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________________ चत्वारिंशत्तमं पर्व १९७ मृदङ्गवंशमुरजसंगीतोत्तमनिस्वनाः । झाझ रैरानकैः शजभेरीभिश्च महारवाः ॥३०॥ सतताब्धनिःशेषरम्यवस्तुमहोत्सवाः । चिरेजुत्तत्र रामीया जिनप्रासादपङ्क्तयः ॥३१॥ रेजिरे प्रतिमास्तत्र सर्वलोकनमस्कृताः । पञ्चवर्णा जिनेन्द्राणां सर्वलक्षणभूषिताः ॥३२॥ अन्यदाथ महीपालरामो राजीवलोचनः । लक्ष्मीधरसुवाचेदं क्रियते किमतः परम् ॥३३॥ इह संप्रेरितः कालः सुखेन परमे गिरौ । जिनरीत्यसमुत्थाना स्थापिता कीर्ति रुज्ज्वला ॥३४॥ अनेन भूभृता श्रेष्ठरुपचारशतैहताः । अत्रैव 'यदि तिष्ठामस्तदा कार्य विनश्यति ॥३५॥ इह तावदलं भोगैरिति चिन्तयतोऽपि मे । न मुशति क्षणमपि प्रवरा भोगसन्ततिः ॥३६॥ इह यत् क्रियते कर्म तत्परत्रोपभुज्यते । पुराकृतानां पुज्यानां इह संपद्यते फलम् ॥३७॥ अस्माकमत्र वसतां बिभ्रतां सुखसंपदम् । अमं ये दिवसा यान्ति न तेषां पुनरागमः ॥३८।। नदीनां चण्डवेगानामायुषो दिवसस्य च । यौवनस्य च सौमित्रे यदगतं गतमेव तत् ॥३९।। नद्याः कर्णरवायास्तु परतो रोमहर्षणम् । श्रयते दण्डकारण्यं दुर्गम क्षितिचारिभिः ॥४०॥ 'मारती न विशत्याज्ञा तस्मिन् जनपदोज्दिाते । तत्रार्णवतट श्रिवा विदध्मः क्वचिदालयम् ॥४।। यदाशपयसीत्युक्त कुमारेण ससंभ्रमम् । सुरेन्द्र सदृशं भोगं भुक्त्वा ते निर्गतात्रयः ।।४२।। अनुगत्य सुदूरं तौ बलोपेतः सुरश्मः । कृच्छ्राग्निवर्तितस्ताभ्यां शोकी पुरमुपागतः ।।४३।। घण्टाओंके शब्दसे व्याप्त थे, जिनमें मृदंग, बांसुरी और मुरजका संगीतमय उत्तम शब्द फैल रहा . था, जो झांझों, नगाड़ों, शंखों और भेरियोंके शब्दसे अत्यन्त शब्दायमान थे और जिनमें सदा समस्त सुन्दर वस्तुओंके द्वारा महोत्सव होते रहते थे ऐसे रामके बनवाये जिनमन्दिरोंकी पंक्तियाँ उस पर्वतपर जहाँ-तहाँ सुशोभित हो रही थीं ।।२८-३१।। उन मन्दिरोंमें सब लोगोंके द्वारा नमस्कृत तथा सब प्रकारके लक्षणोंसे युक्त पंचवर्णको जिनप्रतिमाएं सुशोभित थीं ॥३२॥ अथानन्तर एक दिन कमललोचन राजा रामचन्द्रने लक्ष्मणसे कहा कि अब आगे क्या करना है ? ॥३३।। इस उत्तम पर्वतपर समय सुखसे व्यतीत किया तथा जिनमन्दिरोंके निर्माणसे उत्पन्न उज्ज्वल कीर्ति स्थापित की ॥३४॥ इस राजाको सैकड़ों प्रकारको उत्तमोत्तम सेवाओंके वशीभूत होकर यदि यहीं रहते हैं तो संकल्पित कार्य नष्ट होता है ॥३५॥ यद्यपि मैं सोचता हूँ कि मुझे इन भोगोंसे प्रयोजन नहीं है तो भी यह उत्तम भोगोंको सन्तति क्षण भरके लिए भी नहीं छोड़ती है ॥३६॥ . ___ जो कर्म इस लोकमें किया जाता है उसका उपभोग परलोकमें होता है और पूर्व भवमें किये हुए पुण्य कर्मोका फल इस भवमें प्राप्त होता है ॥३७।। यहां रहते तथा सुख-सम्पदाको धारण करते हुए हमारे जो ये दिन बीत रहे हैं उनका फिरसे आगमन नहीं हो सकता ॥३८॥ हे लक्ष्मण ! तीव्र वेगसे बहनेवाली नदियों, आयुके दिन और यौवनका जो अंश चला गया वह चला ही गया फिर लौटकर नहीं आता ॥३९|| कर्णरवा नदीके उस पार रोमांच उत्पन्न करनेवाला तथा भूमिगोचरियोंका जहाँ पहुँचना कठिन है ऐसा दण्डक वन सुना जाता है ।।४०॥ देशोंसे रहित उस वनमें भरतकी आज्ञाका प्रवेश नहीं है इसलिए वहां समुद्रका किनारा प्राप्त कर घर बनावेंगे ॥४१॥ 'जो आज्ञा हो' इस प्रकार लक्ष्मणके कहनेपर राम-लक्ष्मण और सीता तीनों ही इन्द्र सदृश भोग छोड़कर वहाँसे निकल गये ॥४२॥ वंशस्थविलपुरका राजा सुरप्रभ अपनी सेनाके साथ बहुत दूर तक उन्हें पहुंचानेके लिए गया । राम-लक्ष्मण उसे बड़ी कठिनाईसे लौटा सके। तदनन्तर शोकको धारण करता हुआ वह अपने नगरमें वापस आया ॥४३।। १. हृदि म. । २. प्रवरो म. । ३. भरत संबन्धिनी । ४. तटां च्छुत्वा म. (?) ! ५. भुक्त्वा म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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