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________________ चतुस्त्रिशत्तमं पर्व १३१ शासनं यच्छतां नाथौ किं करोमि यथोचितम् । शिरसा पादुके किं वा वहे पावनपण्डिते ॥४॥ 'दिन्ध्योऽयं निधिभिः पूर्णो वरयोषिच्छतैस्तथा। भुजिष्यमिच्छतां देवौ मामतो निभृतं परम् ।।८५॥ इत्युक्त्वा प्रणतिं कुर्वन् पुनराति परां गतः । पपात विह्वलो भूमौ छिन्नमूलस्तरुर्यथा ॥८६।। कष्टावस्थां ततः प्राप्तं तमेवं राघवोऽवदत् । कृपालतापरिष्वक्तवीरकल्पमहातरुः ॥८॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ट मा भैषीर्वालिखिल्यं विन्धनम् । कृत्वाऽऽनय द्रुतं प्राप्य संमानं परमं सुधीः ।।८८॥ तस्यैवाभिमतो भूत्वा सचिवः सजनान्वितः । विहाय संगतिं म्लेच्छैर्विषयस्य हितोऽभवत् ॥८५।। एतत् चेत् कुरुपे सर्वमन्यथात्वविवर्जितम् । ततस्ते विद्यते शान्तिरयेव म्रियसेऽन्यथा ॥१०॥ एवं प्रमो करोमीति कृत्वा प्रणतिमादृतः । महारथसुतं गत्वा मुमोच विनयान्वितः ॥११॥ अभ्यङ्गोद्वर्त्य सुस्नातं भोजयित्वा स्वलं कृतम् । आरोप्य स्यन्दने नेतुमारेभे तं तदन्तिकम् ॥१२॥ स दध्यौ नीयमानः सन् विस्मयं परमं गतः । इतोऽपि गहनावस्था प्रायो मेऽद्य भविष्यति ॥१३॥ कायं म्लेच्छो महाशत्रः कुकर्मात्यन्तनिर्दयः । व चायमतिसंमानो न मन्येऽद्यासुधारणम् ॥१४॥ इति दीनभना गच्छन् सहसा पद्मलक्ष्मणी । दृष्टा परां तिं प्राप्तोऽवतीर्य सनमस्कृतिः ॥९५।। अब्रवीत् तौ युबा नाथावागतावतिसुन्दरौ । मम पुण्यानुमावेन मुक्तो येनास्मि बन्धनात् ॥९॥ गच्छ क्षियं निजं धाम लभस्वाभीष्टसंगमम् । तत्र नौ ज्ञास्यसीत्युक्त बालिखिल्यः सुधोगतः ॥१७॥ दृष्टिमात्रसे ही दीन कर दिया। मैं धन्य हूँ जिससे पुरुषोंमें उत्तम आप महानुभावोंके दर्शन किये ॥८२-८३।। हे नाथ ! आज्ञा दीजिए मैं क्या योग्य सेवा करूं ? क्या पवित्र करने में निपुण आपकी पादुकाएँ शिरपर धारण करूं? ॥८४॥ यह विन्ध्याचल निधियों तथा उत्तमोत्तम सैकड़ों स्त्रियोंसे परिपूर्ण है इसलिए हे देव ! मुझसे किसी अच्छे भारो राजस्वकी इच्छा प्रकट करो ॥८५|| इतना कहकर प्रणाम करता हुआ वह पुनः परम पीडाको प्राप्त हुआ और विह्वल हो कटे वृक्षके समान भूमिपर गिर पड़ा ।।८६॥ तदनन्तर जो वोरजनों के लिए दयारूपी लतासे आलिंगित कल्पवृक्षके समान थे ऐसे राम दुःखमय अवस्थाको प्राप्त हुए म्लेच्छ राजासे इस प्रकार बोले कि हे सुबुद्धि ! उठ-उठ, डर मत, बालिखिल्यको बन्धनरहित कर तथा उत्तम सम्मानको प्राप्त कराकर शीघ्र ही यहाँ ला ।।८७-८८।। उसोका इष्ट मन्त्री हो सज्जनोंकी संगति कर और म्लेच्छोंकी संगति छोड़, देशका हितकारी हो ।।८९।। यदि तू यह सब काम ठीक-ठीक करता है तो उससे तुझे शान्ति प्राप्त होगी अन्यथा आज ही मारा जायेगा ॥९०॥ 'हे प्रभो! ऐसा ही करता हूँ' इस प्रकार कहकर उसने बड़े आदरसे रामको प्रणाम किया और विनयके साथ जाकर महारथके पूत्र बालिखिल्यको छोड़ दिया ॥२१॥ तदनन्तर जिसे तेल-उबटन लगाकर अच्छी तरह स्नान कराया गया था और भोजन कराकर जिसे अलंकारोंसे अलंकृत किया गया था ऐसे बालिखिल्यको रथपर बैठाकर वह रामके पास ले जानेके लिए उद्यत हुआ ।।९२।। जो इस तरह आदरके साथ लाया जा रहा था ऐसा बालिखिल्य परम आश्चर्य को प्राप्त हुआ और मन ही मन सोचता जाता था कि प्राय: अब मेरी अवस्था इससे भी गहन होगी ।।१३।। कहाँ तो यह कुकर्म करनेवाला अत्यन्त निर्दय महावैरी म्लेच्छ ? और कहाँ यह भारी सम्मान ? जान पड़ता है कि आज प्राण नहीं बचेंगे ॥१४॥ इस प्रकार बालिखिल्य दीन चित्त होकर जा रहा था कि सहसा राम-लक्ष्मणको देखकर वह परम सन्तोषको प्राप्त हुआ। उसने रथसे उतरकर नमस्कार करते हुए कहा कि हे नाथ ! मेरे पुण्योदयसे अतिशय सुन्दर रूपको धारण करनेवाले आप दोनों महानुभाव पधारे हैं इसीलिए मैं बन्धनसे मुक्त हुआ हँ॥९५-९६॥ राम-लक्ष्मणने उससे कहा कि शीघ्र ही अपने घर जाओ और इष्टजनोंके साथ १. बन्ध्योऽयं ज., ब.। २. हितोऽभवत् (?) म.. ३. बालखिल्यं म.। ४. सुस्नानं म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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