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________________ १३८ पद्मपुराणे ततोऽसौ कृपयाऽऽकृष्टा सुमाया नाम यक्षिणी । जगाद विप्रं परमं त्वयेदं साहसं कृतम् ॥७२॥ अस्याः पुरः समासनां कथं त्वं भुवमागतः। आरक्षकैरलं घोरेननं नश्यति वीक्षितः ॥७३॥ अस्या द्वारत्रयं पुर्याः दुष्प्रवेशं सुरैरपि । अशून्यं सर्वदा वोरै रक्षकैः सुनियामकैः ॥७॥ सिंहवारणशार्दूलतुल्यवक्त्रमहोज्ज्वलैः । एभिर्विभीषिता मृत्यु मानुषा यान्त्यसंशयम् ॥७५॥ पूर्वद्वारमदो यत्तु तस्य पश्यसि यान् बहिः । प्रासादानन्तिकानेतान् बलाकाच्छादनच्छवीन् ॥७६॥ गणितोरणरम्येषु विविधध्वजराजिषु । अर्हतामिन्द्रवन्धानाममीषु 'प्रतियातनाः ॥७॥ सामायिकं पुरस्कृत्य तासां यः स्तवनं नरः । नमोऽर्ह सिद्धनिस्वानपूर्व पठति भावतः ॥७८॥ गुरूपदेशयुक्तोऽसौ सम्यग्दर्शनरक्षितः। विशतीन्द्रककुबद्वारं हन्यते त्वनमस्कृतिः ॥७९॥ अणुवतधरो यो ना गुणशीलविभूषितः । तं रामः परया प्रीत्या वाञ्छितेन समचति ॥८॥ ततस्तस्या वचः श्रुत्वा द्विजोऽलावमृतोपमम् । जगाम परमं हर्ष लब्ध्वोपायं धनागमे ॥८॥ नमस्कारं च कृत्वाऽस्या भूयो भूयस्तुति तथा । रोमाञ्चार्चितसर्वाङ्गः परमाद्भुतभावितः ॥८२॥ मुनेश्चारित्रशूरस्य गत्वासनं कृताञ्जलिः । प्रणम्य शिरसाऽपृच्छदणुव्रतधरक्रियाम् ॥८३॥ ततस्तेन समुद्दिष्टं धर्म सद्मनिवासिनाम् । स जग्राहानुयोगांश्च शुश्राव चतुरः सुधीः ॥८॥ धनलोमामिभूतस्य धर्म शुश्रूषतोऽस्य सः । ग्रहणे परमार्थस्य परिणाममुपागतः ॥८५॥ अवगम्य ततो धर्म द्विजोऽवोचत् सुमानसः । नाथ तेऽद्योपदेशेन चक्षुरुन्मीलितं मम ॥८६॥ तदनन्तर दयासे आकृष्ट हुई उस सुमाया नामकी यक्षीने ब्राह्मणसे कहा कि तूने यह बड़ा साहस किया है ॥७२॥ तू इस नगरीको समीपवर्ती भूमिमें कैसे आ गया ? यदि भयंकर पहरेदार तुझे देख लेते तो तू अवश्य ही नष्ट हो जाता ॥७३॥ इस नगरीके तीन द्वारोंमें तो देवोंको भी प्रवेश करना कठिन है क्योंकि वे सदा सिंह, हाथी और शार्दूलके समान मुखवाले तेजस्वी, वीर तथा कठोर नियन्त्रण रखनेवाले रक्षकोंसे अशून्य रहते हैं। इन रक्षकोंके द्वारा डरवाये हुए मनुष्य निःसन्देह मरणको प्राप्त हो जाते हैं ।।७४-७५।। इनके सिवाय जो वह पूर्व द्वार तथा उसके बाहर समीप ही बने हुए बगलाके पंखके समान कान्तिवाले सफेद-सफेद भवन तू देख रहा है वे मणिमय तोरणोंसे रमणीय तथा नाना ध्वजाओंकी पंक्तिसे सुशोभित जिन-मन्दिर हैं। उनमें इन्द्रोंके द्वारा वन्दनीय अरहन्त भगवान्की प्रतिमाएं हैं जो मनुष्य सामायिक कर तथा 'अहंत् सिद्धेभ्यो नमः' अर्थात् 'अरहन्त तथा सिद्धोंको नमस्कार हो' इस प्रकार कहता हुआ भाव पूर्वक उन प्रतिमाओंका स्तवन पढ़ता है तथा निर्ग्रन्थ गुरुका उपदेश पाकर सम्यग्दर्शन धारण करता है वही उस पूर्वद्वारमें प्रवेश करता है। इसके विपरीत जो मनुष्य प्रतिमाओंको नमस्कार नहीं करता है वह मारा जाता है ।।७६-७९।। जो मनुष्य अणुव्रतका धारी तथा गुण और शोलसे अलंकृत होता है, राम उसे बड़ी प्रसन्नतासे इच्छित वस्तु देकर सन्तुष्ट करते हैं ॥८॥ । तदनन्तर उसके अमृत तुल्य वचन सुनकर तथा धन प्राप्तिका उपाय प्राप्तकर वह ब्राह्मण परम हर्षको प्राप्त हुआ ||८|| उसका समस्त शरीर रोमांचोंसे सुशोभित हो गया तथा उसका हृदय अत्यन्त अद्भुत भावोंसे युक्त हो गया। वह उस स्त्रीको नमस्कार कर तथा बार-बार उसकी स्तुति कर चारित्र पालन करने में शूर-वीर मुनिराजके पास गया और अंजलि बाँध शिरसे प्रणाम कर उसने उनसे अणुव्रत धारण करनेवालोंको क्रिया पूछो ॥८२-८३ तदनन्तर उस चतुर बुद्धिमान ब्राह्मणने मुनिराजके द्वारा उपदिष्ट गृहस्थ धर्म अंगीकृत किया तथा अनुयोगोंका स्वरूप सुना ।।८४॥ पहले तो वह ब्राह्मण धनके लोभसे अभिभूत होकर धर्म श्रवण करना चाहता था पर अब वास्तव धर्म ग्रहण करनेके भावको प्राप्त हो गया ॥८५।। मुनिराजसे धर्मका स्वरूप जानकर जिसका हृदय १. प्रतिबिम्बाः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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