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________________ पद्मपुराणे २ मेघवाहोsनगारोऽपि विपयेन्धनपावकः । केवलज्ञानतः प्राप्तः स्वभावं जीवगोचरम् ॥ १२८ ॥ तयोरनन्तरं सम्यग्दर्शनज्ञान चेष्टितः । शुक्ललेश्याविशुद्धात्मा कलशश्रवणो मुनिः ॥ १२६ ॥ पश्यं लोकमलोकं च केवलेन तथाविधम् । विरजस्कः परिप्राप्तः परमं पदमच्युतम् ॥ १३० ॥ सुरासुरजनाधीशैरुप्रीतोत्तमकीर्त्तयः । शुद्धशीलधरा दीप्ताः प्रणताश्च महर्षयः || १३ || गोष्पदीकृत निःशेषगहनज्ञेयतेजसः । संसारक्लेशदुर्मोचजालबन्धन निर्गताः ॥१३२॥ अपुनःपतनस्थानसम्प्राप्तिस्वार्थसङ्गताः । उपमानविनिर्मुक्तनिष्प्रत्यूह सुखात्मकाः ।। १३३ ।। एतेऽन्ये च महात्मानः सिद्धा निर्धूतशत्रवः । दिशन्तु बोधिमारोग्यं श्रोतॄणां जिनशासने ॥ १३४ ॥ यशसा परिवीतान्यद्यत्वेऽपि परमात्मनाम् । स्थानानि तानि दृश्यन्ते दृश्यन्ते साधवो न ते ॥ १३५ ।। विन्ध्यारण्यमहास्थल्यां सार्द्धमिन्द्रजिता यतः । मेघनादः स्थितस्तेन तीर्थं मेघरवं स्मृतम् ।। १३६ । तूर्णागतिमहारीले नानाद्रुमलताकुले । नानापचिगणाकीर्णे नानाश्वापदसेविते ॥१३७॥ परिप्राप्तोऽहमिन्द्रत्वं जम्बुमाली महाबलः । अहिंसादिगुणाढ्यस्य किमु धर्मस्य दुष्करम् ॥१३८ || ऐरावतेो महावत विभूषणः । कैवल्यतेजसा युक्तः सिद्धस्थानं गमिष्यति ॥ १३६ ॥ अरजा निस्तमो योगी कुम्भकर्णो महामुनिः । निर्वृत्तो नर्मदातीरे तत्तीर्थं पिठरक्षतम् ॥१४०॥ नभोविचारिणीं पूर्व लब्धि प्राप्य महाद्युतिः । मयो विहरणं चक्रे स्वेच्छं निर्वाणभूमिषु ॥ १४१ ॥ प्रदेशानृषभादीनां देवागमनसेवितान् । महाष्टतिपरोऽपश्यद्वत्न त्रितयमण्डनः ॥ १४२ ॥ १०२ था || १२७|| विषय रूपी ईन्धनको जलानेके लिए अग्निके समान जो मेघ वाहन मुनिराज थे वे केवलज्ञान प्राप्त कर आत्म स्वभावको प्राप्त हुए || १२८ || उन दोनों के बाद सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकू चरित्रको धारण करने वाले कुम्भकर्ण मुनिराज भी शुक्ल लेश्या के प्रभाव से अत्यन्त . विशुद्धात्मा हो केवलज्ञानके द्वारा लोक और अलोकको ज्योंका त्यों देखते हुए कर्मधूलिको दूर कर अविनाशी परम पदको प्राप्त हुए ।। १२६-१३० || इनके सिवाय सुरेन्द्र, असुरेन्द्र तथा चक्रवर्ती जिनकी उत्तम कीर्तिका गान करते थे, जो शुद्ध शील के धारक थे, देदीप्यमान थे, गर्व रहित थे. जो समस्त पदार्थ रूपी सघन ज्ञेयको गोष्पदके समान तुच्छ करने वाले तेजसे सहित थे, जो संसारके क्लेश रूपी कठिन बन्धनके जालसे निकल चुके थे, जहाँसे पुनः लौटकर नहीं आना पड़ता ऐसे मोक्ष स्थानकी प्राप्ति रूपी स्वार्थसे जो सहित थे, अनुपम तथा निर्विघ्न सुख ही जिनका स्वरूप था, जिनकी आत्मा महान् थी, जो सिद्ध थे तथा शत्रुओं को नष्ट करने वाले थे, ऐसे ये तथा अन्य जो महर्षि थे वे जिनशासन के श्रोता मनुष्यों के लिए रत्नत्रय रूपी आरोग्य प्रदान करें ॥ १३१-१३४।। गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! उनपर महात्माओंका प्रभाव तो देखो कि आज भी उन परमात्माओं के यशसे व्याप्त वे दिखाई देते हैं पर वे साधु नहीं दिखाई देते ॥ १३५ ॥ विन्ध्यवन की महाभूमि में जहाँ इन्द्रजित् के साथ मेघवाहन मुनिराज विराजमान रहे वहाँ आज मेघरव नामका तीर्थ प्रसिद्ध हुआ है ॥ १३६ ॥ अनेक वृक्षों और लताओंसे व्याप्त, नानापक्षियोंके समूह से युक्त एवं नाना जानवरोंसे सेवित तूणीगति नामक महाशैल पर महा बलवान् जम्बुमाली नामक मुनि अहमिन्द्र अवस्थाको, प्राप्त हुआ सो ठीक ही है क्योंकि अहिंसादि गुणोंसे युक्त धर्मके लिए क्या कठिन है ? ॥ १३७ - १३८ || यह जम्बुमालीका जीव ऐरावत क्षेत्र में अवतार ले महात्रत रूपी विभूषण से अलंकृत तथा केवल ज्ञान रूपी तेजसे युक्त हो मुक्ति स्थानको प्राप्त होगा || १३६ ॥ रजोगुण तथा तमोगुण से रहित महामुनि कुम्भकर्ण योगी नर्मदाके जिस तीर पर निर्वाणको प्राप्त हुए थे वहाँ पिठरक्षत नामका तीर्थ प्रसिद्ध हुआ || १४०|| महा दीप्तिके धारक मय मुनिने आकाशगामिनी ऋद्धि पाकर इच्छानुसार निर्वाण-भूमियों में विहार किया || १४१ || रत्नत्रय रूपी मण्डनको १. मेववाहानगारोऽपि म० । २. कुम्भकर्णः । ३. मिन्द्रजितो म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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