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________________ पद्मपुराणे अशाश्वते समस्तेऽस्मिनारम्भे दुःखदायिनि । कमैकमेव संसारे शस्यते धर्मकारणम् ॥१८॥ नृजन्म सुकृती प्राप्य धर्मे दत्ते न यो मतिम् । स मोहकर्मणा जन्तुर्वञ्चितः परमार्थतः ॥६॥ ध्रुवं पुनर्भवं ज्ञात्वा पापेनात्महितं मया । न कृतं स्ववशे काले धिङ्मां मूढं प्रमादिनम् ॥१००॥ आत्माधीनस्य पापस्य कथं जाता न मे सुधीः । पुरस्कृतोऽरिणेदानीं किं करोमि हताशकः ॥१०॥ प्रदीले भवने कीरक तहागखननादरः । को वा भुजङ्गदष्टस्य कालो मन्त्रस्य साधने ॥१०२॥ सर्वथा यावदेतस्मिन् समये स्वार्थकारणम् । शुभं मनःसमाधानं कुर्वे तावदनाकुलः ॥१०३॥ अर्हनयोऽथ विमुक्तभ्य आचार्येभ्यस्तथा विधा । उपाध्यायगुरुभ्यश्च साधुभ्यश्च नमो नमः ॥१०॥ अर्हन्तोऽथ विमुक्ताश्च साधवः केवलीरितः । धर्मश्च मङ्गलं शश्वदुत्तमं मे चतुष्टयम् ॥ द्वीपेवर्धतृतीयेषु त्रिपञ्चार्जनभूमिषु । अर्हतां लोकनाथानामेषोऽस्मि प्रणतस्त्रिधा ॥१०६॥ यावजीवं सहावद्य योगं मुञ्चे न चात्मकम् । निन्दामि च पुरोपात्तं प्रत्याख्यानपरायणः ॥१०७॥ अनादौ भवकान्तारे यन्मया समुपार्जितम् । मिथ्या दुष्कृतमेतन्मे स्थितोऽहं तस्वसङ्गतौ ॥१०॥ व्युत्सृजाम्येष हातव्यमुपादेयमुपाददे । ज्ञानं दर्शनमात्मा मे शेष संयोगलक्षणम् ॥१०॥ संस्तरः परमार्थेन न तृणं न च भूः शुभा। मत्या कलुषया मुक्तो जीव एव हि संस्तरः ॥११०॥ एवं सद्ध्यानमारुह्य त्यक्त्वा ग्रन्थं द्वयात्मकम् । द्रव्यतो गजपृष्ठस्थो मधुः केशानपानयत् ॥१११॥ कर्मका उदय क्षीण हो गया जिससे उसने बड़ी धीरता और पश्चात्तापके साथ दिगम्बर मुनियोंके वचनका स्मरण किया ॥६६-६७।। वह विचार करने लगा कि यह समस्त आरम्भ क्षणभङ्गुर तथा दुःख देनेवाला है। इस संसार में एक वही कार्य प्रशंसा योग्य है जो धर्मका कारण है ॥६८|| जो पुण्यात्मा प्राणी मनुष्य जन्म पाकर धर्ममें बुद्धि नहीं लगाता है वह यथार्थमें मोह कर्मके द्वारा ठगा गया है ॥६६॥ पुनर्जन्म अवश्य ही होगा ऐसा जानकर भी मुझ पापीने उस समय अपना हित नहीं किया जिस समय कि काल अपने आधीन था अतः प्रमाद करनेवाले मुझ मूर्खको धिकार है ॥१००॥ मैं पापी जब स्वाधीन था तब मुझे सद्बुद्धि क्यों नहीं उत्पन्न हुई ? अब जब कि शत्रु मुझे अपने सामने किये हुए है तब मैं अभागा क्या करूँ ? ॥१०१।। जब भवन जलने लगता है तब कुआ खुदवानेके प्रति आदर कैसा ? और जिसे साँपने डस लिया है उसे मन्त्र सिद्ध करनेका समय क्या है ? अर्थात् ये सब कार्य तो पहलेसे करनेके योग्य होते हैं ।।१०२॥ इस समय तो सब प्रकारसे यही उचित जान पड़ता है कि मैं निराकुल हो मनका शुभ समाधान करूँ क्योंकि वही आत्महितका कारण है ॥१०३॥ अहेन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु इन पाँचों परमेष्ठियोंके लिए मन, वचन कायसे बार बार नमस्कार हो ।।१०४।। अर्हन्त, सिद्ध, साधु और केवली भगवानके द्वारा कहा हुआ धर्म ये चारों पदार्थ मेरे लिए सदा मङ्गल स्वरूप हैं ॥१०।। अढ़ाई द्वीप सम्बन्धी पन्द्रह कर्मभूमियोंमें जितने अर्हन्त हैं मैं उन सबको मन वचन कायसे नमस्कार करता हूँ ॥१०६।। मैं जीवन पर्यन्तके लिए सावध योगका त्याग करता हूँ उसके विपरीत शुद्ध आत्माका त्याग नहीं करता हूँ तथा प्रत्याख्यानमें तत्पर होकर पूर्वोपार्जित पाप कर्मकी निन्दा करता हूँ ॥१०७॥ इस आदिरहित संसार रूप अटवीमें मैंने जो पाप किया है वह मिथ्या हो। अब मैं तत्त्व विचार करने में लीन होता हूँ ॥१०॥ यह मैं छोड़ने योग्य समस्त कार्योको छोड़ता हूँ और ग्रहण करने योग्य कार्यको ग्रहण करता हूँ, ज्ञान दर्शन ही मेरी आत्मा है पर पदार्थके संयोगसे होनेवाले अन्य भाव सब पर पदार्थ हैं ॥१०६।। समाधिमरणके लिए यथार्थमें न तृण ही सांथरा है और न उत्तम भूमि ही सांथरा है किन्तु कलुषित बुद्धिसे रहित आत्मा ही उत्तम सांथरा है ॥११०।। इस प्रकार समीचीन ध्यान पर आरूढ हो उसने अन्तरङ्ग तथा बहिरङ्ग दोनों प्रकारके परिग्रह छोड़ दिये १. पञ्चदशकर्मभूमिषु । २. प्रणती स्त्रिधा म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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