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________________ अष्टनवतितमं पर्व ३११ ततः कथयितु कृच्छ्राद्विरताऽपि सती क्षणम् । पुना रुरोद शोकोरुचक्रपीडितमानसा ॥३०॥ मुहुस्ततोऽनुयुक्ता सा राज्ञा मधुरभाषिणा । धृत्वा मन्युं जगौ क्लिष्टहंसगद्गदनिःस्वना ॥३१॥ विज्ञातुं यदि ते वान्छा राजन् यच्छ ततो मनः । कथा मे मन्दभाग्याया इयमत्यन्तदीर्घिका ॥३२॥ सुता जनकराजस्य प्रभामण्डलसोदरा । स्नुषा दशरथस्याहं सीता पमाभपत्निका ॥३३॥ केकयावरदानेन भरताय निजं पदम् । दत्त्वाऽनरण्यपुत्रो'ऽसौ तपस्विपदमाश्रयत् ॥३४॥ रामलक्ष्मणयोः साकं मया प्रस्थितमायतम् । जातं श्रुतं त्वया नूनं पुण्यचेष्टितसङ्गतम् ॥१५॥ हृताऽस्मि राक्षसेन्द्रेण पत्युः सुग्रीवसङ्गमे । जाते भुक्तवती वात्ता सम्प्राप्यैकादशेऽहनि ॥३६॥ आकाशगामिभिर्यानरुत्तीर्य मकरालयम् । जित्वा दशमुखं युद्ध पत्याऽस्मि पुनराहता ॥३७॥ राज्यपत परित्यज्य भरतो भरतोपमः । श्रामण्यं परमाश्रित्य सिद्धिं धूतरजा ययौ ॥३८॥ अपत्यशोकनिर्दग्धा प्रव्रज्यासौ च केकया। देवी कृत्वा तपः सम्यग्देवलोकमुपागता ॥३६॥ महीतले विमर्यादो जनोऽयं दुष्टमानसः । ब्रीति परिवादं मे शङ्कया परिवर्जितः॥४०॥ रावणः परमः प्राज्ञो भूत्वाऽन्यस्त्रियमग्रहीत् । तामानीय पुना रामः सेवते धर्मशास्त्रवित् ॥४॥ यया ह्यवस्थया राजा वर्तते दृढनिश्चयः । सैवाऽस्माकमपि क्षेमा नूनं दोषो न विद्यते ॥४२॥ साऽहं गर्भान्विता जाता कृशाङ्गा वसुधातले । चिन्तयन्ती जिनेन्द्राणां करोम्यभ्यर्चनामिति ॥४३॥ सतो भर्ता मया स श्वेत्यवन्दने । जिनेन्द्रातिशयस्थानेष्वत्यन्त विभवान्वितः ॥४४॥ अगदीत् प्रथमं सोते गत्वाऽष्टापदपर्वतम् । ऋषभं भुवनानन्दं प्रणंस्थावः कृतार्चनौ ।।४५।। तदनन्तर सती सीता यद्यपि कुछ कहने के लिए क्षण भरको दुःखसे विरत हुई थी तथापि शोकरूपी विशाल चक्रसे हृदयके अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण वह पुनः रोने लगी ॥३०।। तत्पश्चात् मधुर भाषण करनेवाले राजाने जब बार बार पूछा तब वह जिस किसी तरह शोकको रोककर दुःखी हंसके समान गद्गद वाणीसे बोली ॥३१॥ उसने कहा कि हे राजन् ! यदि तुम्हें जाननेकी इच्छा है तो इस ओर मन लगाओ क्योंकि मुझ अभागिनीकी यह कथा अत्यन्त लम्बी है ॥३२।। मैं राजा जनककी पुत्री, भामण्डलकी बहिन, दशरथकी पुत्रवधू और रामकी पत्नी सीता हूँ ॥३३।। राजा दशरथ, केकयाके वरदानसे भरत के लिए अपना पद देकर तपस्वीके पदको प्राप्त हो गये ॥३४॥ फलस्वरूप राम लक्ष्मणको मेरे साथ वनको जाना पड़ा सो हे पुण्यचेष्टित ! जो कुछ हुआ वह सब तुमने सुना होगा ॥३५॥ राक्षसांके अधिपति रावणने मेरा हरण किया, स्वामी रामका सुग्रीवके साथ समागम हुआ और ग्यारहवें दिन समाचार पाकर मैने भोजन किया ॥३६॥ आकाशगामी वाहनोंसे समुद्र तैरकर तथा युद्ध में रावणको जीतकर मेरे पति मुझे पुनः वापिस ले आये ॥३७॥ भरत चक्रवर्तीके समान भरतने राज्यरूपी पङ्कका परित्याग कर परम दिगम्बर अवस्था धारण कर ली और कर्मरूपी धूलिको उड़ाकर निर्वाणपद प्राप्त किया ॥३८॥ पुत्रके शोकसे दुखी केकया रानी दीक्षा लेकर तथा अच्छी तरह तपश्चरण कर स्वर्ग गई ॥३६॥ पृथिवीतल पर मर्यादाहीन दुष्ट हृदय मनुष्य निःशङ्क होकर मेरा अपवाद कहने लगे कि रावणने परम विद्वान् होकर परस्त्री ग्रहण की और धर्मशास्त्रके ज्ञाता राम उसे वापिस लाकर पुनः सेवन करने लगे ॥४०-४१।। दृढ़ निश्चयको धारण करने वाला राजा जिस दशामें प्रवृत्ति करता है वही दशा हमलोगोंके लिए भी हितकारी है इसमें दोष नहीं है ॥४२॥ कृश शरीरको धारण करने वाली वह मैं जब गर्भवती हुई तब मैंने ऐसा विचार किया कि पृथिवी तल पर जितने जिनबिम्ब हैं उन सबकी मैं पूजा करूँ ॥४३॥ तदनन्तर अत्यधिक वैभवसे सहित स्वामी राम, जिनेन्द्र भगवान्के अतिशय स्थानों में जो जिनविम्ब थे उनकी वन्दना करनेके लिए मेरे साथ उद्यत हुए ॥४४॥ उन्होंने कहा कि हे सीते! सर्व प्रथम कैलास पर्वत पर जाकर जगत्को आनन्दित १. दशरथः। २. क्षेमी म०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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