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________________ पद्मपुराणं संतुष्टोऽङ्गगतं ताभ्यो वस्त्ररत्नादिकं ददौ । श्रुत्वा स्मेराननां सीतां सिद्धं कार्य विचिन्तयन् ॥२८॥ विधातं महिमानं च किंचिदादिशदुत्सुकः । सुधापूरमिव प्राप्तः समुल्लासधरे हृदि ॥२९॥ स्वनाथवचनात् साध्वी सर्वान्तःपुरसंयता । गता मन्दोदरी शीघ्रं यत्रासी जनकात्मजा ॥३०॥ विकचास्यद्यतिं सीतां दृष्ट्वा मन्दोदरी चिरात् । जगौ बाले त्वयाऽस्माकं परमोऽनुग्रहः कृतः ॥३१॥ अधुना मज लोकेशं रावणं शोकवर्जिता । सुराणां श्रीरिवाधीशं लब्धनिःशेषसंपदम् ॥३२॥ इत्युक्ता कुपितावोचद्यदीदं भवतीरितम् । पद्मः खेचरि जानाति म्रियते ते पतिध्रुवम् ॥३३॥ वार्ता समागता भर्तरिति तोषमुपागता । अकार्ष वदनं स्मेरं भजन्ती परमां तिम् ॥३४॥ इति ता वचनं श्रुत्वा राक्षसेशस्य योषितः । ऊचुः क्षुद्भववातेन लपत्येषेति सस्मिता ॥३५॥ ततः श्रेणिक चैदेही नितान्तं तुङ्गया गिरा । परमं विस्मयं प्राप्ता जगादेवं समुत्सुका ॥३६॥ गताया व्यसनं घोरमब्धिद्वीपे महाभये । कोऽयं संनिहितः साधुबन्धुभूतोऽतिवत्सलः ॥३७॥ ततो नभस्वतः सूनुरेवमर्थितदर्शनः । अभिप्रायमिमं चक्रे साधुतायुक्तमानसः ॥३८॥ परार्थ यः पुरस्कृत्य पुनः स्वं विनिगृहति । सोऽतिभीरुतयात्यन्तं जायते निकृतो नरः ॥३९॥ परमापदि सीदन्तं जनं 'संधारयन्ति ये । अनुकम्पनशीलानां तेषां जन्म सुनिर्मलम् ॥४०॥ हानिः पुरुषकारस्य न चात्मनि निदर्शिते । प्रकाश्ये गुरुतां याति जगति श्रीर्यशस्विनी ॥४१॥ वृद्धिंगत किया ॥२७॥ रावणने सन्तुष्ट होकर उन स्त्रियोंके लिए अपने शरीरपर स्थित वस्त्र तथा रत्न आदिक दिये और सीताको प्रसन्नमुखो सुन अपना कार्य सिद्ध हुआ समझा ॥२८॥ उसके हृदयमें इतना उल्लास हुआ मानो अमृतके पूरको हो प्राप्त हुआ हो। उसी समय उसने उत्सूक हो अनिर्वचनीय उत्सव करनेका आदेश दिया ॥२९।। अपने पतिके कहनेसे पतिव्रता मन्दोदरी भी समस्त अन्तःपुरके साथ शीघ्र ही वहाँ गयी जहाँ सीता विद्यमान थी ॥३०॥ बहुत दिन बाद आज जिसके मुखकमलकी कान्ति विकसित हो रही थी ऐसी सीताको देख मन्दोदरीने कहा कि हे बाले ! आज तूने हम सबपर बड़ा अनुग्रह किया है ॥३१॥ जिस प्रकार समस्त सम्पदाओंसे युक्त देवेन्द्रकी लक्ष्मी सेवा करती है उसी प्रकार तू भी अब शोक रहित हो जगत्पति रावणकी सेवा कर ।।३२।। मन्दोदरीके इस प्रकार कहनेपर सीताने कुपित होकर कहा कि हे विद्याधरि! यदि तेरा यह कहना राम जान पावें तो तेरा पति निश्चित ही मारा जावे ॥३३॥ आज मेरे भर्ताका समाचार आया है इसलिए सन्तोषको प्राप्त हो परम धैर्यको प्राप्त हुई हूँ और इसीलिए मैंने मुखको मन्दहास्यसे युक्त किया है ॥३४॥ सीताके यह वचन सुनकर स्त्रियाँ कहने लगी कि क्षुधाके कारण इसे वायुरोग हो गया है इसीलिए यह हंसती हुई ऐसा बक रही है ॥३५॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक! इसके बाद परम आश्चर्यको प्राप्त हुई सीताने अत्यन्त उत्सूक हो अतिशय उच्च वाणीमें इस प्रकार कहा कि जो समद्रके भीतर विद्यमान महाभयदायक इस द्वीपमें कष्टको प्राप्त हुई है ऐसा मेरा कौन स्नेही उत्तम बन्धु यहाँ निकट आया है ।।३६-३७॥ तदनन्तर जिसके दर्शनको प्रार्थना की गयी थी तथा जिसका मन सज्जनतासे युक्त था ऐसे हनुमान्ने इस प्रकार विचार किया कि ॥३८।। जो मनुष्य दूसरेका कार्य आगे कर अर्थात् पहलेसे स्वीकृत कर फिर अपने आपको छिपाता है वह अत्यन्त भीरु होनेके कारण नीच मनुष्य होता है ॥३९।। और जो आपत्तिमें पड़े हुए दूसरे मनुष्यको आलम्बन देते हैं उन दयालु मनुष्योंका जन्म अत्यन्त निर्मल होता है ॥४०॥ इसके सिवाय अपने आपको प्रकट कर देने में पुरुषत्वकी कुछ हानि भी तो नहीं मालूम होती अपितु प्रकट कर देनेपर यशस्विनी लक्ष्मी संसारमें गौरवको प्राप्त होती है ॥४१॥ तदनन्तर हनुमान् भामण्डलको नाईं हजारों उत्तम स्त्रियोंके बीच बैठी हुई सीताके समीप १. साधारयन्ति म., ख.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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