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________________ २६२ पद्मपुराणे समन्तकुसुमं तावन्नानातरुलताकुलम् । प्रमदाख्यं वनं सीता नीता नन्दनसुन्दरम् ॥१४१।। स्थितं फुल्लनगस्योद यद् दृष्टिबन्धनम् । उन्मादो मनसस्तुङ्गो देवानामपि जायते ।।१४२॥ गिरिः सप्तभिरुद्यानैवेष्टितः स्वायतैः स च । रराज भद्रशालाद्यः सूर्यावर्त इवोज्ज्वलः ॥१४३॥ एकदेशानहं तस्य विविधाद्भुतसंकुलान् । नामतः संप्रवक्ष्यामि तव राजन निबोध्यताम् ॥१४॥ प्रकीर्णकं जनानन्दं सुखसेव्यं समुच्चयम् । चारणप्रियसंज्ञं च निबोध प्रमदं तथा ॥१४५॥ प्रकीर्णकं महीपृष्ठे जनानन्दं ततः परम् । यत्रानिषिद्धसंचारो जनः क्रीडति नागरः' ॥१४६॥ तृतीयेऽलं वने रम्ये मृदुपादपसंकुले । घनवृन्दप्रतीकाशे सरिद्वापीमनोहरे ॥१४७।। दशव्याभायता वृक्षा रविमार्गोपरोधिनः । केतकीयूथिकोपेतास्ताम्बूलीकृतसंगमाः ॥१४॥ निरुपद्रवसञ्चारे तत्रोद्यानसमुच्चये । विलसन्ति विलासिन्यः क्वचिद्देशे च संनराः ।।१४९॥ चारणपियमुद्यानं मनोज्ञं पापनाशनम् । स्वाध्यायनिरता यत्र श्रमणा व्योमचारिणः ॥१५०॥ तस्योपरि समारुह्य ययुपृष्ठमनिन्दितम् । सुखारोहणसोपानं दृश्यते प्रमदाभिधम् ।।१५१॥ स्नानक्रीडोचिता रम्या वाप्योऽस्मिन् पद्मशोभिता । प्रपाः सभाश्च विद्यन्ते रचितानेकभूमयः ।।१५२॥ नारिङ्गमातुलिङ्गायैः फलैर्यत्र निरन्तराः । खजूं रैर्नालिकेरैश्च तालैरन्यैश्च वेष्टिताः ॥१५३॥ तत्र च प्रमदोद्याने सर्वा एवागजातयः । कुसुमस्तक्कैश्छन्ना गीयन्ते मत्त १५४॥ अथानन्तर जिसमें सब ओरसे फूल फूल रहे थे, जो नाना प्रकारके वृक्ष और लताओंसे युक्त था तथा जो नन्दन वनके समान सुन्दर था ऐसे प्रमद नामक वनमें सीता ले जायी गयी ॥१४१।। फूलोंके पर्वतके ऊपर स्थिति तथा दृष्टिको बांधनेवाले जिस प्रमदवनको देखकर देवोंके मनमें भी अत्यधिक उन्माद उत्पन्न हो जाता है ।।१४२॥ अत्यन्त लम्बे-लम्बे सात उद्यानोंसे घिरा हुआ वह पर्वत ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो भद्रशाल आदि वनोंसे घिरा अतिशय उज्ज्वल सुमेरु पर्वत ही हो ॥१४३।। गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! अनेक आश्चर्योसे भरे हुए उसके एक देशरूप जो सघन वन हैं हम उनके नाम कहते हैं सो सुनो ।।१४४।। उस पर्वतपर जो सात वन हैं उनके नाम इस प्रकार हैं-१ प्रकीर्णक, २ जनानन्द, ३ सुखसेव्य, ४ समुच्चय, ५ चारणप्रिय, ६ निबोध और ७ प्रमद ॥१४५। इनमें से प्रकीर्णक नामका वन पृथ्वीतल है पर उसके आगे जनानन्द नामका वह वन है जिसमें कि वे ही क्रीड़ा करते हैं जिनका कि आना-जाना निषिद्ध नहीं है अन्य लोग नहीं ।।१४६॥ उसके ऊपर चलकर तीसरा सुखसेव्य नामका वन है जो कोमल वृक्षोंसे व्याप्त है, मेघसमूहके समान है, तथा नदियों और वापिकाओंसे मनोहर है। उस वनमें सूर्यके मार्गको रोकनेवाले, केतकी और जूहीसे सहित तथा पानकी लताओंसे लिपटे दशवेमां प्रमाण लम्बे-लम्बे वृक्ष हैं ।।१४.७-१४८। उसके ऊपर उपद्रव रहित गमनागमनसे युक्त समुच्चय नामका चौथा वन है जिसमें कहीं हाव-भावको धारण करनेवाली स्त्रियां सुशोभित हैं तो कहीं उत्तमोत्तम मनुष्य सुशोभित हो रहे हैं ।।१४९।। उसके ऊपर चारणप्रिय नामक पांचवां पापापहारी मनोहर वन है जिसमें चारणऋद्धिधारी मुनिराज स्वाध्यायमें तत्पर रहते हैं ॥१५०॥ [ उसके ऊपर छठवां निबोध नामका का वन है जो ज्ञानका निवास है] और उसके आगे चढ़कर प्रमद नामका सातवां वन है जो घोड़ेके पृष्ठके समान उत्तम प्रथा सुखसे चढ़नेके योग्य सीढ़ियोंसे युक्त दिखलाई देता है ।।१५१।। इस प्रमद वनमें स्नानकोड़ाके योग्य, कमलोंसे सुशोभित मनोहर वापिकाएं हैं, स्थान-स्थानपर पानीयशालाएँ और अनेक खण्डोंसे युक्त सभागृह विद्यमान हैं ॥१५२॥ जहाँ खजूर, नारियल, ताल तथा अन्य वृक्षोंसे घिरे एवं फलोंसे लदे नारिंग और बीजपूर आदिके वृक्ष हैं ।।१५३।। उस प्रमद नामक १. नागरः म.। २. ययुः पृष्ठ-म. । ३. मातुलिङ्गायैः म, । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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