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________________ सप्तचत्वारिंशत्तमं पवे २७७ अब्रवीलब्धसंज्ञश्च नाथ हस्तमुपागतः । जीवन्नेव कथं चौरः पुरं मम पुनर्गतः ॥१०९॥ नूनं न भवितव्यं मे दुःखस्यान्तेन राघव । भवन्तमपि संप्राप्य किंतु कष्टमतः परम् ॥११०॥ ततः पद्मप्रभोऽवोचद्भवतोयुध्यमानयोः । विशेषो न मया ज्ञातो न हतस्तेन ते समः ॥१११॥ अज्ञानदोषतो नाशं मानैषीत्वैव जातुचित् । सुहृदं जैनवाक्येन जनितं प्रियसंगमम् ॥११२॥ अथाहूतः पुनः प्राप्तः सुग्रीवप्रतिमो वली । संरम्भवह्निना दीप्तः पद्मेनाभिमुखीकृतः ॥११३॥ अद्विणेव स रामेण क्षोभितः सागरोपमः । निस्त्रिशग्राहसंघातसंचारात्यन्तसंकुलः ।।११४॥ लक्ष्मणेनैव सुग्रीवः परिष्वज्य दृढं धृतः । स्त्रीवैरतः समीपं मा शत्रोः कोपेन गादिति ॥११५॥ ततः ससार पद्माभः सुग्रीवामं समाह्वयन् । ज्वलन् संग्रामसंप्राप्तिजनितेनोरुतेजसा ॥११६॥ अथ पद्मं समालोक्य समापृच्छय च साधकम् । वैताली निःसृता विद्या नारीवोद्धतचेष्टिता ॥१७॥ सुग्रीवा कृतिनिर्मुक्तं वानराङ्कविवर्जितम् । सहसा साहसगतिमिन्द्रनीलनगोपमम् ॥११॥ स्वभावमागतं दृष्ट्वा निःकान्तमिव कञ्चुकात् । शाखामृगध्वजाः सर्वे संक्षुभ्यैकत्वमाश्रिताः ॥११९॥ नानायुद्धाश्च संक्रुद्धा बलिनस्तमयूयुधन् । सोऽयं सोऽयमतिस्वानं कुर्वाणाः पश्यतेति च ।।१२०॥ तेन तेजस्विना सैन्यं तद्विषामुरुशक्तिना । पुरस्कृतं दिशो भेजे यथा तूलं नमस्वता ।।१२१॥ ऐसे यथार्थ सुग्रीवको उसके मित्र जन घेरकर अपने शिविरमें ले आये ॥१०८॥ जब सचेत हुआ तब रामसे बोला कि नाथ ! हाथमें आया चोर जीवित हो पुनः मेरे नगरमें कैसे चला गया ॥१०९॥ जान पड़ता है कि राघव ! अब मेरे दुःखका अन्त नहीं होगा और फिर आपको प्राप्त कर भी। इससे बढ़कर कष्ट और क्या होगा ? ॥११०।। तत्पश्चात् रामने कहा कि मैं युद्ध करते हुए तुम दोनोंकी विशेषता नहीं जान सका था इसीलिए मैंने तम्हारी सदशता करनेवाले स को नहीं मारा है ॥१११॥ जिनागमका उच्चारण कर तू मेरा प्रिय मित्र हुआ है सो कहीं अज्ञानरूपी दोषसे तुझे ही नष्ट नहीं कर दूं इस भयसे मैं चुप रहा ॥११२।। अथानन्तर उस कृत्रिम सुग्रीवको फिरसे ललकारा सो वह बलवान् क्रोधाग्निसे दीप्त होता हुआ पुनः आया तथा रामने उसका सामना किया ॥११३॥ जिस प्रकार पर्वतके द्वारा समुद्र क्षोभको प्राप्त होता है उसी प्रकार क्रूर योद्धारूपी मगरमच्छोंके संचारसे अतिशय भरा हुआ वह समुद्र तुल्य कृत्रिम सुग्रीव रामके द्वारा क्षोभको प्राप्त हुआ।११४।। इधर लक्ष्मणने वास्तविक सुग्रीवका दृढ़ आलिंगन कर उसे इस अभिप्रायसे रोक लिया कि कहीं यह स्त्रीके वैरके कारण क्रोधसे शत्रुके पास न पहुंच जावे ॥११५॥ तदनन्तर युद्ध की प्राप्तिसे उत्पन्न विशाल तेजसे देदीप्यमान राम, कृत्रिम सुग्रीवको ललकारते हुए आगे बढ़े ॥११६॥ अथानन्तर रामको आया देख सिद्ध करनेवालेसे पूछकर वैताली विद्या उसके शरीरसे इस प्रकार निकल गयी कि जिस प्रकार उन्हत चेष्टाको धारण करनेवाली स्त्री निकल जाती है ।।११७।। तत्पश्चात् जो सुग्रीवकी आकृलिसे रहित था, जिसका वानर चिह्न दूर हो चुका, जो इन्द्रनील मणिके समान जान पड़ता था, और जो आवरणसे निकले हुएके समान अपने स्वाभाविक रूपमें स्थित था ऐसे साहसगतिको देखकर सब वानरवंशी क्षुभित हो एकरूपताको प्राप्त हो गये ॥११८-११९।। नाना शस्त्रोंते सहित, क्रोध भरे बलवान् वानर 'यह वही है यह वही है देखो देखो' आदि शब्द करते हुए उससे युद्ध करने लगे ॥१२०।। सो विशाल शक्तिके धारक उस तेजस्वीने शत्रुओंकी उस सेनाको जब आगे कर खदेड़ा तब वह दिशाओंको उस १. भदन्त- ख. । २. कितु म. । ३. नूनं म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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