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________________ शतं पर्व एवं तावदिदं जातमिदमन्यन्नरेश्वर । शृणु वक्ष्यामि तं वृत्तं लवणाङ्कुशगोचरम् ।।१।। अथ सर्वप्रजापुण्यगृहीताया इवामलैः । अधत्त पाण्डुतामङ्गयष्टिर्जनकजन्मनः ॥२॥ श्यामतासमवष्टब्धचारुचूचुकचूलिकैः । पयोधरघटौ पुत्रपानार्थमिव मुद्रितौ ॥३॥ स्तन्यार्थमानने न्यस्ता दुग्वसिन्धुरिवायता । सुस्निग्धधवला दृष्टिमाधुर्यमदधात्परम् ॥४॥ सर्वमङ्गलसंघातैर्गात्रयष्टिरधिष्ठिता। अमन्दायतकल्याणगौरवोद्भवनादिव ॥५॥ मन्दं मन्दं प्रयच्छन्त्याः क्रम निर्मलकुट्टिमे । प्रतिबिम्बाम्बुजेन मा पूर्वसेवामिवाकरोत् ॥६॥ सूतिकालकृताकांक्षा कपोलप्रतिबिम्बिता । समलच्यत लक्ष्मीर्वा शय्यापाश्रयपुत्रिका ॥७॥ रात्रौ सौधोपयाताया व्यंशुके स्तनमण्डले । श्वेतच्छत्रमिवाधारि सङ्क्रान्तं शशिमण्डलम् ॥८॥ वासवेश्मनि सुप्ताया अपि प्रचलबाहुकाः । चित्रचामरधारिण्यश्चामराणि व्य धूनयन् ॥६॥ स्वप्ने पयाजिनापुत्रपुटवारिभिरादरात् । अभिषेको महानागैरकारि परिमण्डितः ॥१०॥ असकृन्जयनिःस्वानं व्रजन्त्याः प्रतिबुद्धताम् । सञ्चन्द्रशालिकाशालभञ्जिका अपि चक्रिरे ॥११॥ परिवारजनाह्वानेष्यादिशेति ससम्भ्रमाः । अशरीरा विनिश्चेर्वाचः परमकोमलाः ॥१२॥ ___ अथानन्तर श्री गौतम स्वामी कहते हैं कि हे नरेश्वर ! इसप्रकार यह वृत्तान्त तो रहा अब दूसरा लवणाङ्कशसे सम्बन्ध रखनेवाला वृत्तान्त कहता हूँ सो सुन ॥१।। तदनन्तर जनकनन्दिनी के कृश शरीरने धवलता धारण की, सो ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त प्रजाजनोंके निर्मल - पुण्यने उसे ग्रहण किया था, इसलिए उसकी धवलतासे ही उसने धवलता धारण की हो ॥२॥ स्तनोंके सुन्दर चू चुक सम्बन्धी अग्रभाग श्यामवर्णसे युक्त हो गये, सो ऐसे जान पड़ते थे मानो -पुत्रके पीनेके लिए स्तनरूपी घट मुहरबन्द करके ही रख दिये हों ॥३॥ उसकी स्नेहपूर्ण धवल दृष्टि उस प्रकार परम माधुर्यको धारण कर रही थी मानो दूध के लिए उसके मुख पर लम्बी-चौड़ी दूधकी नदी ही लाकर रख दी हो ॥४॥ उसकी शरीरयष्टि सब प्रकारके मङ्गलोंके समूहसे युक्त थी ए ऐसी जान पड़ती थी मानो अपरिमित एवं विशाल कल्याणोंका गौरव प्रकट करने के लिए ही युक्त थी ॥५।। जब सीता मणिमयी निर्मल फर्सपर धीरे-धीरे पैर रखती थी तब उनका प्रतिविम्ब नीचे पड़ता था, उससे ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवी प्रतिरूपी कमलके द्वारा उसकी पहलेसे ही सेवा कर रही हो ॥६।। प्रसूति कालमें जिसकी आकांक्षा की जाती है ऐसी जो पुत्तलिका सीताकी शय्याके समीप रखी गई थी उसका प्रतिविम्ब सीताके कपोलमें पड़ता था उससे वह पुत्तलिका लक्ष्मीके समान दिखाई देती थी ।७।। रात्रिके समय सीता महलको छत पर चली जाती थी, उस समय उसके वस्त्र रहित स्तनमण्डल पर जो चन्द्रविम्बका प्रतिविम्ब पड़ता था वह ऐसा जान पड़ता था मानो गर्भके ऊपर सफेद छत्र ही धारण किया गया हो ॥८॥ जिस समय वह निवास-गृहमें सोती थी उस समय भी चश्चल भुजाओंसे युक्त एवं नाना प्रकारके चमर , धारण करनेवाली स्त्रियाँ उसपर चमर ढोरती रहती थीं 11 स्वप्नमें अलंकारासे अलंकृत बड़ेबड़े हाथी, कमलिनीके पत्रपुट में रखे हुए जलके द्वारा उसका आदरपूर्वक अभिषेक करते थे ॥१०|| जब वह जागती थी तब बार-बार जय-जय शब्द होता था, उससे ऐसा जान पड़ता था मानो महलके ऊर्व भागमें सुशोभित पुत्तलियाँ ही जय-जय शब्द कर रही हों ।।११।। जब वह परिवारके लोगोंको बुलाती थी तब 'आज्ञा देओ' इस प्रकारके संभ्रम सहित शरीर रहित परम कोमल १. सीतायाः । २. पुटं वारिभि -म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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