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________________ पञ्चनवतितम पर्व एवमाकर्ण्य पद्माभः स्मेरवक्त्रः प्रमोदवान् । समादिशत् प्रतीहारी तत्क्षणप्रणताङ्गिकाम् ॥२६॥ अयि कल्याणि ! निक्षेपममात्यो गद्यतामिति । जिनालयेषु क्रियतामचना महतीत्यलम् ॥३०॥ महेन्द्रोदयमुद्यानं समेत्य सुमहादरम् । क्रियतां सर्वलोकेन सुशोभा जिनवेश्मनाम् ॥३१॥ तोरणेवैजयन्तीभिर्घण्टालम्बूपबुद्बुदैः । अर्धचन्द्रवितानैश्च वस्त्रैश्च सुमनोहरैः ॥३२॥ तथोपकरणैरन्यः समस्तैरतिसुन्दरैः । लोको मह्यां समस्तायां करोतु जिनपूजनम् ॥३३॥ निर्वाणधामचैत्यानि विभूष्यन्तां विशेषतः । महानन्दाः प्रवर्त्यन्तां सर्वसम्पत्तिसङ्गताः ॥३४॥ कल्याणं दोहदं तेषु वैदेयाः प्रतिपूजयन् । विहराम्यनया साकं महिमानं समेधयन् ॥३५॥ आदिष्टया तयेत्यात्मपदे कृत्वाऽऽत्मसम्मिताम् । यथोक्तं गदितोऽमात्यस्तेनादिष्टाः स्वकिङ्कराः ॥३६॥ व्यतिपत्य महोद्योगैस्ततस्तैः सम्मदान्वितैः । उपशोभा' जिनेन्द्राणामालयेषु प्रवर्तिता ॥३७॥ महागिरिगुहाद्वारगम्भीरेषु मनोहराः । स्थापिताः पूर्णकलशाः सुहारादिविभूषिताः ॥३८॥ मणिचित्रसमाकृष्टचित्ता परमपट्टकाः । प्रसारिता विशालासु हेममण्डलभित्तिषु ॥३६॥ अत्यन्त विमलाः शुद्धाः स्तम्भेषु मणिदर्पणाः । हारा गवाक्षवक्त्रेषु स्वच्छनिझरहारिणः ॥४०॥ विचित्रा भक्तयो न्यस्ता रत्नचूर्णेन चारुणा । विभक्ताः पञ्चवर्णेन पादगोचरभूमिषु ॥४॥ न्यस्तानि शतपत्राणि सहस्रच्छदनानि च । देहलीकाण्डयुक्तानि कमलान्यपरत्र च ॥४२॥ हस्तसम्पर्कयोग्येषु स्थानेषु कृतमुज्ज्वलम् । किङ्किणीजालकं मत्तकामिनीसमनिःस्वनम् ॥४३॥ पञ्चवर्णैर्विकाराव्यश्वामरैर्मण्डिदण्डकैः । संयुक्ताः पट्टलम्बूषाः स्वायताङ्गाः प्रलम्बिताः ॥४४॥ यह सुनकर हर्षसे मुसकराते हुए रामने तत्काल ही नम्रीभूत शरीरको धारण करनेवाली द्वारपालिनी से कहा कि हे कल्याणि ! विलम्ब किये बिना ही मन्त्रीसे यह कहो कि जिनालयामें अच्छी तरह विशाल पूजा की जावे ॥२६-३०।। सब लोग बहुत भारी आदरके साथ महेन्द्रोदय उद्यानमें जाकर जिन-मन्दिरोंको शोभा करें ॥३१॥ तोरण, पताका, घंटा, लम्बूष, गोले, अर्धचन्द्र, चंदोवा, अत्यन्त मनोहर वस्त्र, तथा अत्यन्त सुन्दर अन्यान्य समस्त उपकरणोंके द्वारा लोग सम्पूर्ण पृथिवी पर जिन-पूजा करें ॥३२-३३॥ निर्वाण क्षेत्रोंके मन्दिर विशेष रूपसे विभूषित किये जावें तथा सर्व सम्पत्तिसे सहित महा आनन्द-बहुत भारी हर्षके कारण प्रवृत्त किये जावें ॥३४॥ उन सबमें पूजा करनेका जो सीताका दोहला है वह बहुत ही उत्तम है सो मैं पूजा करता हुआ तथा जिन शासन की महिमा बढ़ाता हुआ इसके साथ विहार करूंगा ॥३५॥ इस प्रकार आज्ञा पाकर द्वारपालिनीने न पर अपने ही समान किसी दूसरी स्त्रीको नियुक्त कर रामके कहे अनुसार मन्त्रीसे कह दिया और मन्त्रीने भी अपने सेवकोंके लिए तत्काल आज्ञा दे दी ॥३६॥ तदनन्तर महान् उद्योगी एवं हर्षसे सहित उन सेवकोंने शीघ्र ही जाकर जिन-मन्दिरोंमें सजावट कर दी ॥३७॥ महापर्वतकी गुफाओंके समान जो मन्दिरों के विशाल द्वार थे उन पर उत्तम हार आदिसे अलंकृत पूर्ण कलश स्थापित किये गये ॥३८॥ मन्दिरोंकी सुवर्णमयी लम्बीचौड़ी दीवालों पर मणिमय चित्रोंसे चित्तको आकर्षित करनेवाले उत्तमोत्तम चित्रपट फैलाये गये ॥३॥ खम्भोंके ऊपर अत्यन्त निर्मल एवं शुद्ध मणियोंके दर्पण लगाये गये और झरोखोंके अग्रभागमें स्वच्छ झरनेके समान मनोहर हार लटकाये गये ॥४०॥ मनुष्योंके जहाँ चरण पड़ते थे ऐसी भूमियों में पाँच वर्णके रत्नमय सुन्दर चूर्णों से नाना प्रकारके बेल-बूटे खींचे गये थे ॥४१॥ जिनमें सौ अथवा हजार कलिकाएँ थीं तथा जो लम्बी डंडीसे युक्त थे ऐसे कमल उन मन्दिरोंकी देहलियों पर तथा अन्य स्थानों पर रक्खे गये थे ॥४२॥ हाथसे पाने योग्य स्थानोंमें मत्त स्त्रीके समान शब्द करनेवाली उज्ज्वल छोटी-छोटी घंटियोंके समूह लगाये गये थे॥४३।। जिनकी मणिमय १. उपशोभी म० । २. चित्राः म० । ३. 'देहल्याम्' इति पाठः सम्यक् प्रतिभाति । ४. पद- म० । ___Jain Education International२५-३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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