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________________ पद्मपुराणे कुलं शीलं धनं रूपं समानत्वं बलं वयः । देशो विद्यागमश्चेति यद्यप्युक्ता वरे गुणाः ॥ १४ ॥ तथापि तेषु सर्वेषु सन्तोऽभिजनमेककम् । वरिष्ठमनुरुध्यन्ते शेषेषु तु मनः समम् ॥ १५॥ स च न ज्ञायते यस्य वरस्य प्रथमो गुणः । कथं प्रदीयते तस्मै कन्या मान्या समन्ततः ॥ १६ ॥ पिं भाषमाणाय तस्मै सुप्रतिकूलनम् । दातुं युक्तं कुमारीं न कुमारीं तु ददाम्यहम् ॥१७॥ इत्येकान्तपरिध्वस्तवचनो निरुपायकः । दूतः श्रीवज्रजंघाय गत्वाऽवस्थां न्यवेदयत् ॥ १८ ॥ ततो गत्वार्धमध्वानं स्वयमेव प्रपन्नवान् । अयाचत महादूतवदनेन पृथुं पुनः ॥ १६ ॥ अलब्ध्वाऽसौ ततः कन्यां तथापि जनितादरः । पृथोर्ध्वसयितुं देशं क्रोधनुन्नः समुद्यतः ॥ २०॥ पृथुदेशावधेः पाता नाम्ना व्याघ्ररथो नृपः । वज्रजङ्घेन सङ्ग्रामे जित्वा बन्धनमाहृतः ॥२१॥ ज्ञात्वा व्याघ्ररथं बद्धं सामन्तं सुमहाबलम् । देशं विनाशयन्तं च वज्रजङ्गं समुद्यतम् ॥२२॥ पृथुः सहायता हेतोः पोदनाधिपतिं नृपम् । मित्रमाह्वाययामास यावत्परमसैनिकम् ॥२३॥ सावरकुलिशजंघेन पौण्डरीकपुरं दुतम् । समाह्वाययितुं पुत्रान् प्रहितो लेखवान्नरः ॥ २४ ॥ पितुराज्ञां समाकर्ण्य राजपुत्रास्त्वरान्विताः । भेरीशङ्खादिनिःस्वानं सन्नाहार्थमदापयन् ॥ २५ ॥ ततः कोलाहलस्तुङ्गो महान् संक्षोभकारणः । पौण्डरीकपुरे जातो घूर्णमानार्णवोपमः ॥२६॥ तावदश्रुतपूर्व तं श्रुत्वा सन्नाहनिःस्वनम् । किमेतदिति पार्श्वस्थानप्राष्टां लवणाङ्कुशौ ॥२७॥ स्वनिमित्तं ततः श्रुत्वा वृत्तान्तं तत्समन्ततः । वैदेहीनन्दनौ गन्तुमुद्यतौ समरार्थिनौ ॥२८॥ २४२ निग्रह है ॥ १३ ॥ यद्यपि कुल, शील, धन, रूप, समानता, बल, अवस्था, देश और विद्या गम ये गुणक तथापि उत्तम पुरुष उन सबमें एक कुलको ही श्रेष्ठ गुण मानते हैंइसका होना आवश्यक समझते हैं, शेष गुणों में इच्छानुसार प्रवृत्ति है अर्थात् हो तो ठीक न हों तो ठीक ॥१४- १५॥ परन्तु वही कुल नामका प्रथम गुण जिस वरमें न हो उसे सब ओरसे माननीय कन्या कैसे दी जा सकती है ? ||१६|| सो इस तरह निर्लज्जतापूर्वक विरुद्ध वचन कहने वाले उसके लिए कुमारी अर्थात् पुत्रीका देना तो युक्त नहीं है परन्तु कुमारी अर्थात् खोटा मरण मैं अवश्य देता हूँ ||१७|| इस प्रकार जिसके वचन सर्वथा उपेक्षित कर दिये गये थे ऐसे दूतने निरुपाय हो वापिस जाकर वाजङ्घके लिए सब समाचार कह सुनाया ॥ १८ ॥ तदनन्तर यद्यपि राजा वज्रजङ्घने स्वयं आधे मार्ग तक जाकर किसी महादूतके द्वारा पृथुसे कन्याकी याचना की ॥ १६॥ और उसके प्रति आदर व्यक्त किया तथापि वह कन्याको प्राप्त नहीं कर सका । फलस्वरूप वह क्रोधसे प्रेरित हो पृथुका देश उजाड़नेके लिए तत्पर हो गया ||२०|| राजा पृथुके देशकी सीमाका रक्षक एक व्याघ्ररथ नामका राजा था उसे वज्रजङ्घने संग्राममें जीत कर बन्धन में डाल दिया || २१|| महाबलवान् अथवा बड़ी भारी सेनासे सहित व्याघ्ररथ सामन्तको युद्धमें बद्ध तथा वज्रजङ्घको देश उजाड़नेके लिए उद्यत जानकर राजा पृथुने सहायता के निमित्त पोदनदेशके अधिपति अपने मित्र राजाको जो कि उत्कृष्ट सेनासे युक्त था जबतक बुलवाया तबतक वजङ्घने भी अपने पुत्रोंको बुलानेके लिए शीघ्र ही एक पत्र सहित आदमी पौण्डरीकपुरको भेज दिया ॥२२-२४|| पिताकी आज्ञा सुनकर राजपुत्रोंने शीघ्र ही युद्धके लिए भेरी तथा शङ्ख आदिके शब्द दिलवाये ||२५|| तदनन्तर पौण्डरीकपुरमें लहराते हुए समुद्र के समान क्षोभ उत्पन्न करनेवाला बहुत बड़ा कोलाहल उत्पन्न हुआ ||२६|| वह अश्रुतपूर्व युद्ध की तैयारीका शब्द सुन लवण और अङ्कुशने निकटवर्ती पुरुषों से पूछा कि यह क्या है ? ||२७|| तदनन्तर यह सब वृत्तान्त हमारे ही निमित्त से हो रहा है, यह सब ओरसे सुन युद्धकी इच्छा रखनेवाले सीताके दोनों पुत्र जानेके लिए १. कन्यां । २. कुमृत्युम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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