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________________ सप्तनवतितमं पर्व ततः कथमपि न्यस्य चिन्तामेकत्र वस्तुनि । आज्ञापयत् प्रतीहारं लक्ष्मणाकारणं प्रति ॥ १॥ प्रतीहारवचः श्रुत्वा लक्ष्मणः सम्भ्रमान्वितः । तुरङ्ग चलमारुह्य कृत्येक्षागतमानसः ॥२॥ रामस्यासन्नतां प्राप्य प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । आसीनो भूतले रम्ये तत्पाद निहितेक्षणः ॥ ३ ॥ स्वयमुत्थाप्य तं पद्मो विनयानतविग्रहम् । परमाश्रवताभाजं चक्रेऽर्घासन सङ्गतम् ॥४॥ शत्रुघ्नाः भूपाश्चन्द्रोदर तुतादयः । तथाऽविशन् कृतानुज्ञा आसीनाश्च यथोचितम् ॥५॥ पुरोहितः पुरः श्रेष्ठी मन्त्रिणोऽन्ये च सज्जनाः । यथायोग्यं समासीनाः कुतूहलसमन्विताः ॥ ६ ॥ ततः क्षणमित्र स्थित्वा बलदेवो यथाक्रमम् । लक्ष्मणाय परीवादसमुत्पत्तिं न्यवेदयत् ॥७॥ तदाकर्ण्य सुमित्राजो रोषलोहितलोचनः । सन्नदधुमादिशन् योधानिदं च पुनरभ्यधात् ||८|| अद्य गच्छाम्यहं शीघ्रमन्तं दुर्जर्नवारिधेः । करोमि धरणों मिथ्यावाक्य जिह्वातिरोहिताम् ॥ ॥ उपमान विनिर्मुक्तशीलसम्भारधारिणीम् । द्विषन्ति गुणगम्भीरां सीतां ये तान्नये क्षयम् ॥१०॥ ततो दुरीक्षितां प्राप्तं हरिं क्रोधवशीकृतम् । संक्षुधसंसदं वाक्यरिमैरशमयन्नृपः ॥ ११ ॥ सौम्य भकृतौपम्यैः सदृक्षैर्भरतस्य च । महीसागरपर्यन्ता पालितेयं नरोत्तमैः ॥ १२ ॥ इच्वाकुवंशतिलका आदित्ययशसादयः । आसन्नेषां रणे पृष्ठं दृष्टं नेन्दोरिवारिभिः ॥१३॥ तेषां यशः प्रतानेन कौमुदीपटशोभिना । अलङ्कृतमिदं लोकत्रितयं रहितान्तरम् ||१४|| अथानन्तर किसी तरह एक वस्तुमें चिन्ताको स्थिर कर श्रीरामने लक्ष्मणको बुलाने के लिए द्वारपालको आज्ञा दी ||१|| कार्योंके देखनेमें जिनका मन लग रहा था ऐसे लक्ष्मण, द्वारपालके वचन सुन हड़बड़ाहटके साथ चञ्चल घोड़े पर सवार हो श्रीराम के निकट पहुँचे और हाथ जोड़ नमस्कार कर उनके चरणों में दृष्टि लगाये हुए मनोहर पृथिवी पर बैठ गये ॥२- ३ || जिनका शरीर विनयसे नम्रीभूत था तथा जो परम आज्ञाकारी थे ऐसे लक्ष्मणको स्वयं उठाकर रामने अर्धासन पर बैठाया ||४|| जिनमें शत्रुघ्न प्रधान था ऐसे विराधित आदि राजा भी आज्ञा लेकर भीतर प्रविष्ट हुए और सब यथायोग्य स्थानों पर बैठ गये ||५|| पुरोहित, नगरसेठ, मन्त्री तथा अन्य सज्जन कुतूहल से युक्त हो यथायोग्य स्थान पर बैठ गये || ६ || तदनन्तर क्षण भर ठहर कर रामने यथाक्रम से लक्ष्मणके लिए अपवाद उत्पन्न होनेका समाचार सुनाया || सो उसे सुनकर लक्ष्मणके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । उन्होंने उसी समय योद्धाओं को तैयार होने का आदेश दिया तथा स्वयं कहा कि मैं आज दुर्जन रूपी समुद्र के अन्त को प्राप्त होता हूँ और मिथ्यावादी लोगोंको जिह्वाओंसे पृथिवीको आच्छादित करता हूँ || ८-६ ॥ अनुपम शीलके समूहको धारण करनेवाली एवं गुणोंसे गम्भीर सीता के प्रति जो द्वेष करते हैं मैं उन्हें आज क्षयको प्राप्त कराता हूँ ॥ १०॥ तदनन्तर जो क्रोधके वशीभूत हो दुर्दशनीय अवस्थाको प्राप्त हुए थे तथा जिन्होंने सभाको क्षोभ युक्त कर दिया था ऐसे लक्ष्मणको रामने इन वचनों से शान्त किया कि हे सौम्य ! यह समुद्रान्त पृथिवी भगवान् ऋषभदेव तथा भरत चक्रवर्ती जैसे उत्तमोत्तम पुरुषोंके द्वारा चिरकालसे पालित है ॥११- १२ || अर्ककीर्ति आदि राजा इक्ष्वाकुवंशके तिलक थे। जिस प्रकार कोई चन्द्रमाकी पीठ नहीं देख सकता उसी प्रकार इनकी पीठ भी युद्ध में शत्रु नहीं देख सके थे || १३ || चाँदनी रूपी पटके समान सुशोभित उनके यशके समूह से ये तीनों १. परमाश्रयता-म० । २. चन्द्रोदय म० । ३. मन्तदुर्जन म० । ४. जिह्वतिरोहिताम् म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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