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________________ २७४ पपुराणे संदिहाना निजे नाथे वयमप्यतिसाम्यतः । सुतारावचनादेनं पुरस्कृत्य व्यवस्थिताः ॥६॥ अक्षौहिण्यस्ततः सप्त प्रभुमेकमुपाश्रिताः । इतरं चापि तावन्न्यः संशयस्य वशं गताः॥६॥ पुरस्य दक्षिणे भागे सुग्रीवः कृत्रिमः कृतः । उत्तरे तस्य सुग्रीवः स्थापितश्च यथाविधि ॥७॥ अकरोच्चन्द्ररश्मिश्च प्रतिज्ञामिति संशये । बालिपुत्रो ततः कुर्वन् सर्वतः प्रतिपालनम् ॥७॥ सुतारामवनद्वारं यो व्रजेत्कश्चिदस्य सः । प्रौढेन्दीवरशोमस्य वध्यः खड्गस्य मे ध्रुवम् ॥७२॥ ततः कपिध्वजावेवं स्थापितौ तावुमावपि । अपश्यन्तो सुतारास्यं निमग्नौ व्यसनार्णवे ॥७३॥ ततोऽयं सत्यसुग्रीवो दयिताविरहाकुलः । बहुशः शोकहानार्थमगच्छत् खरदूषणम् ॥७॥ पुनश्च मारुतेः पाश्र्वमब्रवीच पुनः पुनः । परित्रायस्व दुःखात प्रसादं कुरु बान्धव ॥७५॥ मदीयं रूपमासाद्य मायया कोऽपि पापधीः । कुरुते मे परां बाधां स गत्वा मार्यतां द्वतम् ।।७६॥ सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा तदवस्थस्य शोकिनः । अञ्जनातनयः क्रोधाद्वाडवाग्निसमोऽभवत् ॥७॥ विमानं परमच्छायमप्रतीघातसंज्ञितम् । नानालंकारभूयिष्ठं निदशावाससंनिभम् ।।७८॥ उत्साहं परमं बिभ्रदारुह्य सचिवैर्वृतः । किष्किन्धनगरं प्राप स्वर्ग सुकृतभागिव ॥७९॥ श्रुत्वा प्राप्त हनूमन्तमसको विगतज्वरः । आरुह्य द्विरदं प्रीतः सुग्रीव इव निर्ययौ ॥८॥ तं कपिध्वजमालोक्य परं सादृश्यमागतम् । विस्मितो वायुपुत्रोऽपि पतितः संशयार्णवे ।।८१॥ अचिन्तयच्च सुव्यक्तं सुग्रीवो द्वाविमौ कथम् । एतयोः कतरं हन्मि यद्विशेषो न लभ्यते ॥८॥ पास गया ॥६७। हम लोग भी अत्यन्त सदृशताके कारण अपने स्वामीके विषयमें सन्देहशील हैं परन्तु सुताराके कहनेसे इसीको आगे कर स्थित हैं ॥६८॥ संशयके वशमें पड़ी सात अक्षौहिणी सेनाएँ एक सुग्रीवके आश्रय गयों और उतनी ही दूसरे सुग्रीवके अधीन हुई ॥६९।। नगरके दक्षिण भागमें कृत्रिम सुग्रीव रखा गया और वास्तविक सुग्रीव नगरके उत्तर भागमें विधिपूर्वक स्थापित किया गया ॥७०॥ सब ओरसे रक्षा करनेवाले बालिके पुत्र चन्द्ररश्मिने संशय उपस्थित होनेपर इस प्रकारकी प्रतिज्ञा की कि इन दोनोंमें जो भी सुताराके भवनके द्वारपर जावेगा वह तरुण इन्दीवर-नीलकमलके समान सुशोभित मेरी खड्गके द्वारा अवश्य ही बध्य होगा-मेरी तलवारके द्वारा मारा जायेगा ||७१-७२॥ तदनन्तर इस प्रकार रखे हुए दोनों सुग्रीव सुताराका मुख न देखते हुए व्यसनरूपी सागरमें निमग्न हो गये ॥७३॥ ___अथानन्तर स्त्रीके विरहसे आकुल सत्य सुग्रीव, शोक दूर करनेके लिए अनेक बार खरदूषणके पास आया ॥७४॥ फिर हनुमान्के पास जाकर उसने बार-बार कहा कि हे बान्धव ! मैं दुःखसे पीडित हूँ अतः मेरी रक्षा करो, प्रसन्न होओ ॥७५।। कोई पापबुद्धि विद्याधर मायासे मेरा रूप रखकर मझे अत्यन्त बाधा पहँचा रहा है सो जाकर उसे शीघ्र हो मारो ॥७६।। उस प्रकारको अवस्थामें पड़े शोकयुक्त सुग्रीवके वचन सुनकर हनुमान् क्रोधसे बडवानलके समान हो गया ॥७७।। वह परम उत्साहको धारण करता हुआ मन्त्रियोंके साथ, अत्यन्त कान्तिमान्, नाना अलंकारोंसे प्रचुर, स्वर्गतुल्य अप्रतीघात नामक विमानमें सवार हो उस तरह किष्किन्ध नगर पहुँचा जिस तरह कि पुण्यात्मा मनुष्य स्वर्गमें पहुंचता है ।।७८-७९॥ हनुमान्को आया सुन वह शीघ्र ही हाथीपर सवार हो प्रसन्नताके साथ सुग्रोवकी तरह नगरसे बाहर निकला ॥८०॥ अत्यन्त सादृश्यको प्राप्त हुए उस कपिध्वजको देखकर हनुमान् भी विस्मित हो संशयरूपी सागरमें पड़ गया ॥८१॥ वह विचार करने लगा स्पष्ट हो ये दोनों सुग्रीव हैं जबतक कि विशेषता नहीं जान १. प्रतिज्ञातमसंशये ख.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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