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________________ पद्मपुराणे अभिषेकप्रभावेण श्रृयन्ते बहवो बुधाः । पुराणेऽनन्तवीर्याद्या 'धुभूलब्धाभिषेचनाः ॥१६९॥ भक्त्या वल्युपहारं यः कुरुते जिनसमनि । संप्राप्नोति परां भूतिमारोग्यं स सुमानसः ।।१७०।। गीतनर्तनवादित्रैर्यः करोति महोत्सवम् । जिनसमन्यसौ स्वर्गे लमते परमोत्सवम् ॥१७॥ भवनं यस्तु जैनेन्द्र निर्मापयति मानवः । तस्य भोगोत्सवः शक्यः केन वक्तुं सुचेतसः ।।१७२।। प्रतिमा यो जिनेन्द्राणां कारयत्यचिरादसौ । सुरासुरोत्तमसुखं प्राप्य याति परं पदम् ।।१७३॥ व्रतज्ञानतपोदार्यान्युपात्तानि देहिनः । सर्वैस्विष्वपि कालेषु पुण्यानि भुवनत्रये ॥१७॥ एकस्मादपि जैनेन्द्रबिम्बाद मावेन कारितात् । यत्पुण्यं जायते तस्य न संमान्त्यतिमात्रतः ।।१७५।। फलं यदेतदुद्दिष्टं स्वर्गे संप्राप्य जन्तवः । चक्रवादितां लब्ध्वा यन्मय॑त्वेऽपि भुञ्जते ।।१७६।। धर्ममेवं विधानेन यः कश्चित्प्राप्य मानवः । संसारार्णवमुत्तीर्य त्रिलोकाग्रेऽवतिष्ठते ।।१७७।। फलं ध्यानाचतुर्थस्य षष्टस्योद्यानमात्रतः । अष्टमस्य तदारम्भे गमने दशमस्य तु ॥१७८॥ द्वादशस्य ततः किंचिन्मध्ये पक्षोपवासजम् । फलं मासोपवासस्य लभते चैत्यदर्शनात् ।।१७९।। चैत्याङ्गणं समासाद्य याति पाण्मासिकं फलम् । फलं वर्षोपवासस्य प्रविश्य द्वारमश्नुते ॥१८॥ फलं प्रदक्षिणीकृत्य भुङ्क्त वर्षशतस्य तु । दृष्टवा जिनास्यमाप्नोति फलं वर्षसहस्रजम् ॥१८१॥ अनन्तफलमाप्नोति स्तुतिं कुर्वन् स्वभावतः । नहि भक्तर्जिनेन्द्राणां विद्यते परमुत्तमम् ॥१८२॥ कर्म मक्त्या जिनेन्द्राणां क्षयं भरत गच्छति । क्षीणकर्मा पदं याति यस्मिन्ननुपमं सुखम् ॥१८३॥ घीसे जिनदेवका अभिषेक करता है वह कान्ति, द्युति और प्रभावसे युक्त विमानका स्वामी देव होता हैं ॥१६८॥ पुराणमें सुना जाता है कि अभिषेकके प्रभावसे अनन्तवीर्य आदि अनेक विद्वज्जन, स्वर्गकी भूमिमें अभिषेकको प्राप्त हुए हैं ।।१६९॥ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक जिनमन्दिरमें रंगावलि आदिका उपहार चढ़ाता है वह उत्तम हृदयका धारक होकर परम विभूति और आरोग्यको प्राप्त होता है ।।१७०॥ जो जिनमन्दिरमें गीत, नृत्य तथा वादित्रोंसे महोत्सव करता है वह स्वर्गमें परम उत्सवको प्राप्त होता है ॥१७१।। जो मनुष्य जिनमन्दिर बनवाता है उस सुचेताके भोगोत्सवका वर्णन कौन कर सकता है ? ॥१७२।। जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान्को प्रतिमा बनवाता है वह शीघ्र ही सुर तथा असुरोंके उत्तम सुख प्राप्त कर परम पदको प्राप्त होता है ॥१७३॥ तीनों कालों और तीनों लोकोंमें व्रत, ज्ञान, तप और दानके द्वारा मनुष्यके जो पुण्य-कर्म संचित होते हैं वे भावपूर्वक एक प्रतिमाके बनवानेसे उत्पन्न हुए पुण्यकी बराबरी नहीं कर सकते ॥१७४-१७५|| इस कहे हुए फलको जीव स्वर्ग में प्राप्त कर जब मनुष्य पर्यायमें उत्पन्न होते हैं तब चक्रवर्ती आदिका पद पाकर वहाँ भी उसका उपभोग करते हैं ॥१७६।। जो कोई मनुष्य इस विधिसे धर्मका सेवन करता है वह संसार-सागरसे पार होकर तीन लोकके शिखरपर विराजमान होता है ।।१७७।। जो मनुष्य जिनप्रतिमाके दर्शनका चिन्तवन करता है वह वेलाका, जो उद्यमका अभिलाषी होता है वह तेलाका, जो जानेका आरम्भ करता है वह चौलाका, जो जाने लगता है वह पाँच उपवासका. जो कछ दर पहुँच जाता है वह बारह उपवासका, जो बीचमें पहुँच जाता है वह पन्द्रह उपवासका, जो मन्दिरके दर्शन करता है वह मासोपवासका, जो मन्दिरके आँगन में प्रवेश करता है वह छह मासके उपवासका, जो द्वारमें प्रवेश करता है वह वर्षोपवासका, जो प्रदक्षिणा देता है वह सौ वर्षके उपवासका, जो जिनेन्द्रदेवके मुखका दर्शन करता है वह हजार वर्षके उपवासका और जो स्वभावसे स्तुति करता है वह अनन्त उपवासके फलको प्राप्त करता है। यथार्थमें जिनभक्तिसे बढ़कर उत्तम पुण्य नहीं है ।।१७८-१८२।। आचार्य द्युति कहते हैं कि हे भरत! जिनेन्द्रदेवको भक्तिसे कर्म क्षयको प्राप्त हो जाते हैं और जिसके कर्म क्षीण १. स्वर्गवसुधाप्राप्ताभिषेकाः । २. वेलोपवासस्य । ३. दिनत्रयोपवासस्य । ४. चतुर्दिनोपवासस्य । www.jainelibrary.org For Private & Personal Use Only Jain Education International
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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