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________________ षट्चत्वारिंशत्तमं पवं कुर्वन्तीव' लतालीलां कोमलैः पल्लवैः करैः । घूर्णिता मन्दवातेन फलपुष्पमनोहरा ॥ १५५ ॥ सारङ्गदयिताभिश्च प्रलम्बाम्बुदशोभिनः । समस्तर्तुकृतच्छायाः सेव्यन्ते धनपादपाः ||१५६ ॥ विभूति तस्य तां वाप्यः सहस्रच्छदनाननाः । आलोकन्त इवातृप्ता असितोत्पललोचनैः ॥ १५७॥ गहनान् कोकिलालापान् नृत्यन्त्यो सन्दवायुना । दीर्घिका विहसन्तीव राजहंसकदम्बकैः ||१५८॥ प्रमदाभिख्य मुद्यानं सर्वभोगोत्सवावहम् । अत्र किं बहुनोक्तेन स्याद्वरं नन्दनादपि ॥ १५९ ॥ अशोकमालिनी नाम पत्रपद्मविराजिता । वापी कनकसोपाना विचित्राकारगोपुरा ॥ १६०॥ मनोहरैर्गृहैर्भाति गवाक्षाद्युपशोभितैः । सल्लतालिङ्गितप्रान्तैर्निर्झरैश्च ससीकरैः ॥ १६१ ॥ तत्राशोकतरुच्छन्ने स्थापिता शोकधारिणी । देशे शक्रालयाद् भ्रष्टा स्वयं श्रीरिव जानकी ॥ १६२ ॥ तस्मिन् दशाननोक्ताभिः स्त्रीभिरन्तरवर्जितम् । सीता प्रसाद्यते वखगन्धालंकारपाणिभिः || १६३॥ दिव्यैः समर्त्तनैर्गीतैर्वाक्यैश्चामृतहारिभिः । अनुनेतुं न सा शक्या संपदा चामरामया ॥ १६४ ॥ उपर्युपरि संरक्को दूत विद्याधराधिपः । प्राहिणोद्धि स्मरोदारदावज्वालाकुलीकृतः ॥१६५॥ "दूति सीतां व्रज ब्रूहि दशास्यमनुरक्तकम् । न सांप्रतमवज्ञातुं प्रसीदेत्यादिभाषते ॥ १६६॥ गतागताच सा तस्मै वदतीति वितेजसे । देव साहारमुत्सृज्य स्थिता स्वां वृणुते कथम् ॥ १६७ ॥ ર Jain Education International उद्यान में वृक्षोंकी सब जातियाँ विद्यमान हैं जो कि फूलोंसे आच्छादित हैं और मदोन्मत्त भ्रमर जिनपर गुंजार करते हैं || १५४ || वहाँ मन्द मन्द वायुसे हिलती और फलों तथा फलोंसे मनोहर लता अपने कोमल पल्लवोंसे ऐसी जान पड़ती है मानो हाथ चलाती हुई नृत्य ही कर रही हो ॥ १५५ ॥ | वहाँ नीचे लपकते हुए मेघोंके समान सुशोभित तथा समस्त ऋतुओंमें छाया उत्पन्न करनेवाले सघन वृक्षोंकी हरिणियाँ सदा सेवा करती हैं—उनके नीचे विश्राम लेती हैं ॥१५६॥ कमलरूपी मुखोंसे सहित वहाँकी वापिकाएं नील कमलरूपी नेत्रोंके द्वारा उस वनकी उस विभूति मानो अतृप्त होकर ही सदा देखती रहती हैं ॥१५७॥ जहां मन्द मन्द वायुसे नृत्य करती हुईं वापिकाएँ राजहंस पक्षियोंके समूहसे ऐसी जान पड़ती हैं मानो कोकिलाओंके आलापसे युक्त सघन वनों की हँसी ही कर रही हों || १५८ || इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या ? इतना ही बहुत है कि समस्त भोगों और उत्सवोंको धारण करनेवाला वह प्रमद नामक उद्यान नन्दन वनसे भी अधिक सुन्दर है || १५९|| उस प्रमद वनमें अशोक मालिनी नामकी वापी है जो कि कमल पत्रोंसे सुशोभित है, स्वर्णमय सोपानोंसे युक्त है, और विचित्र आकारवाले गोपुरसे अलंकृत है || १६०|| इसके सिवाय वह प्रमद वन झरोखे आदिसे अलंकृत तथा उत्तमोत्तम लताओंसे आलिंगित मनोहर गृहों और जल कणोंसे युक्त निर्झरोंसे सुशोभित है ॥ १६१ ॥ | उस प्रमद वनके अशोक वृक्षसे आच्छादित एक देश में बैठी शोकवती सोता ऐसी जान पड़ती थी मानो स्वर्गसे गिरी साक्षात् लक्ष्मी हो ॥ १६२ ॥ वहाँ रावणकी आज्ञानुसार वस्त्र, गन्ध तथा अलंकारोंको हाथोंमें धारण करनेवाली स्त्रियाँ निरन्तर सीताको प्रसन्न करने की चेष्टा करती थीं ॥ १६३ ॥ किन्तु नृत्य सहित दिव्य संगीतों, अमृतके समान मनोहर वचनों और देवतुल्य सम्पदाके द्वारा सीता अनुकूल नहीं की जा सकी || १६४ ॥ इतनेपर भी कामरूपी दावानलकी प्रचण्ड ज्वालाओंसे व्याकुल हुआ रागी रावण एकके बाद एक दूती भेजता रहता था ।। १६५ ॥ । वह कहता था कि हे दूति ! जाओ और सीतासे कहो कि अब अनुरागसे भरे रावणकी उपेक्षा करना उचित नहीं है अतः प्रसन्न होओ || १६६॥ दूतो सीताके पास जाती और वापस आकर तेजरहित रावणसे कहती कि हे देव ! वह तो आहार छोड़कर बैठी है तुम्हें १. कुर्वन्ती च., ख. । २. सेवन्ते म । ३. दूति म. । २६३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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