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________________ ११६ पद्मपुराणे विनीतं धारयन् वेषमनुपादाय कार्मुकम् । प्रयातो स्यसंपन्नो लक्ष्मणः कम्पितक्षितिः ॥२३॥ दृष्ट्वा संरक्षकैः पृष्टः कतरस्य पुमान् भवान् । सोऽवोचद् भरतस्याहमेतो दूतस्य कर्मणा ॥२४॥ क्रमेणातीत्य शिविरं भूरि प्राप्तो नृपास्पदम् । अविशद्वेदितो द्वाःस्थै सदः सिंहोदरस्य सः ॥२१५॥ प्रस्पष्टमिति चोवाच मन्यमानस्तृणं नृपम् । ज्येष्ठभ्रातृवचोवाहं सिंहोदर 'निबोध माम् ॥२१६॥ आज्ञापयत्यसौ देवो भवन्तमिति सद्गुणः । यथा किल किमतेन विरोधेन विहेतुना ॥२१७।। ततः सिंहोदरोऽवादीन्मनः कर्कशमद्वहन् । दृत व्रतां विनीतेशमिति मद्वचनाद् भवान् ॥२१८।। यथा किलाविनीतानां कृत्यानां विनयाहृती। कुर्वन्ति स्वामिनो यत्नं विरोधः कोऽत्र दृश्यते ॥२१९॥ वज्रको दुरात्मायं माली नैकृतिकः परः । पिशुनः क्रोधनः शुद्रः सुहृन्निन्दापरायणः ॥२२०॥ आलस्योपहतो मूढो वायुग्रहगृहीतधीः । विनयाचार निर्मुक्तो दुर्विदग्धो दुरीहित: ॥२२॥ एतं मुञ्चन्त्वमी दोषा दमेन मरणेन वा । तमुपायं करोम्यस्य स्वैरमत्रास्यतां त्वया ॥२२२॥ ततो लक्ष्मोधरोऽवोचत् किमत्र प्रत्युरूत्तरैः । कुरुतेऽयं हितं यस्मात् क्षम्यतां सर्वमस्य तत् ॥२२३॥ इत्युक्तः प्रकटक्रोधः संधिदूरपराड । सिंहोदरोऽवदत्तारं वीक्ष्य सामन्तसंहतिम् ॥२२४॥ न केवलमसौ मानी हतारमा वज्रकर्णकः । तत्कार्यवाग्छया प्राप्तो भवानपि तथाविधः ॥२२५॥ पाषाणेनैव ते गात्रमिदं दृत विनिर्मितम् । न नाममोपदण्ययेति दुर्भृत्यः कोशलापतेः ।।२२६।। आज्ञा शिरोधार्य कर 'जैसी आपकी आज्ञा' यह कहकर तथा प्रणाम कर हर्षित होता हुआ चला। वह उस समय विनीत वेषको धारण कर रहा था, धनुष साथमें नहीं ले गया था, वेगसे सम्पन्न था और पृथ्वीको कपाता हुआ जा रहा था ।।२१२--२१३।। रक्षक पुरषोंने देखकर उससे पूछा कि आप किसके आदमी हैं ? इसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि मैं राजा भरतका आदमी हूँ और दूतके कार्यसे आया हूँ ॥२१४॥ क्रम-क्रमसे बहुत बड़ी छावनीको उलंघ कर वह राजाके निवासस्थानमें पहुँचा और द्वारपालोंके द्वारा खबर देकर राजा सिंहोदरकी सभामें प्रविष्ट हुआ ।२१५॥ वहाँ जाकर राजाको तृणके समान तुच्छ समझते हुए उसने स्पष्ट शब्दोंमें इस प्रकार कहा कि हे सिंहोदर ! तू मुझे बड़े भाईका सन्देशवाहक समझ ॥२१६|| उत्तम गुणोंको धारण करनेवाले राजा भरत आपको इस प्रकार आज्ञा देते हैं कि इस निष्कारण वैरसे क्या लाभ है ? ॥२१७|| तदनन्तर कठोर मनको धारण करनेवाला सिंहोदर बोला कि हे दूत ! तू मेरी ओरसे अयोध्याके राजा भरतसे इस प्रकार कहो कि अविनीत सेवकोंको विनयमें लानेके लिए स्वामी प्रयत्न करते हैं इसमें क्या विरोध दिखाई देता है ? ॥२१८-२१९।। यह वज्रकर्ण दुष्ट है, मानी है, मायावी है, अत्यन्त नीच है, क्रोधी है, क्षुद्र है, मित्रकी निन्दा करनेमें तत्पर है, आलस्यसे युक्त है, मूढ़ है, वायु अथवा किसी पिशाचने इसकी बुद्धि हर ली है, यह विनयाचारसे रहित है, पण्डितम्मन्य है, और दुष्ट चेष्टाओंसे युक्त है। ये दोष इसे या तो दमनसे छोड़ सकते हैं या मरणसे; इसलिए इसका उपाय करता हूँ इस विषयमें आप चुप बैठिए ॥२२०-२२२।। तदनन्तर लक्ष्मणने कहा कि इस विषयमें अधिक उत्तरोंसे क्या प्रयोजन है ? चूँकि यह सबका हित करता है अतः इसका यह सब अपराध क्षमा कर दिया जाये ||२२३।। लक्ष्मणके इस प्रकार कहते ही जिसका क्रोध उबल पड़ा था, और जो सन्धिसे विमुख था ऐसा सिंहोदर अपने सामन्तोंकी ओर देख गरजकर बोला कि न केवल यह दुष्ट वज्रकणं ही मानी है किन्तु उसके कार्यको इच्छासे आया हुआ यह दूत भी वैसा ही मानी है ।।२२४-२२५।। अरे दूत ! जान पड़ता है तेरा यह शरीर पाषाणसे ही बना है अयोध्यापतिका यह दुष्ट भृत्य, रंचमात्र भी नम्रताको प्राप्त नहीं है-अर्थात् इसने बिलकुल भी १. नृपाधम ब.। २. मायो। ३. प्रचुरोत्तरैः। ४. नमनम नामः तम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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