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________________ एकाशीतितमं पर्व ब्रह्मलोकभवाकारां लक्ष्मी लक्ष्मणपूर्वजः । चन्द्राङ्कचूडदेवेन्द्रप्रतिमोऽनुभवनसौ ॥१॥ भत्त'पुत्रवियोगाग्निज्वालाशोषितविग्रहाम् । विस्मृतः कथमेकान्तं जननीमपराजिताम् ॥२॥ सप्तमं तलमारूढा प्रासादस्य सखीवृता । उद्विग्नाऽस्रप्रपूर्णाक्षा नवधेनुरिवाकुला ॥३॥ . वीक्षते सा दिशः सर्वाः पुत्रस्नेहपरायणा । कांदन्ती दर्शनं तीवशोकसागरवर्तिनी ॥४॥ पताकाशिखरे तिष्ठन्नुत्पतोत्पतवायस । पद्मः पुत्रो ममाऽऽयातु तव दास्यामि पायसम् ॥५॥ इत्युक्त्वा चेष्टितं तस्य ध्यात्वा ध्यानं मनोहरम् । विलापं कुरुते नेत्र दुर्दिनकारिणी ॥६॥ हा वत्सक व यातोऽसि सततं सुखलालितः । विदेशभ्रमणे प्रीतिस्तव केयं समुद्गता 1॥ पादपल्लवयोः पीडां प्राप्नोपि परुषे पथि । विश्रमिष्यसि कस्याऽधो गहनस्योत्कटश्रमः ॥८॥ मन्दभाग्यां परित्यज्य मकामत्यर्थदुःखिताम् । यातोऽसि कतमामाशा भ्रात्रा पुत्रकसङ्गतः ॥६॥ परदेवनमारेभे सा कत्तु चैवमादिकम् । देवषिश्व परिप्राप्तो गगनाङ्गणगोचरः ॥१०॥ जटाकूर्चधरः शुक्लवस्त्रप्रावृतविग्रहः । अवद्वारगुणाभिख्यो नारदः क्षितिविश्रतः ॥११॥ तं समीपत्वमायातमभ्युत्थायापराजिता । आसानाधुपचारेण सादरं सममानयत् ॥१२॥ अथानन्तर जो स्वर्ग लोककी लक्ष्मीके समान राजलक्ष्मीका उपभोग कर रहे थे ऐसे चन्द्राङ्कचूड इन्द्र के तुल्य श्रीराम, पति और पुत्रके वियोगरूपी अग्निकी ज्वालासे जिनका शरीर सूख गया था ऐसी माता कौसल्याको एकदम क्यों भूल गये थे ? ॥१-२।। जो निरन्तर उद्विग्न रहती थी, जिसके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त रहते थे, जो नवप्रसूता गायके समान अपने पुत्रसे मिलनेके लिए अत्यन्त व्याकुल थी, पुत्रके प्रति स्नेह प्रकट करनेमें तत्पर थी, तीव्र शोकरूपी सागरमें विद्यमान थी और पुत्रके दर्शनकी इच्छा रखती थी, ऐसी कौसल्या सखियोंके साथ महलके सातवें खण्डपर चढ़ कर सब दिशाओंकी ओर देखती रखती थी ॥३-४॥ वह पागलकी भाँति पताकाके शिखरपर बैठे हुए काकसे कहती थी कि रे वायस ! उड़-उड़। यदि मेरा पुत्र राम आ जायगा तो मैं तुझे खीरका भोजन देऊँगी ।।५।। ऐसा कहकर उसकी मनोहर चेष्टाओंका ध्यान करती और जब उसको ओरसे कुछ उत्तर नहीं मिलता तब नेत्रोंसे आँसुओंकी घनघोर वर्षा करती हुई विलाप करने लगती ॥६॥। वह कहती कि हाय पुत्र ! तू कहाँ चला गया ? तू निरन्तर सुखसे लड़ाया गया था। तुझे विदेश भ्रमणकी यह कौन-सी प्रीति उत्पन्न हुई है ? ॥७॥ तू कठोर मार्गमें चरण-किसलयोंकी पीड़ाको प्राप्त हो रहा होगा। अर्थात् कंकरीले पथरीले मार्गमें चलते-चलते तेरे कोमल पैर दुखने लगते होंगे तब तू अत्यन्त थक कर किस वनके नीचे विश्राम करता होगा ? |८|| हाय बेटा ! अत्यन्त दुःखिनी मुझ मन्दभागिनीको छोड़ तू भाई लक्ष्मणके साथ किस दिशामें चला गया है ?॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! वह कौसल्या जिस समय इस प्रकारका विलाप कर रही थी उसी समय आकाशमार्गमें विहार करनेवाले देवर्षि नारद वहाँ आये |१|| वे नारद जटारूपी कूर्चको धारण किये हुए थे, सफेद वस्त्रसे उनका शरीर आवृत था, अवद्वार नामके धारक थे और पृथिवीमें सर्वत्र प्रसिद्ध थे ॥११॥ उन्हें समोपमें आया देख कौसल्याने उठकर तथा आसन आदि देकर उनका १. चन्द्रार्क म० । २. कौशल्याम् । ३. रिवावृता.म० । ४. जननी ब० । ५. वायसः म० । ६. नेत्रवास्य म० । ७. भ्रातृ म०।८. परिवेदन-म०।६. समीपस्थ म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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