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________________ २०४ पद्मपुराणे नो पृथग्जनवादेन संक्षोभं यान्ति कोविदाः । न शुनो 'भषणाद्दन्ती वैलच्यं पद्यते ॥३०॥ विचित्रस्यास्य लोकस्य तरङ्गसमचेष्टिनः । परदोषकथासक्तेर्निग्रहं २स्वो विः ॥३१॥ शिलामुत्पाव्य शीतांशुं जिघांसुर्मोहवत्सलः । स्वयमेव नरो नाशमसन्दिग्धं ॥३२॥ अभ्याख्यानपरो दुष्टस्तथा परगुणासहः । नियतिं दुर्गतिं जन्तुर्दुःकर्मा प्रतिपद्य . ॥३३॥ बलदेवस्ततोऽवोचद्यथा बदसि लक्ष्मण । सत्यमेवमिदं बुद्धिर्मध्यस्था तव शोभना ॥३॥ किन्तु लोकविरुद्धानि त्यजतः शुद्धिशालिनः । न दोषो दृश्यते कश्चिद्गुणश्चैकान्तसम्भवः ॥३५॥ सौख्यं जगति किं तस्य का वाऽऽशा जीवितं प्रति । दिशो यस्यायशोदावज्वालालीढाः समन्ततः ॥३६॥ किमनर्थकृतार्थेन सविषेणौषधेन किम् । किं वीर्येण न रच्यन्ते प्राणिनो येन भीगताः ॥३७॥ चारित्रेण न तेनार्थो येन नात्मा हितोद्भवः । ज्ञानेन तेन किं येन ज्ञातो नाध्यात्मगोचरः ॥३८॥ प्रशस्तं जन्म नो तस्य यस्य कीर्तिवर्धू वराम् । बली हरति दुर्वादस्ततस्तु मरणं वरम् ॥३६॥ आस्तां जनपरीवादो दोषोऽप्यतिमहान्मम । परपुंसा हृता सीता यत्पुनर्गृहमाहृता ॥४०॥ रक्षसो भवनोद्याने चकार वसतिं चिरम् । अभ्यर्थिता च दृतीभिर्वदमानाभिरीप्सितम् ॥४१॥ दृष्टा च दुष्टया दृष्ट्या समीपावनिवर्तिना। असकृद्राक्षसेन्द्रेण भाषिता च यथेप्सितम् ॥४२॥ एवंविधां तक सीतां गृहमानयता मया । कथं न लजितं किंवा दुष्करं मूढचेतसाम् ॥४३॥ अपनी वास्तविकताको कहती है। यथार्थमें वस्तुका वास्तविक भाव ही उसकी यथार्थताके लिए पर्याप्त है बाह्यरूप नहीं ॥२६॥ साधारण मनुष्यके कहनेसे विद्वज्जन क्षोभको प्राप्त नहीं होते क्योंकि कुत्ताके भोंकनेसे हाथी लज्जाको प्राप्त नहीं होता ।।३०।। तरङ्गके समान चेष्टाको धारण करनेवाला यह विचित्र लोक दूसरेके दोष कहनेमें आसक्त है सो इसका निग्रह स्वयं इनकी आत्मा करेगी ।।३१॥ जो मूर्ख मनुष्य शिला उखाड़ कर चन्द्रमाको नष्ट करना चाहता है वह निःसन्देह स्वयं ही नाशको प्राप्त होता है ॥३२॥ चुगली करनेमें तत्पर एवं दूसरे के गुणोंको सहन नहीं करनेवाला दुष्कर्मा दुष्ट मनुष्य निश्चित ही दुर्गतिको प्राप्त होता है ।।३३।। तदनन्तर बलदेवने कहा कि लक्ष्मण ! तुम जैसा कह रहे हो सत्य वैसा ही है और -तुम्हारी मध्यस्थ बुद्धि भी शोभाका स्थान है ॥३४॥ परन्तु लोक विरुद्ध कार्यका परित्याग करनेवाले शुद्धिशाली मनुष्यका कोई दोष दिखाई नहीं देता अपितु उसके विरुद्ध गुण ही एकान्त रूपसे संभब मालूम होता है ॥३५॥ उस मनुष्यको संसार में क्या सुख हो सकता है ? अथवा जीवनके प्रति उसे क्या आशा हो सकती है जिसकी दिशाएँ सब ओरसे निन्दारूपी दावानलकी ज्वालाओंसे व्याप्त हैं ॥३६॥ अनर्थको उत्पन्न करनेवाले अर्थसे क्या प्रयोजन है ? विष सहित औषधिसे क्या लाभ है ? और उस पराक्रमसे भी क्या मतलब है जिससे भयमें पड़े प्राणियोंकी रक्षा नहीं होती ? ॥३७॥ उस चारित्रसे प्रयोजन नहीं है जिससे आत्मा अपना हित करने में उद्यत नहीं होता और उस ज्ञानसे क्या लाभ जिससे अध्यात्मका ज्ञान नहीं होता ॥३८।। उस मनुष्यका जन्म अच्छा नहीं कहा जा सकता जिसकी कीर्ति रूपी उत्तम वधूको अपयश रूपी बलवान् हर ले जाता है। अरे! इसकी अपेक्षा तो उसका मरना ही अच्छा है ॥३६॥ लोकापवाद जाने दो, मेरा भी तो यह बड़ा भारी दोष है जो मैं पर पुरुषके द्वारा हरी हुई सीताको फिरसे घर ले आया ॥४०॥ सीताने राक्षसके गृहोद्यानमें चिर काल तक निवास किया, कुत्सित वचन बोलने वाली दूतियोंने उससे अभिलषित पदार्थकी याचना की, समीपकी भूमिमें वर्तमान रावणने उसे कई बार दुष्ट दृष्टि से देखा तथा इच्छानुसार उससे वार्तालाप किया। ऐसी उस सीताको घर लाते १. भाषणाद्दन्ती म०, ज., ख० भषणं श्वरवः। २. श्वो म., ख. । ३. विधास्यते ख० । ४. -रितितम् म०। ५. भविता म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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