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________________ त्रिपञ्चाशत्तम पर्व भ्रमरप्रावृतैर्गुच्छैः सुजातैबंद्धशेखरम् । फलैरानतशाखाग्रं किंचित् पवनकम्पितम् ॥१५॥ पद्मादिच्छादितैः स्वच्छैः सरोमिः सदलंकृतम् । भासुरं कल्पवल्लीभिः संगताभिर्महातरुम् ॥१६॥ गीर्वाणकुरुदेशाभं प्रसूनरजसावृतम् । नन्दनस्य दधत्साम्यमनेकाद्भुतसंकुलम् ॥१७॥ ततो लीलां वहन् रम्यां वायू राजीवलोचनः । विवेश परमोद्यानं सीतादर्शनकाङ्क्षया ॥१०॥ प्रजिघाय च सर्वासु दिक्षु चक्षुरतित्वरम् । विविधद्रुमदेशेषु गहनेषु दलादिमिः ॥१९॥ दृष्ट्वा च दूरतः सीतामन्यदर्शनवर्जितः । अचिन्तयदसौ सैषा रामदेवस्य सुन्दरी ॥२०॥ स्निग्धज्वलनसंकाशा वाष्पपूरितलोचना । करविन्यस्तवक्त्रेन्दुर्मक्तकेशी कृशोदरी ॥२१॥ अहो रूपमिदं लोके जिताशेषमनोहरम् । परमां ख्यातिमायातं सत्यवस्तुनिबन्धनम् ॥२२॥ रहिता शतपत्रेण नास्या लक्ष्मीः समा भवेत् । दुःखार्णवं गताप्येषा सदृशी नान्ययोषिता ।।२३।। निपत्य शिखरादरस्य मृत्युमुपैम्यहम् । विरहे पद्मनाभस्य धारयामि न जीवितम् ॥२४॥ कृतप्रचिन्तनामेवं वैदेही पवनात्मजः । निःशब्दपादसंपातः प्राप्तो रूपान्तरं दधत् ॥२५॥ ततोऽङ्गलीयकं तस्या विससर्जाकवाससि । सहसा सा तमालोक्य स्मेराऽभूत्पुलकाचिता ॥२६॥ तस्यामेवेमवस्थायां गत्वा नार्यस्त्वरान्विताः । तोषादवर्धयन् दिष्ट्या रावणं तत्परायणम् ॥२७॥ नयी-नयी लताओंके समूहसे व्याप्त था, उत्तम स्त्रियोंके हाथोंके समान सुन्दर लाल-लाल पल्लवोंसे युक्त था, भ्रमरोंसे आच्छादित सुन्दर गुच्छोंके द्वारा जिसपर सेहरा बंध रहा था, जहाँ फलोंके भारसे शाखाओंके अग्रभाग नम्रीभत हो रहे थे, जो वायके द्वारा कुछ-कुछ हिल रहा था, कमल आदिसे आच्छादित स्वच्छ सरोवरोंसे जो अलंकृत था, जो बड़े-बड़े वृक्षोंसे लिपटी हुई कल्पलताओंसे देदीप्यमान था, जो देवकुरु प्रदेशके समान जान पड़ता था, फूलोंकी परागसे आवृत था, अनेक आश्चर्योसे व्याप्त था तथा नन्दनवनको समानता धारण कर रहा था ॥१४-१७|| तदनन्तर मनोहर लीलाको धारण करता हुआ कमललोचन हनुमान् सीताके दर्शनकी इच्छासे उस उत्कृष्ट उद्यानमें प्रविष्ट हुआ ॥१८॥ वहाँ जाकर उसने शीघ्र ही समस्त दिशाओंमें तथा पल्लवों आदिसे सघन नाना वृक्षोंके समूहमें दृष्टि डाली ॥१९॥ वहाँ दूरसे ही सीताको देखकर वह अन्य वस्तुओंके दर्शनसे रहित हो गया अर्थात् उसी ओर टकटकी लगाकर देखता रहा। तदनन्तर उसने विचार किया कि वह रामदेवकी सुन्दरी यही है ।।२०।। यह स्निग्ध अग्निके समान है, इसके नेत्र आँसुओंसे भर रहे हैं, वह हथेलीपर मुखरूपी चन्द्रमाको रखे हुई है, केश इसके खुले हुए हैं तथा उदर इसका अत्यन्त कृश है ।।२१|| उसे देखकर हनुमान् विचार करने लगा कि अहो! लोकमें इसका रूप समस्त मनोहर पदार्थोंको पराजित करनेवाला है, परम ख्यातिको प्राप्त है तथा सत्य वस्तुओंका कारण है ।।२२।। कमलसे रहित लक्ष्मी अर्थात् कमलसे निकली हुई साक्षात् लक्ष्मी इसकी बराबरी नहीं कर सकती। अहो ! यह दुःखरूपी सागरमें निमग्न है तो भी अन्य स्त्रियोंके समान नहीं है ॥२३॥ वह इस प्रकार विचार कर रही थी कि मैं इस पर्वतके शिखरसे गिरकर मृत्युको प्राप्त कर सकती हूँ परन्तु रामके विरहमें जीवन नहीं धारण करूंगी ।।२४॥ इस प्रकार विचार करती हुई सीताके पास, हनुमान् चुपचाप पैर रखता हुआ दूसरा रूप धारण कर गया ॥२५॥ तदनन्तर हनुमान्ने सीताकी गोदके वस्त्रपर अंगूठी छोड़ी उसे देखकर वह सहसा हँस पड़ी तथा रोमांचोंसे यक्त हो गयी ॥२६॥ सीताकी ऐसी अवस्था होनेपर वहाँ जो स्त्रियाँ थीं उन्होंने शीघ्रतासे जाकर सीताका समाचार जानने में तत्पर रहनेवाले रावणको शुभ समाचार सुना हर्षसे १. हरिता ख. । २. तस्यामेवावस्थायां म.. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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