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________________ ३०६ पपुराणे मन्त्री जाम्बूनदोऽवोचत्ततो वाक्यं परं हितम् । वत्स वरस मरुत्पुत्र स्वमेकोऽस्माकमाश्रयः ॥९८॥ अप्रमत्तेन गन्तव्यं लक रावणपालिताम् । न विरोधः क्वचित् कार्यः कदाचित् केनचित्सह ॥१९॥ एवमस्त्विति संभाष्य तं संप्रस्थितमुनतम् । विलोक्य परमां प्रीतिं पद्मनाभः समागमत् ॥१०॥ पुनः पुनः समाहूय मारुतिं चारुलक्षणम् । सर्वादरं जगादेदं स्फीता राजीवलोचनः ।।१०१।। मद्वाक्यादुच्यतां सीता स्वद्वियोगात् स राघवः । अधुना विन्दते साध्वि य मनोनिवृतिं क्वचित् ॥१०२॥ अत्यन्तं तदहं मन्ये हतं पौरुषमात्मनः । प्रतिरोधं प्रपन्नास वर्तमानेऽपि यन्मयि ॥१०३।। वेद्मि निर्मलशीलाढ्या यथा त्वं मदनुव्रता । जीवितं वाञ्छसि त्यक्तुं मद्वियोगेन दुःखिता ॥१०॥ अलं तथापि सद्वक्त्रे दुःसमाधानमृत्युना । धार्यन्तां मैथिलि प्राणा न जीवं त्यक्तुमर्हसि ॥१०५।। दुर्लभः संगमो भूयः पूजितः सर्ववस्तुषु । ततोऽपि दुर्लभो धर्मो जिनेन्द्रवदनोद्गतः ।।१०६॥ दुर्लभादप्यलं तस्मान्मरणं सुसमाहितम् । तस्मिन्नसति जन्मेदं तुषनिःसारमीक्षितम् ।।१०७॥ इदं च प्रत्ययोत्पादि प्रियायै मम जीवतः । सततं संस्तुतं देवमङ्गुलीयकमुत्तमम् ॥१०॥ वायुपुत्र द्रुतं गत्वा सीतायास्तं महाप्रभम् । ममापि प्रत्ययकरं चूडामणिमिहानय ॥१०॥ यथाज्ञापयसीत्युक्त्वा रत्नवानरमौलिभृत् । कृताञ्जलिपुटो नवा सौमित्रिं च समाञ्जलिः ।।११।। बहिर्विनिर्ययौ हृष्टः पूर्यमाणो विभूतिमिः । क्षोभयन् तेजसा सर्व सुग्रीवभवनाजिरम् ॥११॥ चन्द्रमाके समान निर्मल सीताका मुखकमल शीघ्र ही देखोगे ।।९७।। तदनन्तर सुग्रीवके मन्त्री जाम्बूनदने परम हितकारी वचन कहे कि हे वत्स हनुमान् ! हम लोगोंका आधार एक तू ही है ॥९८॥ अतः तुझे सावधान होकर रावणके द्वारा पालित लंका जाना चाहिए और कहीं कभी किसीके साथ विरोध नहीं करना चाहिए ॥९९॥ ‘एवमस्तु'-'ऐसा ही हो' यह कहकर उदार हनुमान् लंकाकी ओर प्रस्थान करनेके लिए उद्यत हुआ सो उसे देख राम परम प्रीतिको प्राप्त हुए ॥१००॥ विदलित कमललोचन रामने सुन्दर लक्षणोंके धारक हनुमान्को बार-बार बुलाकर बड़े आदरके साथ यह कहा कि तुम मेरी ओरसे सीतासे कहना कि हे साध्वि ! इस समय राम तुम्हारे वियोगसे किसी भी वस्तुमें मानसिक शान्तिको प्राप्त नहीं हो रहे हैं-उनका मन किसी भी पदार्थमें नहीं लगता है ॥१०१-१०२।। मेरे रहते हुए जो तुम अन्यत्र प्रतिरोधरुकावटको प्राप्त हो रही हो सो इसे मैं अपने पौरुषका अत्यधिक घात समझता हूँ ॥१०३।। तुम जिस प्रकार निर्मल शीलवतसे सहित हो तथा एक ही व्रत धारण करती हो उससे समझता हूँ कि तुम मेरे वियोगसे दुःखी होकर यद्यपि जीवन छोड़ना चाहती होगी पर हे सुमुखि ! तो भी खोटे परिणामोंसे मरना व्यर्थ है । हे मैथिलि ! प्राण धारण करो। जीवनका त्याग करना उचित नहीं है ।।१०४-१०५।। सर्व वस्तुओंका पुन: उत्तम समागम प्राप्त होना दुर्लभ है और उससे भी दुर्लभ अरहन्त भगवान्के मुखारविन्दसे प्रकट हुआ धर्म है ॥१०६॥ यद्यपि उक्त धर्म दुर्लभ है तो भी समाधि-मरण उसकी अपेक्षा दुर्लभ है क्योंकि समाधि मरणके बिना यह जीवन तुषके समान साररहित देखा गया है ॥१०७॥ और प्रियाके लिए मेरे जीवित रहनेका प्रत्यय-विश्वास उत्पन्न हो जाये इसलिए यह सदाको परिचित उत्तम अँगूठो उसे दे देना ॥१०८|| तथा हे पवनपुत्र! तुम शीघ्र ही जाकर मुझे विश्वास उत्पन्न करनेवाला सीताका महाकान्तिमान् चूड़ामणि यहां ले आना ॥१०९॥ 'जैसी आज्ञा हो' यह कहकर रत्नमय वानरसे चिह्नित मुकुटको धारण करनेवाला हनुमान् राम तथा लक्ष्मणको हाथ जोड़ नमस्कार कर बाहर निकल आया। उस समय वह अत्यन्त हर्षित था, विभूतियोंसे युक्त था और अपने तेजसे सुग्रीवके भवन सम्बन्धी समस्त आंगनको १. चारुतामरसेक्षणम् ज.) २. कमलनेत्रः । स्फीत्या राजीवलोचनः म.। ३. जीवितुं म. 1 ४. मैथिली म. । ५. कृताञ्जलि: म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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