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________________ पद्मपुराणे अनेन वारिणाऽमुस्मिन्देशेऽयं विषमोऽनिलः । महारोगकरो यातः क्षयं शासितविष्टपः ॥१९॥ कुतोऽयमीदृशो वायुरिति पृष्टेन भाषितम् । मुनिना मरतायैवं तदा कौतुकयोगिने ॥१०॥ गजाह्वान्नगरादेत्य विन्ध्यो नामा महाधनः । अयोध्यां सार्थवाहेशः खरोष्ट्रमहिषादिभिः ॥१०॥ मासानेकादशामुष्यां त्वन्नगर्यामसौ स्थितः । तस्यैकमहिषस्तीव्ररोगमारेण पीडितः ॥१०२॥ पुरमध्ये महादुःखं कृत्वा कालं व्रणान्वितः । अकामनिर्जरायोगादेवभूयमशिश्रियत् ॥१०३।। जातो वायुकुमारोऽसावश्वकेतुर्महाबलः । वारवावर्त्त इति ख्यातो वायुदेवमहेश्वरः ॥१०॥ श्रेयस्करपुरस्वामी रसातलगतो महान् । असुरो भासुरः क्रूरो मनोयातक्रियासहः ॥१०५॥ अज्ञासीत्सावधिज्ञानः प्राप्तपूर्वपराभवम् । सोऽहं महिषकोऽभूवं प्राप्तोऽयोध्यां तदा व्रणी ॥१०६॥ क्षुत्तृष्णापरिदिग्धाङ्गो महारोगनिपीडितः । रथ्याकर्दमनिर्मग्नस्ताडितो जनसंपदा ॥१०७॥ कृत्वा मे मस्तके पादं तदाऽयासीजनोऽखिलः । पतितस्य विचेष्टस्य निर्दयो विड्मलाञ्चितम् ॥१०८॥ अचिरान्निग्रहं घोरं तस्य चेन्न करोम्यहम् । अनर्थकं सुरत्वं मे तदेवं जायते महत् ॥१०९॥ इति ध्वात्वा पुरेऽमुष्मिन् सदेशे क्रोधपूरितः । प्रावत यदसौ वायुं नानारोगसमावहम् ॥१०॥ सोऽयं नीतो विशल्याया वारिणा प्रलयं क्षणात् । भवन्ति हि बलीयांसो बलिनामपि विष्टपे ॥१११॥ यथा सत्वहितेनेदं मरताय निवेदितम् । भरतेनापि मे तद्वन्मया ते पद्म वेदितम् ।।११२॥ इसलिए उसका स्नानजल महागणोंसे सहित है ॥९८। इस देश में जिसने सब लोगोंपर शासन जमा रखा था तथा जो महारोग उत्पन्न करनेवाली थी ऐसी विषम वाय इस जलसे क्षयको प्र हो गयी है ।।९९।। 'यह वायु ऐसी क्यों हो गयी ?' इस प्रकार पूछनेपर उस समय मुनिराजने कोतूहलको धारण करनेवाले भरतके लिए इस प्रकार कहा कि ॥१०॥ विन्ध्या नामका एक महा धनवान् व्यापारी गधे, ऊँट तथा भैंसे आदि जानवर लदाकर गजपुर नगरसे आया और तुम्हारी उस अयोध्यानगरीमें ग्यारह माह तक रहा। अनेक वर्षों से सहित उसका एक भैंसा तीव्र रोगके भारसे पीड़ित हो नगरके बीच मरा और अकाम निर्जराके योगसे देव हुआ ॥१०१-१०३।। वह अश्वचिह्नसे चिह्नित महाबलवान् वायुकुमार जातिका देव हुआ। वाय्वावर्त उसका नाम था, वह वायुकुमार देवोंका स्वामी था, श्रेयस्करपुर नगरका स्वामी, रसातलमें निवास करनेवाला देदीप्यमान, क्रूर और इच्छानुसार क्रियाओंको करनेवाला वह बहुत बड़ा भवनवासी देव था ॥१०४-१०५।। अवधिज्ञानसे सहित होनेके कारण उसने पूर्वभवमें प्राप्त हुए पराभवको जान लिया। उसे विदित हो गया कि मैं पहले भैंसा था और अयोध्यामें आकर रहा था। उस समय मेरे शरीरपर अनेक घाव थे। भूख-प्यास आदिसे मेरा शरीर लिप्त था, अनेक रोगोंसे पीड़ित हुआ मैं मागंकी कीचड़में पड़ा था, लोग मुझे पीटते थे। उस समय मैं गोबर आदि मलसे व्याप्त हुआ निश्चेष्ट पड़ा था और सब लोग मेरे मस्तकपर पैर रखकर जाते थे ॥१०६-१०८। अब यदि मैं शीघ्र ही उसका भयंकर निग्रह नहीं करता हूँ-बदला नहीं चकाता है तो मेरा यह इस प्रकारका बड़प्पनयुक्त देवपर्याय पाना व्यर्थ है ॥१०९॥ इस प्रकार विचारकर उसने क्रोधसे पूरित हो उस देशमें नाना रोगोंको उत्पन्न करनेवाली वायु चलायी ॥११०॥ यह वही देव विशल्याके स्नानजलके द्वारा क्षण-भरमें विनाशको प्राप्त कराया गया है सो ठोक ही है क्योंकि लोकमें बलवानोंके लिए भी उनसे अधिक बलवान् होते हैं ।।१११॥ चन्द्रप्रतिम विद्याधर, रामसे कहता है कि यह कथा सत्त्वहित नामा मुनिने राजा भरतसे जिस प्रकार कही और भरतने जिस प्रकार मुझसे कही उसी १. सन्नगर्यां म. । २. वाह्यावर्त म. । ३. भीतो म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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