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________________ षष्टितम पर्व ३८१ अन्धीभूतो दशास्यस्य सुतेन जनकात्मजः । विमुक्तविषधूमौधैः वेष्टितो नागसायकैः ।।१०२॥ तैरसौ व्याप्तसर्वाङ्गो विस्फुरद्भोगमासुरैः । चन्दनमसंकाशः पपात वसुधातले ॥१०३॥ एवमिन्द्रजितेनापि कृता किष्किन्धभूभृत: । अवस्थाध्वान्तनागास्त्रद्वयव्यापारकारिणा ॥१०४।। ततो विभीषणो विद्वान् विद्यास्त्ररणवस्तुनि । कृत्वा करपुटं मूनि बभाषे पद्मलक्ष्मणौ ॥१०५॥ पद्म पद्म महावाहो वीर लक्ष्मण लक्ष्मण । एताः पश्य दिशच्छन्नाः शरैरिन्द्रजितेरितैः ॥१०६॥ वियत्तलं धरित्री च तस्य बाणेनिरन्तरैः । उत्पातभूतनागाभैरातेनेऽत्यन्तदःखदैः ।।१०७॥ कृतौ सुग्रीववैदेही निरस्त्रौ नागसायकैः । बद्धौ निपातितौ भूमौ मयजासुतनिःसृतैः ।।१०८॥ उदारे विजिते देव श्रीभामण्डलपण्डिते । वीरे सुग्रीवराजे च बहुविद्याधराधिपे ॥१०९।। संघातमृत्युमस्माकमासन्नं विद्धि राघव । एतौ हि नायकावग्रावस्मरपक्षस्य केवलौ ॥११०॥ एतामनायकीभूतां विद्याधरवरूथिनीम् । पलायनोद्यतां पश्य समाश्रित्य दिशो दश ।।१११।। आदित्यश्रवणेनासौ पश्य मारुतनन्दनः । विजित्य सुमहायुद्धे कराभ्यां बद्धविग्रहः ॥११२॥ शरजर्जरितच्छत्रकेतुकार्मुककङ्कटः । गृहीतः प्रसभं वीरः प्लवङ्गध्वजपुगवः ॥११३॥ यावत्सग्रीवमाचक्रौ पतितौ धरणीतले । न संभावयते क्षिप्रं रावणी रणकोविदः ॥११॥ तावदेतौ स्वयं गत्वा निश्चेटावानयाम्यहम् । त्वं साधारय निर्नाथामिमां खेचरवाहिनीम् ।।११५॥ यावदेवमसौ पमं लक्ष्मणं चाभिमाषते । सुतारातनयस्तावद गत्वा स्वैरमलक्षितः ॥११६॥ जब भामण्डल उस तामसबाणसे अन्धा हो रहा था तब मेघवाहनने उसे विषरूपी धूमका समूह छोड़नेवाले नागबाणोंसे वेष्टित कर लिया ॥१०२।। उठते हुए फनोंसे सुशोभित उन नागोंसे जिसका समस्त शरीर व्याप्त था और इसलिए जो चन्दन वृक्षके समान जान पड़ता था ऐसा भामण्डल पृथिवीपर गिर पड़ा ॥१०३।। इसी प्रकार तामस और नागपाश इन दो अस्त्रोंको चलाने वाले इन्द्रजित्ने भी सुग्रीवको दशा की अर्थात् उसे तामसास्त्रसे अन्धा कर नागपाशसे बाँध लिया ॥१०४॥ । तदनन्तर विद्यामय शस्त्रोंसे युद्ध करने में कुशल विभीषणने हाथ जोड़ मस्तकसे लगा राम-लक्ष्मणसे कहा कि हे महाबाहो ! राम ! राम ! हे वीर ! लक्ष्मण ! लक्ष्मण ! देखो, ये दिशाएँ इन्द्रजितके द्वारा छोडे हए बाणोंसे आच्छादित हो रही हैं ॥१०५-१०६॥ उत्पातकारी नागोंके समान आभावाले, अत्यन्त दुःखदायी उसके निरन्तर बाणोंसे आकाश और पृथिवी व्याप्त हो रही है ।।१०७|| मन्दोदरीके पुत्रोंने सुग्रीव और भामण्डलको अस्त्ररहित कर दिया है, तथा अपने द्वारा छोड़े हुए नाग बाणोंसे उन्हें बांधकर पृथिवीपर गिरा दिया है ॥१०८।। हे देव ! अतिशय चतुर भामण्डल और अनेक विद्याधरोंके राजा वीर सुग्रीवके पराजित होनेपर हे राघव ! समझ लीजिए कि हम लोगोंकी सामूहिक मृत्यु निकटवर्ती है, क्योंकि ये दोनों ही हमारे पक्षके प्रमुख नायक हैं ॥१०९-११०।। इधर देखो, यह विद्याधरोंकी सेना नायकसे रहित होनेके कारण दशों दिशाओंमें भागनेके लिए उद्यत हो रही है ।।११।। उधर देखो, कुम्भकर्णने महायुद्ध में हनुमान्को जीतकर अपने हाथोंसे उसे कैद कर रखा है ॥११२।। जिसका छत्र, ध्वज, धनुष और कवच बाणोंसे जर्जर कर दिया गया है, ऐसा यह वीर हनुमान् बलात् कैद किया गया है ॥११३॥ रणविशारद रावणका पुत्र, जबतक पृथिवीपर पड़े हुए सुग्रीव और भामण्डलके समीप शीघ्रतासे नहीं पहुँचता है तबतक निश्चेष्ट पड़े हुए इन दोनोंको मैं स्वयं जाकर ले आता हूँ, तुम नायक-रहित इस विद्याधर सेनाको आश्रय दो ॥११४-११५।। इस तरह जबतक विभीषण राम और लक्ष्मणसे कहता है १. म पुस्तके त्वेवं पाठ: ‘सर्वाङ्गे विस्फुरद्भोगभासुरैश्चन्दनद्रुमः । यथा तथायं तैर्युक्तः पपात वसुधातले ॥' २. निरस्तो म. । ३. मन्दोदरीपुत्र । ४. देवे म. । ५. भामण्डलो । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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