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________________ ३२० पद्मपुराणे तया नानायुधाटोपैः सर्ववेगसमीरितैः । आच्छाद्यत महातेजाः शुचिसूर्य इवाम्बुदैः ॥४२॥ विक्रान्तः स च शस्त्रौघमनिर्विण्णोऽन्तरस्थितम् । व्यपोहत निजैः शस्त्रैर्मायाविधिविशारदः ॥४३॥ शराः शरैरलुप्यन्त तोमराद्याः स्वजातिभिः । शनयः शक्तिभिर्नुन्ना समोल्का दूरमुद्ययुः ॥४४॥ चक्रक्रकचसंवर्तकनकाटोपपिञ्जरम् । बभूव भीषणं व्योम विद्युद्भिरिव संकुलम् ॥४५॥ तं लङ्कासुन्दरी भूयो रूपेणपलब्धसंनिमा। धीरा स्वभावतो राजन् लक्ष्मीः कमललोचना ॥४६॥ ज्ञानध्यानहरैः कान्तैर्दुर्द्धरैर्गुणसंनतैः । लावण्याहतसौन्दयर्मनोऽन्तर्भेदकोविदः ॥४७॥ नेत्रचारविनिमुक्तर्विव्यधे स्मरसायकैः । तथेतरधनुर्मुक्तः शरैराकर्णसंहतैः ॥१८॥ विस्मये जगतः शक्ता सौभाग्यगुणगर्विता । तस्यालसक्रियस्यैवं प्रविष्टा हृदयोदरम् ॥४९॥ शरशक्तिशतघ्नीभिर्न तथा समपीब्यत । यथा मदनबाणौधर्मर्मदारणकारिभिः ॥५०॥ इयं मनोहराकारा ललितैर्विशिखैरपि । सबाह्याभ्यन्तरं हन्ति मामित्येवमचिन्तयत् ॥५१॥ दरमस्मिन् मृधे मृत्युः पूर्यमाणस्य सायकैः । अनया विप्रयुक्तस्य जीवितं न सुरालये ॥५२॥ चिन्तयत्येवमेतस्मिन् साप्यनङ्गेन चोदिता । त्रिकूटसुन्दरी कन्या करुणासक्तमानसा ॥५३।। विकस्वरमनोदेहं तं पद्मच्छदलोचनम् । अबालेन्दुमखं बालं किरीटन्यस्तवानरम् ॥५४॥ मूर्तियुकमिवानङ्गं सुन्दरं वायुनन्दनम् । हन्तं समुद्यतां शक्ति संजहार स्वरावती ॥५५॥ चक्र, शतघ्नी, मुसल तथा शिलाएँ उस प्रकार बरसायीं जिस प्रकार कि उत्पातके समय उच्च मेघावली नाना प्रकारके जल बरसाती है ।।४०-४१|| उसके पूर्ण वेगसे छोड़े हुए नाना प्रकारके शस्त्रसमूहसे महातेजस्वी हनुमान् उस तरह आच्छादित हो गया जिस प्रकार कि मेघोंसे आषाढ़का सूर्य आच्छादित हो जाता है ॥४२॥ इतना सब होनेपर भी खेदसे रहित, पराक्रमी एवं मायाके विस्तार में निपुण हनुमान्ने अपने शस्त्रोंके द्वारा उसके शस्त्रसमूहको बीचमें ही दूर कर दिया ।।४३।। उसके बाण बाणो ये, तोमर आदि तोमर आदिके द्वारा, तथा शक्तियाँ शक्तियोंके द्वारा खण्डित होकर उल्काओंके समान दूर जा गिरीं ॥४४॥ चक्र, क्रकच, संवर्तक तथा कनक आदिके विस्तारसे पीतवर्ण आकाश ऐसा भयंकर हो गया मानो बिजलियोंसे ही व्याप्त हो गया हो ॥४५।। गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! तदनन्तर रूपसे अनुपम, स्वभावसे धीर, कमललोचना, लक्ष्मीके समान लंकासुन्दरी, नेत्ररूपी धनुषसे छोड़े हुए कामके बाणों अर्थात् कटाक्षोंसे हनुमान्को उधर पृथक् भेद रहो थी और इधर अन्य धनुषसे छोड़े तथा कान तक खींचे हुए बाणोंसे पृथक् भेद रही थी । लंकासुन्दरीके वे कामबाण, ज्ञान-ध्यानके हरनेवाले थे, मनोहर थे, दुर्धर थे, गुणोंसे युक्त थे, लावण्यके द्वारा सौन्दर्यको हरनेवाले थे, और मनके भीतर भेदनेमें निपुण थे ॥४६-४८|| इस तरह जगत्को आश्चर्य करने में समर्थ तथा सौभाग्यरूपी गुणसे गवित लंकासुन्दरी हनुमान्के हृदयके भीतर प्रविष्ट हो गयी ।।४९|| वह हनुमान्, बाण, शक्ति तथा शतघ्नी आदि शस्त्रोंसे उस प्रकार पीड़ित नहीं हुआ था जिस प्रकार कि मर्मको विदारण करनेवाले कामके बाणोंसे पीड़ित हुआ था ।।५०|| हनुमान् विचार करने लगा कि यह मनोहराकारको धारक, अपनो ललित चेष्टारूपी बाणोंसे मुझे भीतर और बाहर दोनों हो स्थानोंपर घायल कर रही १॥ इस यद्धमें बाणोंसे भरकर मर जाना अच्छा है किन्तु इसके बिना स्वर्गमें भी जीवन बिताना अच्छा नहीं है ॥५२।। इधर इस प्रकार हनुमान् विचार कर रहा था उधर जिसका मन दयामे आसक्त था तथा जो त्रिकूटाचलकी अद्वितीय सुन्दरी थी ऐसी कन्या लंकासुन्दरीने कामसे प्रेरित हो, देदीप्यमान मन तथा शरीरके धारक, कमलदललोचन, तरुण चन्द्रवदन, मुकुटपर वानरका चिह्न धारण करनेवाले, नवयौवनसे युक्त एवं मूर्तिधारी कामदेवके समान सुन्दर १. आषाढमाससूर्य इव । २. राजलक्ष्मी: म. । ३. त्वरावता म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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