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________________ सक्षनवतितम पर्व २१५ अपुण्यया मया साई पत्या परमसम्पदा । कष्टं मह्यां जिनेन्द्राणां कृता सम्मसु नार्चना ॥१८२॥ एवं तस्यां समाक्रन्दं कुर्वन्त्यां विह्वलात्मनि । राजा कुलिशेजङ्घाख्यस्तं वनान्तरमागतः ॥१८३॥ पौण्डरीकपुरः स्वामी गजयन्धार्थमागतः। प्रत्यागच्छन् महाभूतिर्गृहीतवरवारणः ॥॥१४॥ तस्य सैन्यशिरोजाताः प्लवमानाः पदातयः । नानाशस्त्रकराः कान्ताः शूरा बद्धासिधेनवः ॥१८५॥ श्रत्वा तददितस्वानं तथाप्यतिमनोहरम् । संशयानाः परित्रस्ताः पदं न परतो ददुः ॥१८६॥ अश्वीयमपि संरुद्धं पुरोभागमवस्थितम् । साशङ्करकृतप्रेरं सादिभिः श्रुतनिःस्वनैः ॥१८॥ उपजातिवृत्तम् कुतोऽत्र भीमेऽतितरामरण्ये परासुताकारणभूरिसरवे । अयं निनादो रुदितस्य रम्यः स्त्रैणो नु चित्रं परमं किमेतत् ॥१८॥ मालिनीवृत्तम् मृगमहिषतरक्षुद्वीपिशार्दूललोले समरशरभसिंहे कोलदंष्ट्राकराले । सुविमलशशिरेखाहारिणी केयमस्मिन् हृदयहरणदक्ष कक्षमध्ये विरौति ॥१८॥ सुरवरवनितेयं किन्नु सौधर्मकल्पादवनितलमुपेता पातिता वासवेन । उत जनसुखगीतासा नु देवी विधात्री भुवननिधनहेतोरागता स्यात् कुतोऽपि ॥१०॥ इति जनितवितकं वजिताऽऽत्मीयचेष्टं प्रजवसरणयुक्तंमूलगैः पूर्यमाणम् । प्रहतबहलतूरं तन्महावर्तकल्पं स्थितमचलमुदारं सैनिकं विस्मयाख्यम् ॥१६॥ कुण्डलमण्डित ! यह मैं कुलक्षणा दुःखरूपी आवर्तमें भ्रमण करती यहाँ पड़ी हूँ ॥१८१॥ खेद है कि मैं पापिनी पतिके साथ बड़े वैभवसे, पृथिवी पर जो जिनमन्दिर हैं उनमें जिनेन्द्र भगवान की पूजा नहीं कर सकी ॥१२॥ अथानन्तर जब विह्वल चित्त सीता विलाप कर रही थी तब एक वनजंघ नामक राजा उस वनके मध्य आया ॥१८॥ वनजंघ पुण्डरीकपुरका स्वामी था, हाथी पकड़नेके लिए उस वनमें आया था और हाथी पकड़कर बड़े वैभवसे लौटकर वापिस आ रहा था ॥१८४॥ उसकी सेनाके अग्रभागमें जो सैनिक उछलते हुए जा रहे थे वे यद्यपि अपने हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्र लिये थे, सुन्दर थे, शूरवीर थे और छुरियाँ बाँधे हुए थे तथापि सीताका वह अतिशय मनोहर रोदनका शब्द सुनकर वे संशयमें पड़ गये तथा इतने भयभीत हो गये कि एक डग भी आगे नहीं दे सके ॥१८५-१८६॥ सेनाके आगे चलने वाला जो घोड़ोंका समूह था वह भी रुक गया तथा उस रोदनका शब्द सुन आशङ्कासे युक्त घुड़सवार भी उसे प्रेरित नहीं कर सके ॥१८७॥ वे विचार करने लगे कि जहाँ मृत्युके कारणभूत अनेक प्राणी विद्यमान हैं ऐसे इस अत्यन्त भयंकर वनमें यह स्त्रीके रोनेका मनोहर शब्द हो रहा है सो यह बड़ी विचित्र क्या बात है ? ॥१८॥ जो मृग, भैंसा, भेड़िया, चीता और सिंदुआसे चञ्चल है जहाँ अष्टापद और सिंह घूम रहे हैं, तथा जो सुअरोंकी दाँढोंसे भयंकर है ऐसे इस वनके मध्यमें अत्यन्त निर्मल चन्द्रमाकी रेखाके समान यह कौन हृदयके हरनेमें निपुण रो रही है ? ॥१८॥ क्या यह सौधर्म स्वर्गसे इंद्रके द्वारा छोड़ी और पृथिवीतल पर आई हुई कोई इंद्राणो है अथवा मनुष्योंके सुख संगीतको नष्ट करने वाली एवं प्रलयके कारणको उत्पन्न करने वाली कोई देवी कहींसे आ पहुँची है ? ||१६०॥ इस प्रकार जिसे तर्क उत्पन्न हो रहा था, जिसने अपनी चेष्टा छोड़ दी थी, वेगसे चलनेवाले मूल पुरुष जिसमें आकर इकट्ठे हो रहे थे, जिसमें अत्यधिक बाजे बज रहे थे, जो किसी बड़ी भँवरके समान जान पड़ती थी और जो आश्चर्यसे युक्त थी ऐसी वह विशाल सेना निश्चल खड़ी हो गई ॥१६१।। १. मह्य भ०, ज० । २. वज्रजङ्घनामा । ३. दंष्ट्रान्तराले म । ४. देशं म०। ५. तूलं ल० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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