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________________ त्रयस्त्रिशत्तमं पर्व १०३ तरक्षुक्षतसारङ्गरुधिरभ्रान्तमक्षिकम् । कण्टकासक्तपुच्छाग्रप्रताम्यच्चमरीगणम् ॥२७॥ दर्पसंपूरितवाविन्मुक्तसूचीविचित्रितम् । विषपुष्परजोघ्राणघूर्णितानेकजन्तुकम् ॥२८॥ खनिखगसमुल्लीढतरुस्कन्धच्युतद्वम् । उद्भ्रान्तगवयवातभग्नपल्लवजालकम् ॥२९॥ . 'नानापक्षिकुलकरकूजितप्रतिनादितम् । शाखामृगकुलाक्रान्तचलत्प्राग्मारपादपम् ॥३०॥ तीव्रवेगगिरिस्रोत शतनिर्दारितक्षमम् । वृक्षाप्रविस्फुरत्स्फीतदिवाकरकरोस्करम् ॥३१॥ नानापुष्पफलाकीर्ण विचित्रामोदवासितम् । विविधौषधिसंपूर्ण वनसस्यसमाकुलम् ॥३२॥ क्वचिन्नीलं क्वचित्पीतं क्वचिद्रक्तं हरिक्वचित् । पिन्जरच्छायमन्यत्र विविशुर्विपिनं महत् ॥३३॥ तत्र ते चित्रकूटस्य निर्झरेष्वतिचारुषु । क्रीडन्तो दर्शयन्तश्च सदस्तूनि परस्परम् ॥३४॥कुलक(द्वादशभिः) फलानि स्वादुहारीणि स्वदमानाः पदे पदे । गायन्तो मधुरं हारि किन्नरीणां त्रपाकरम् ॥३५॥ पुष्पैर्जलस्थलोद्भूतैर्भूषयन्तः परस्परम् । सुगन्धिमिवैरङ्ग लिम्पन्तस्तरुसंभवैः ॥३६॥ उद्यानमिव निर्याता विकसत्कान्तिलोचनाः । स्वच्छन्दकृतसंस्काराः सत्त्वलोचनतस्कराः ॥३७॥ लतागृहेषु विश्रान्ता मुहुर्नयनहारिषु । कृतनानाकथासङ्गाः किंचिन्नर्मविधायिनः ॥३८॥ वजन्तो लीलया युक्ता निसर्गादतिरम्यया । पर्यटन्तो वनं चारु त्रिदशा इव नन्दनम् ॥३९॥ पक्षोनः पञ्चभिर्मासैस्तमुद्देशमतीत्य ते । जनैः समाकुलं प्रापुर्देशमत्यन्तसुन्दरम् ॥४०॥ शिखर खुद गये थे तथा जो बड़े-बड़े फण ऊँचे उठाकर चलनेवाले सांपोंसे भयंकर था ॥२६।। जहाँ भेड़ियोंके द्वारा मारे गये मृगोंके रुधिरपर मक्खियां भिन-भिना रही थीं और कटीली झाड़ियोंमें पूंछके बाल उलझ जानेसे जहां चमरी मृगोंके झुण्ड बेचैन हो रहे थे ॥२७॥ जो अहंकारसे भरी सेहियोंके द्वारा छोड़ी हुई सूचियोंसे चित्रविचित्र था तथा विषपुष्पोंकी परागके सूंघनेसे जहां अनेक जन्तु इधर-उधर घूम रहे थे ।।२८।। जहाँ गेंडा, हाथियोंके गण्डस्थलोंके आघातसे खण्डित हुए वक्षोंके तनोंसे पानी झर रहा था तथा इधर-उधर दौड़ते हुए गवय-समूहने जहां वृक्षोंके पल्लव तोड़ डाले थे ।।२९।। जहाँ नाना पक्षियोंके समूहकी क्रूरध्वनि गूंज रही थी तथा वानर समूहके आक्रमणसे जहां वृक्षोंके ऊध्वंभाग हिल रहे थे ॥३०॥ तीव्र वेगसे बहनेवाले सैकड़ों पहाड़ी झरनोंसे जहाँ पृथिवी विदोणं हो गयी थी तथा वृक्षोंके अग्रभागपर जहां सूर्यको किरणोंका समूह देदीप्यमान होता था ॥३१॥ जो नाना प्रकारके फूलों और फलोंसे व्याप्त था, विचित्र प्रकारकी सुगन्धिसे सुवासित था, नाना ओषधियोंसे परिपूर्ण था, और जंगली धान्योंसे युक्त था ।।३२।। जो कहीं नीला था. कहीं पीला था, कहीं लाल था, कहीं हरा था, और कहीं पिंगल वर्ण था ॥३३।। वे तीनों महानुभाव वहाँ चित्रकूटके सुन्दर निझरोंमें क्रीड़ा करते, सुन्दर वस्तुएँ परस्पर एक दूसरेको दिखाते, स्वादिष्ट मनोहर फल खाते, पद-पदपर किन्नरियोंको लज्जित करनेवाला हृदयहारी मधुर गान गाते, जल तथा स्थलमें उत्पन्न हुए पुष्पोंसे परस्पर एक दूसरेको भूषित करते और वृक्षोंसे निकले हुए सुगन्धित द्रवसे शरीरको लिप्त करते हुए इस प्रकार भ्रमण कर रहे थे मानो उद्यानकी सैर करने के लिए ही निकले हों। उनके सुन्दर नेत्र विकसित हो रहे थे, वे इच्छानुसार शरीरकी सजावट करते थे तथा प्राणियोंके नेत्रोंका अपहरण करते थे ॥३४-३७॥ वे बार-बार नेत्रोंको हरण करनेवाले निकुंजोंमें विश्राम करते थे, नाना प्रकारको कथावार्ता करते थे और तरह-तरहकी क्रीड़ाएँ करते थे ॥३८॥ स्वभावसे ही अत्यन्त सुन्दर लीलाके साथ गमन करते हुए वे उस सुन्दर वनमें इस प्रकार भ्रमण कर रहे थे जिस प्रकार कि नन्दन वनमें देव ।।३९॥ इस प्रकार एक पक्ष कम पाँच मासमें वे उस स्थानको पार कर मनुष्योंसे भरे हुए अत्यन्त सुन्दर अवन्ती देश में पहुंचे। १. नानापक्षि कुलं क्रूरकूजितं प्रतिनादितं म.। २. निर्धारितक्षयं म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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