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________________ द्वात्रिंशत्तम पर्व इत्युक्तेऽत्यन्तसद्भक्तिः प्रणम्य चरणौ गुरोः । जग्राह भरतो धर्म सागारं सुविधानतः ॥१८४॥ बहुश्रुतोऽतिधर्मज्ञो विनीतः श्रद्धयान्वितः । विशेषतो ददौ दानं स साधुषु यथोचितम् ॥१८५॥ सम्यग्दर्शनरत्नं स हृदयेन सदा वहन् । चकार विपुलं राज्यं साधुचेष्टापरायणः ॥१८६॥ प्रतापश्चानुरागश्च समस्तां तस्य मेदिनीम् । बभ्राम प्रतिघातेन रहितां गुणवारिधेः ।।१८७।। अध्यद्धं तस्य पत्नीनां शतं देवीसमत्विषाम् । न तत्रासक्तिमायाति 'शतपत्रं यथाम्भसि ।।१८८॥ उपजातिः चिन्तास्य नित्यं मगधाधिपासीत् कदा नु लप्स्ये निरगारदीक्षाम् । तपः करिष्यामि कदा नु घोरं संगैर्विमुक्तो विहरन् पृथिव्याम् ।।१८९।। इन्द्रवत्रा धन्या मनुष्या धरणीतले ते ये सर्वसङ्गान् परिवज्यं धीराः । दग्ध्वाखिलं कर्म तपोबलेन प्राप्ताः पदं निवृतिसौख्यसारम् ।।१९०।। उपजातिः तिष्ठामि पापो भवदुःखमग्नः पश्यन्नपीदं क्षणिकं समस्तम् । पूर्वाह्नदृष्टोऽत्र जनोऽपराहे न दृश्यते कश्चिदहोऽस्मि मूढः ॥१९१॥ इन्द्रवज्रा व्यालाज्जलाद् वा विषतोऽनलाद् वा वज्राद् विमुक्तादहितेन शस्त्रात् । शूलाद् वराद् वा मरणं जनोऽयं प्राप्नोति दीनाननबन्धुमध्ये ।। १९२।। हो जाते वह अनुपम सुखसे सम्पन्न परम पदको प्राप्त होता है ।।१८३।। ऐसा कहनेपर अत्यन्त समीचीन भक्तिसे युक्त भरतने गुरुके चरणोंको नमस्कार कर विधिपूर्वक गृहस्थ धर्म ग्रहण किया ॥१८४।। अनेक शास्त्रोंका ज्ञाता, धर्मके मर्मको जाननेवाला, विनयवान् और श्रद्धा गुणसे युक्त भरत अब साधुओंके लिए विशेष रूपसे यथायोग्य दान देने लगा ॥१८५|| उत्तम आचरणके पालनमें तत्पर रहनेवाला भरत हृदयमें सम्यग्दर्शनरूपी रत्नको धारण करता हुआ विशाल राज्यका पालन करता था ॥१८६।। गुणोंके सागरस्वरूप भरतका प्रताप और अनुराग दोनों ही बिना किसी रुकावटके समस्त पृथिवीमें भ्रमण करते थे ।।१८७।। उसके देवियोंके समान कान्तिको धारण करनेवाली डेढ़ सौ स्त्रियाँ थीं फिर भी वह उनमें आसक्तिको प्राप्त नहीं होता था। जिस प्रकार कमल जलमें रहकर भी उसमें आसक्त नहीं होता है उसी प्रकार वह उन स्त्रियोंके बीच रहता हुआ भी उनमें आसक्त नहीं था ॥१८८॥ गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! भरतके मनमें सदा यही चिन्ता विद्यमान रहती थी कि मैं निर्ग्रन्थ दीक्षा कब धारण करूंगा और परिग्रहसे रहित हो पृथिवीपर विहार करता हुआ घोर तप कब करूंगा ? ॥१८९|| पृथिवीतलपर वे धीर-वीर मनुष्य धन्य हैं जो सर्व परिग्रहका त्यागकर तथा तपोबलसे समस्त कर्मोको भस्म कर सन्तोषरूपी सुखसे श्रेष्ठ मोक्ष पदको प्राप्त हो चुके हैं ॥१०॥ एक मैं पापी हूँ जो समस्त जगत्को क्षणभंगुर देखता हुआ भी संसारके दुःखमें मग्न हूँ। इस संसारमें जो मनुष्य पूर्वाह्न कालमें देखा गया है वही अपराह कालमें नहीं दिखाई देता फिर भी आश्चर्य है कि मैं मूढ़ बना हूँ ॥१९१।। दीन हीन मुखको धारण करनेवाले बन्धुजनोंके बीचमें बैठा हुआ यह प्राणी सर्पसे, जलसे, विषसे, अग्निसे, वज्रसे, शत्रुके द्वारा छोड़े हुए शस्त्रसे, १. कमलम् । २. दीनो ननु बन्धुमध्ये म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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