्तर जिनमें वेगशाली घोड़े जुते थे और जो नाना प्रकारके अस्त्रशस्त्रोंसे परिपूर्ण थे ऐसे उत्तम रथोंपर सवार होकर दोनों भाइयोंने राजा पृथके ऊपर प्रस्थान किया ॥३८॥ बड़ी भारी सेनासे सहित एवं धनुषमात्रको सहायक समझनेवाले दोनों कुमार ऐसे जान पड़ते थे मानो शरीरधारी उद्योग और पराक्रम ही हों ॥३६॥ जिनका हृदय अत्यन्त उदार था तथा जो संग्रामके बहुत भारी कौतुकसे युक्त थे ऐसे महाभ्युदयके धारक दोनों भाई छह दिनमें वज्रजबके पास पहुँच गये ॥४०॥ तदनन्तर परमोद्योगी शत्रुको सेनाको निकटवर्ती सुनकर बड़ी भारी सेनाके मध्य में स्थित राजा पृथु अपने पृथिवीपुरसे बाहर निकला ॥४१॥ उसके भाई, मित्र, पुत्र, मामा, मामाके १. समे म० । २. वीरभोज्या म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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