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________________ एकोनपञ्चाशत्तम पर्व ३०५ धनुर्लम्मोदये'लब्धः सहस्रामररक्षिते । सीतास्वयंवरेऽस्माभिः श्रुतस्तव पराक्रमः ।।८४॥ पिता दशरथो यस्य यस्य भामण्डलः सुहृत् । भ्राता यस्य च सौमित्रिः स त्वं राम जगत्पतिः ।।८५॥ अहो शक्तिरहोरूपमेष नारायणः स्वयम् । समुद्रावर्तचापेशो यस्याज्ञाकरणे रतः ॥८६॥ अहो धैर्यमहो त्यागो यत्पितुः पालयन् वचः । महाप्रतिभयाकारं प्रविष्टो दण्डकं वनम् ॥८७॥ एतन्न कुरुते बन्धुस्तुष्टश्च त्रिदशाधिपः । अहो त्वया नाथ कतं यदस्माकमतिप्रियम् ॥८॥ सुग्रीवरूपसंपन्नं हत्वा संयति साहसम् । यत्कपिध्वजवंशस्य कलङ्को दूरमुज्झितः ॥८९॥ विद्याबलविधिज्ञर्यद्यस्य मायामयं वपुः । अस्माभिरपि नो सह्यं दुर्जयं च विशेषतः ॥१०॥ तेन सुग्रीवरूपेण ग्रहीतुं प्लावर्ग बलम् । दर्शनादेव युष्माकं तद्रूपं तस्य निःसृतम् ।।९१॥ कतु प्रत्युपकारं यो न शक्तोऽत्युपकारिणः । सुलमा मावशुद्धिं से तस्मै न कुरुते कुतः ॥१२॥ का तस्य बुद्धिायेषु भवेदेकमपि क्षणम् । यः कृतस्योपकारस्य विशेषं नावबुध्यते ॥१३॥ श्वपाकादपि पापीयान् लुब्धकादपि निघृणः । असंभाष्यः सतां नित्यं योऽकृतज्ञो नराधमः ॥९॥ स्वशरीरमपि त्यक्त्वा सत्यं वयमनन्यगाः । सर्वे समुद्यताः कर्तुमुपकारं तव प्रभो ॥१५॥ गत्वा प्रबोधयिष्यामि त्रिकूटाधिपतिं बुधम् । तव पत्नी महाबाहो त्वरावानानयाम्यहम् ॥१६॥ सीताया वदनाम्भोजं प्रसन्नेन्दुमिवोदितम् । संदेहेन विनिर्मुक्तं शीघ्रं पश्यसि राघव ॥९७॥ तथा गुणरूपी रत्नोंको आकर अर्थात् खान अथवा समुद्र हैं। आपके शुक्ल यशसे यह संसार अलंकृत हो रहा है ।।८३।। हे नाथ ! वज्रावर्त धनुषको प्राप्तिसे जिसका अभ्युदय हुआ था तथा एक हजार देव जिसकी रक्षा करते थे ऐसे सीताके स्वयंवरमें आपको जो पराक्रम प्राप्त हुआ था वह सब हमने सुना है ॥८४॥ दशरथ जिनका पिता है, भामण्डल जिनका मित्र है, और लक्ष्मण जिनका भाई है, ऐसे आप जगत्के स्वामी राजा राम हैं ॥८५॥ अहो ! आपकी शक्ति अद्भत है, अहो! आपका रूप आश्चर्यकारी है कि सागरावतं धनुषका स्वामी नारायण स्वयं ही जिनकी आज्ञा पालन करने में तत्पर है ॥८६॥ अहो! आपका धैर्य आश्चर्यकारी है, अहो! आपका त्याग अद्भुत है जो पिताके वचनका पालन करते हुए आप महाभय उत्पन्न करनेवाले दण्डक वनमें प्रविष्ट हुए हैं ।।८७|| हे नाथ! आपने हम लोगोंका जो उपकार किया है वह न तो भाई ही कर सकता है और न सन्तुष्ट हुआ इन्द्र ही ॥८८॥ आपने सुग्रीवका रूप धारण करनेवाले साहसगतिको युद्धमें मारकर वानरवंशका कलंक दूर किया है ॥८९॥ विद्याबलकी विधिके जाननेवाले हम लोग भी जिसके मायामय शरीरको सहन नहीं कर सकते थे तथा हम लोगोंके लिए भी जिसका जीतना कठिन था उस सुग्रीव रूपधारी साहसगतिने वानर वंशी सेनाको प्राप्त करनेके लिए कितना प्रयत्न किया परन्तु आपके दर्शनमात्रसे उसका वह रूप निकल गया ।।९०-९१।। जो अत्यन्त उपकारी मनुष्यका प्रत्युपकार करनेके लिए समर्थ नहीं है वह उसके विषयमें भावशुद्धि क्यों नहीं करता अर्थात् उसके प्रति अपने परिणाम निर्मल क्यों नहीं करता जबकि यह भावशुद्धि बिलकुल ही सुलभ है ॥९२।। जो मनुष्य, किये हुए उपकार की विशेषताको नहीं जानता है उसकी एक अज्ञके लिए भी न्यायमें बुद्धि कैसे हो सकती है ? ॥९३|| जो नीच मनुष्य अकृतज्ञ है वह चाण्डालसे भी अधिक पापी है, शिकारीसे भी अधिक निर्दय है और सत्पुरुषोंसे निरन्तर वार्तालाप करनेके लिए भी योग्य नहीं है ।।९४॥ हे प्रभो! हम सब किसी अन्य की शरणमें न जाकर आपकी ही शरणमें आये हैं और सचमुच ही अपना शरीर छोड़कर भी आपका उपकार करनेके लिए उद्यत हैं ॥९५॥ हे महाबाहो ! मैं जाकर रावणको समझाऊँगा। वह बुद्धिमान् है अतः अवश्य समझेगा और मैं शीघ्र ही आपकी पत्नीको वापस ले आता हूँ ॥९६॥ हे राघव ! इसमें सन्देह नहीं कि तुम उदित हुए १. धनुर्लाभावये लब्धे म. । २-३९ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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