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________________ एकत्रिंशत्तम पर्व इक्ष्वाकूणां कुलं श्रीमद्भषयामलविभ्रमम् । अस्यन्तविपुलं भ्रातः शशी ग्रहकुलं यथा ॥१६॥ भ्राजते त्रायमाणः सन् वाक्यं तरिपतृकस्य यत् । लब्धवर्णरिदं भ्रातुओतृत्वं परिकीर्तितम् ॥१६३॥ इत्युक्त्वा भावतः पादौ शिरसा भूतलस्पृशा । पितुः प्रणम्य तत्पाश्र्वान्निर्गतो लक्ष्मणान्वितः॥१६४।। अत्रान्तरे नृपो मूछों संप्राप्तोऽपि न केनचित् । ज्ञातः स्तम्भसमायुक्तवपुः पुस्तसमाकृतिः ॥१६५॥ स तूर्ण धनुरादाय गत्वा नरवा च मातरम् । आपृच्छय तां च गच्छामि तावदन्यमहीमिति ॥१६६॥ सखीत्वं मूर्छया तस्या दुःखज्ञाननिवारणात् । क्षणं कृतं परिप्राप्तसंज्ञा चानाकुलेक्षणा ॥१६७॥ ऊचेऽपराजिता' हा त्वं वत्स व प्रस्थितोऽसि माम् । कस्मात्त्यजसि सच्चेष्ट क्षिप्त्वा शोकमहोदधौ ॥१६८॥ मनोरथशतैः पुत्र त्वं प्राप्तो दुर्लभो मया । प्रारोह इव शाखाया मातुरालम्बनं सुतः ।।१६९।। परिदेवनमेवं तां कुर्वन्ती हृदयङ्गमम् । जगाद प्रणतः पद्मो मातृमक्तिपरायणः ॥१७॥ अम्ब मा गाद विषादं त्वं दक्षिणस्यामहं दिशि । निरूप्य संश्रयं योग्यं नेष्यामि त्वां विसंशयम वातेन पृथिवी दत्ता जननीवरदानतः । मरतायेति ते 'कर्णजाहं नूनमुपागतम् ॥१७२॥ अन्ते तस्या महारण्ये विन्ध्यादौ मलयेऽथवा । अन्यस्मिन् चार्णवस्यान्ते पश्य मातः कृतं पदम् ।।१७३।। मयि स्थिते समीपेऽस्मिन् लोके भास्करसंमते । आज्ञेश्वर्यमयी कान्तिभरतेन्दोन जायते ॥१७॥ ततः प्ररुदती माता जगादात्यन्तदुःखिता। पुत्रं विनतमाश्लिष्य स्नेहकातरलोचना ॥१७५।। मान और न्यायमें तत्पर रहकर पृथ्वीकी रक्षा कर ॥१६१।। हे भाई ! जिस प्रकार चन्द्रमा ग्रहोंके समूहको अलंकृत करता है उसी प्रकार तु इक्ष्वाकुओंके इस लक्ष्मीसम्पन्न, निर्मल एवं अत्यन्त विशाल कुलको अलंकृत कर ॥१६२।। जो पिताके वचनकी रक्षा करता हुआ देदीप्यमान होता है वही भाईका भाईपन है ऐसा विद्वानोंने कहा है ।।१६३।। इतना कहकर राम पृथ्वीतलका स्पर्श करनेवाले शिरसे भावपूर्वक पिताके चरणोंमें प्रणाम कर लक्ष्मणके साथ उनके पाससे चले गये ॥१६४। इसी बीचमें यद्यपि राजा दशरथ मूर्छाको प्राप्त हो गये तो भी किसीको इसका पता नहीं चला क्योंकि वे जिस खम्भासे टिककर बैठे हुए थे मूर्छा के समय भी पुतलेके समान उसी खम्भासे टिके बैठे रहे ॥१६५।। राम शीघ्र ही धनुष उठाकर माताके पास गये और प्रणाम कर पूछने लगे कि मैं अन्य पृथ्वी अर्थात् देशान्तरको जाता हूँ ॥१६६।। रामकी बात सुनकर माताको मूर्छा आ गयी सो मानो दुःखका ज्ञान रोककर उसने सखीका कार्य किया। तदनन्तर क्षणभरके बाद जब मज दर हई तथा चैतन्य प्राप्त हआ तब आँखोंमें आँस भरकर माता अपराजिता ( कौसल्या ) बोली कि हाय वत्स ! तू कहाँ जा रहा है ? हे उत्तम चेष्टाके धारक पुत्र! तू मुझे शोकरूपी महासागरमें डालकर क्यों छोड़ रहा है ? ॥१६७-१६८॥ हे पुत्र! तू बड़ा दुर्लभ है, सैकड़ों मनोरथोंके बाद मैंने तुझे पाया है। जिस प्रकार शाखाका आलम्बन प्रारोह अर्थात् पाया होता है उसी प्रकार माताका आलम्बन पुत्र होता है ॥१६९।। इस प्रकार हृदयमें चुभनेवाला विलाप करती हुई माताको प्रणाम कर मातृभक्ति में तत्पर रहनेवाले रामने कहा कि माता! तुम विषादको प्राप्त मत होओ। मैं दक्षिण दिशामें योग्य स्थान देखकर तुम्हें ले जाऊँगा। इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।।१७०-१७१।। "पिताने, केकयी माताको वरदान देनेके कारण पृथ्वी भरतके लिए दे दी है' यह समाचार निश्चित ही आपके कर्णमूल तक आ गया होगा ॥१७२।। अब यह पृथिवी जहाँ समाप्त होती है उसके अन्तमें किसी महाअटवीमें, विन्ध्याचलमें, मलयपर्वतपर अथवा समुद्र के निकट किसी अन्य देशमें हे माता! अपना स्थान बनाऊंगा ॥१७३।। सूर्यके समान जबतक मैं इस देशके समीप ही रहूँगा तबतक भरतरूपी चन्द्रमाकी आज्ञा ऐश्वयंसे सम्पन्न नहीं हो सकेगी॥१७४।। तदनन्तर जो अत्यन्त दुःखी थी और जिसके नेत्र स्नेहसे कातर हो उठे थे ऐसी माता १. कौशल्या, रामजननी। २. कर्णयोर्मूलमिति कर्णजाहम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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