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________________ पद्मपुराणे मायाम्यत्यन्त चित्राणि प्रापितानि प्रसारणम् । सौरभाकृष्टभृङ्गाणि कृतान्युत्तमं शिल्पिभिः ॥ ४५ ॥ विशालातोद्यशालाभिः कल्पिताभिश्च नैकशः । तथा प्रेक्षकशालाभिः तदुद्यानमलङ्कृतम् ॥४६॥ एवमत्यन्तचार्वीभिरत्युर्वीभिर्विभूतिभिः । महेन्द्रोदयमुयानं जातं नन्दनसुन्दरम् ॥४७॥ आर्या छन्दः १६.४ अथ भूत्यासुरपतित्रत्सपुरजनपदसमन्वितो देवीभिः । सर्वामात्यसमेतः पद्मः सीतान्वितो ययावुद्यानम् ॥४८॥ परमं गजमारूढः सीतायुक्तो रराज बाढं पद्मः । ऐरावतपृष्ठगतः शच्या यथा दिवौकसां नाथः ॥ ४६ ॥ नारायणोऽपि च यथा परमामृद्धिं समुद्वहन् याति स्म । शेषजनश्च सदाईं हृष्टः स्फीतो 'महान्नपानसमृद्धः ॥५०॥ कदलीगृह मनोहरगृहेष्वतिमुक्तकमण्डपेषु च मनोज्ञेषु । देव्यः स्थिता महद यथार्ह मन्यो जनश्च सुखमासीनः ॥५१॥ अवतीर्य गजाद् रामः कामः कमलोत्पलसङ्कुले समुद्रोदारे । सरसि सुखं विमलजले रेमे क्षीरोदसागरे शक्र इव ॥ ५२ ॥ तस्मिन् सङक्रीड्य चिरं कृत्वा पुष्पोश्चयं जलादुत्तीर्य । दिव्येनाचन विधिना वैदेह्या सङ्गतो जिनानानर्च ॥ ५३ ॥ रामो मनोभिरामः काननलक्ष्मीसमाभिरु द्धस्त्रीभिः । 3 "कृतपरिवरणो रेजे वसन्त इव मूर्तिमानुपेतः श्रीमान् ॥ ५४ ॥ डंडियाँ थीं ऐसे पाँचवर्णके कामदार चमरोंके साथ-साथ बड़ी-बड़ी हाँ ड़ियाँ लटकाई गई थीं ||४४ || जो सुगन्धिसे भ्रमरोंको आकर्षित कर रही थीं तथा उत्तम कारीगरोंने जिन्हें निर्मित किया था ऐसी नाना प्रकारकी मालाएँ फैलाई गई थीं ॥४५॥ अनेकोंकी संख्या में जगह- जगह बनाई गई विशाल वादनशालाओं और प्रेक्षकशालाओं - दर्शकगृहों से वह उद्यान अलंकृत किया गया था ||४६॥ इस प्रकार अत्यन्त सुन्दर विशाल विभूतियोंसे वह महेन्द्रोदय उद्यान नन्दनवन के समान सुन्दर हो गया था ॥४७॥ अथानन्तर नगरवासी तथा देशवासी लोगों के साथ, स्त्रियों के साथ, समस्त मन्त्रियों के साथ, और सीता के साथ रामचन्द्रजी इन्द्रके समान बड़े वैभवसे उस उद्यानकी ओर चले ||४८॥ सीता के साथ-साथ उत्तम हाथी पर बैठे हुए राम ठीक उस तरह सुशोभित हो रहे थे जिस तरह इन्द्राणी के साथ ऐरावत के पृष्ठपर बैठा हुआ इन्द्र सुशोभित होता है ॥ ४६ ॥ यथायोग्य ऋद्धिको धारण करनेवाले लक्ष्मण तथा हर्षसे युक्त एवं अत्यधिक अन्न पानकी सामग्री से सहित शेष लोग भी अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार जा रहे थे ||३०|| वहाँ जाकर देवियाँ मनोहर कदली गृहों में तथा अतिमुक्तक लताके सुन्दर निकुञ्जों में महावैभवके साथ ठहर गई तथा अन्य लोग भी यथा योग्य स्थानों में सुख बैठ गये ॥ ५१ ॥ हाथी से उतर कर रामने कमलों तथा नील कमलों से व्याप्त एवं समुद्रके समान विशाल, निर्मल जलवाले सरोवर में सुखपूर्वक उस तरह क्रीड़ा की जिस तरह कि क्षीरसागर में इन्द्र करता है ||३२|| तदनन्तर सरोवर में चिर काल तक क्रीड़ा कर, उन्होंने फूल तोड़े और जलसे बाहर निकल कर पूजाकी दिव्य सामग्री से सीता के साथ मिलकर जिनेन्द्र भगवान् की पूजा की ॥५३॥ वनलक्ष्मियोंके समान उत्तमोत्तम स्त्रियोंसे घिरे हुए मनोहारी राम उस समय ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो शरीरधारी श्रीमान् वसन्त ही आ पहुँचा हो ||५४|| Jain Education International १. मदान्न म० । २. कामः कमलोत्पलसंकुले समुदारे म० । ३. क्षतपरिचरणो म० । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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